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अब भी प्रासंगिक हैं जयललिता, द्रमुक भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे प्रतिकूल छवि बने
Mon, 05 Jul 2021 06:36 AM IST
देव कश्यप
एम भास्कर साई
एम भास्कर साई
Published by: देव कश्यप
Updated Mon, 05 Jul 2021 06:36 AM IST
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J. Jayalalithaa
- फोटो :
PTI
विस्तार
मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में तमिलनाडु सरकार से पूछा है कि पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीया जयललिता की रहस्यपूर्ण मौत की जांच के लिए गठित न्यायमूर्ति अरुमुगुस्वामी आयोग को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देने के लिए क्यों नहीं कहा जा सकता? अदालत ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें अदालत से यह कहा गया था कि वह सरकार को इस आयोग को भंग करने का निर्देश दे, क्योंकि वास्तविक अर्थ में यह अस्तित्व में ही नहीं है, जबकि करदाताओं का पैसा खर्च हो रहा है। जबकि 25 अगस्त, 2017 को तत्कालीन सरकार ने इस संदर्भ में जो अधिसूचना जारी की थी, उसके मुताबिक, यह आयोग तीन महीने में जांच पूरी कर अंग्रेजी और तमिल में अपनी रिपोर्ट पेश करेगा। लेकिन आयोग की अवधि बार-बार बढ़ाई जाती रही।
जयललिता की मौत की जांच के लिए 2017 में तत्कालीन अन्नाद्रमुक सरकार के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति अरुमुगुस्वामी के नेतृत्व में एक सदस्यीय आयोग गठित किया था, क्योंकि तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री और बागी पन्नीरसेलवम ने अपने विधायकों समेत पलानीस्वामी के साथ मिलने की जो शर्तें रखी थीं, उनमें से एक शर्त जयललिता की मृत्यु की न्यायिक जांच भी थी। पलानीस्वामी इस कारण भी जयललिता की मृत्यु की न्यायिक जांच करवाने के लिए राजी हुए, क्योंकि उनके बार-बार अस्पताल में भर्ती होने और फिर रहस्यपूर्ण तरीके से मृत्यु की जांच कराने की मांग उनके लाखों समर्थक भी कर रहे थे। पर इस बारे में अब तक कुछ सामने आना तो दूर, उल्टे आयोग की समय-सीमा नौ बार बढ़ाई जा चुकी है।
जयललिता की मृत्यु के करीब साढ़े चार साल हो गए हैं, ऐसे में, यह सवाल पूछा जाना जायज है कि तमिलनाडु की राजनीति में क्या उनकी प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है। राज्य के ज्यादातर लोग इसका जवाब 'हां' में देते हैं। मई, 2011 से मई, 2021 तक दस साल तक राज्य में अन्नाद्रमुक की सरकार रही और इस दौरान हर जगह जयललिता की मौजूदगी महसूस की गई। मई, 2016 में जयललिता दोबारा सत्ता में लौटी थीं, लेकिन उसी साल पांच दिसंबर को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मौत के बाद भी अन्नाद्रमुक न केवल सत्ता में बनी रही, बल्कि पार्टी में जो विवाद पैदा हुआ, उसकी वजह यह थी कि अम्मा का प्रशासनिक कामकाज कौन जारी रखेगा। मुख्यमंत्री रहते हुए पलानीस्वामी ने न सिर्फ उसे जयललिता की सरकार बताया, बल्कि इस साल चुनाव हारने के बाद पलानीस्वामी ने वादा किया कि पार्टी जब भी सत्ता में लौटेगी, अम्मा के अधूरे काम पूरे किए जाएंगे।
राजनीतिक विशेषज्ञ श्रीधर कहते हैं, 'अब चूंकि द्रमुक सत्ता में है, ऐसे में, उम्मीद है कि राज्य में चीजें तेजी से बदलेंगी।' द्रमुक के सत्ता में आने के तुरंत बाद राज्य भर में अम्मा कैंटीन के होर्डिंग्स को नुकसान पहुंचाया गया था। हालांकि द्रमुक सरकार का कहना है कि अम्मा कैंटीन राज्य में इसी नाम से चलती रहेगी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने होर्डिंग्स को नुकसान पहुंचाने वाले अपने दो पार्टीजनों के खिलाफ कार्रवाई की और नए होर्डिंग्स भी बनवा दिए। श्रीधर के मुताबिक, 'नए मुख्यमंत्री के रवैये से यह मजबूत संदेश गया है कि सत्तारूढ़ द्रमुक ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी, जिससे स्वर्गीया जयललिता और उनके समर्थकों के बीच कोई प्रतिकूल छवि बने। हालांकि, स्टालिन सरकार का यह बिल्कुल शुरुआती समय है, लिहाजा हमें इंतजार करना पड़ेगा कि आगे चीजें किस तरह आकार लेंगी।'
याद रखना चाहिए कि अपने चुनाव अभियान के दौरान स्टालिन ने हमेशा यह कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है, तो मुख्यमंत्री के तौर पर वह जयललिता की रहस्यपूर्ण मौत की जांच कराएंगे, क्योंकि कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। द्रमुक के चुनावी घोषणापत्र में भी इसका जिक्र था। स्टालिन ने कहा था, 'एमजीआर की जब अस्पताल में मौत हुई थी, तब राज्य के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री ने उनकी मृत्यु की घोषणा की थी। लेकिन अन्नाद्रमुक के किसी भी नेता ने जयललिता के स्वास्थ्य या उनकी मृत्यु के बारे में नहीं बताया।' एक तरह से उन्होंने अम्मा की मौत से जुड़े रहस्य के लिए अन्नाद्रमुक के नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया था। कमल हासन ने भी चुनाव अभियान के दौरान जयललिता की रहस्यपूर्ण मृत्यु का जिक्र किया था। उनकी पार्टी ने कहा था, 'राज्य के लोगों को जयललिता की मृत्यु से जुड़ी सच्चाई जानने का अधिकार है।'
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी पार्टी अपने अंदरूनी विवादों से इस तरह घिरी हुई है कि उसके लिए जयललिता की प्रासंगिकता का मामला नेपथ्य में चला गया है। राजनीतिक टिप्पणीकार अरिवझगन कहते हैं, 'हालांकि कैडर अब भी पार्टी के प्रति निष्ठावान और अम्मा की स्मृतियों से जुड़े हैं, लेकिन लॉकडाउन और लोगों के जमावड़े पर रोक के कारण जयललिता की प्रासंगिकता को सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित करने की संभावना नहीं है।' यह बेहद दिलचस्प है कि जयललिता की सबसे नजदीकी शशिकला अब पार्टी कैडरों के बीच अपना प्रभाव बनाने के लिए अन्नाद्रमुक के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री एमजीआर की स्मृतियों का सहारा ले रही हैं। हाल ही में शशिकला ने अन्नाद्रमुक के संस्थापक के साथ अपनी नजदीकी के बारे में बताते हुए कहा कि 1980 के दशक के मध्य में एमजीआर पार्टी से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय लेते थे। शशिकला ने कैडरों और अपने समर्थकों को यह भी संदेश दिया कि वह जल्दी ही पूरे राज्य का दौरा करने वाली हैं।
उनका कहना था कि वह पांच जुलाई को ही इस बारे में फैसला ले पाएंगी, जिस दिन सरकार लॉकडाउन खत्म करने के बारे में फैसला लेगी। हालांकि एमजीआर का जिक्र करने के बावजूद वह जयललिता की उपेक्षा नहीं कर पाईं। उनका कहना था कि जयललिता के मेमोरियल पर फूल चढ़ाने के बाद ही वह राज्य का दौरा शुरू करेंगी। अलबत्ता इस बीच दीपक और दीपा कहीं दिखाई नहीं दे रहे, जिन्होंने खुद को जयललिता का भतीजा और भतीजी बताया था। चूंकि अब राज्य में सरकार भी बन चुकी है, ऐसे में, ये दोनों जयललिता की परंपरा की बात करते हुए शायद अगले चुनाव के समय ही प्रकट हों।