फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Tamil Nadu decision Union Government instead of Central Government Political Language of Federalism in India

संघ बनाम केंद्र: राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे की मजबूती के लिए जरूरी है संघवाद?

Fri, 10 Mar 2023 09:30 AM IST
Sharat Pillai शरत पिल्लई
Updated Fri, 10 Mar 2023 09:30 AM IST
विज्ञापन
सार
तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक पत्राचार की भाषा में केंद्र सरकार के बजाय संघीय सरकार का उल्लेख कर संघ बनाम केंद्र की पुरानी बहस छेड़ दी है। आज संघवाद का अर्थ केंद्र और राज्यों के बीच का शक्ति संघर्ष ही ज्यादा है, जबकि  कभी इसके तहत राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करने की सोच भी विकसित हुई थी।
loader
Tamil Nadu decision Union Government instead of Central Government Political Language of Federalism in India
एमके स्टालिन - फोटो : पीटीआई

विस्तार

मई, 2021 से तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज द्रमुक सरकार के शुरुआती कदमों में एक था आधिकारिक पत्राचार की भाषा से 'केंद्र सरकार' शब्द हटाना। भारत सरकार को केंद्र सरकार के बजाय संघीय सरकार के रूप में संबोधित करने का उसका फैसला स्पष्ट रूप से भारतीय संघवाद के घटते प्रभाव को रोकने के लिए था। जैसा था कि लेखक और तमिल भाषा के कार्यकर्ता आझी सेंथिलनाथन कहते हैं, नाम में यह परिवर्तन राज्य की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर खतरे को देखते हुए जरूरी था।



संघवाद निर्विवाद रूप से भारतीय राजनीति में एक बुनियादी अवधारणा बन गया है। आज संघवाद हमारी राजनीतिक भाषा और विमर्श को इतना अधिक प्रभावित करने लगा है कि इसका मतलब केंद्र और राज्यों के बीच का शक्ति संघर्ष ही ज्यादा हो गया है। इस प्रक्रिया में हम संघवाद के तहत अभूतपूर्व एकात्मक ढांचे के विकसित होने तथा एक ऐसी राजनीतिक भाषा तैयार करने की बात भूल ही गए हैं, जिसके तहत भारतीय राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान करने की सोच विकसित हुई थी।


तमिलनाडु की इस पहल को संघवाद की राजनीतिक भाषा को पुनः हासिल करने की एक ऐसी बड़ी परियोजना के लिए मुखर होना चाहिए, जिसके तहत भारतीय राज्यों के अधिकारों की रक्षा की जाए। संघ या संघीय सरकार और केंद्र सरकार के बीच अंतर ऐतिहासिक है, जिस पर 1930 और 1940 के दशक में काफी चर्चा हुई थी। 1950 में फेडरेशन के बजाय भारत को संघ बनाने से केंद्र एवं संघ के बीच अंतर कम महत्वपूर्ण हो गया। फेडरेशन के बजाय संघ की स्थापना इस विश्वास पर की गई कि घटक राज्यों की कोई मूल संप्रभुता नहीं थी।

औपनिवेशिक सरकार और भारतीय नेताओं, दोनों ने अक्सर 'केंद्र' एवं 'केंद्रीय सरकार' का इस्तेमाल किया। भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने स्थानीय सरकारों और स्थानीय विधायिकाओं से अंतर स्पष्ट करने के लिए केंद्रीय विधायिका और केंद्र सरकार का जिक्र किया।

भारतीय राष्ट्रवादियों ने भी औपनिवेशिक शासन की सांविधानिक भाषा के शब्दार्थ को स्वीकार किया। भारतीय संविधान की पहली प्रमुख राष्ट्रवादी अभिव्यक्ति नेहरू रिपोर्ट (1928) में उदारतापूर्वक 'केंद्र सरकार' वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। वेस्टमिंस्टर शैली की संसदीय सरकार का अनुकरण करने की इच्छा में भारतीय राष्ट्रवादी एक शक्तिशाली केंद्र सरकार के समर्थक बन गए। यह राष्ट्रवादियों और देसी रियासतों व अल्पसंख्यकों के बीच मतभेद का महत्वपूर्ण बिंदु बन गया।

संविधान सभा में एक मजबूत केंद्र के पक्ष और विपक्ष में तरह-तरह के तर्क दिए गए। आंबेडकर के नेतृत्व वाली मसौदा समिति बिना किसी खेद के मजबूत केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ी थी। आंबेडकर ने विशेष रूप से बहस के महत्वपूर्ण क्षणों में 'केंद्र' शब्द का प्रयोग किया है। अनुच्छेद 356 (मसौदा में अनुच्छेद 278) पर बहस करते हुए, आंबेडकर ने कहा कि 'प्रांत में अच्छी सरकार है या नहीं, यह केंद्र को निर्धारित करना है।' हसरत मोहानी और दामोदर स्वरूप सेठ जैसे नेताओं ने केंद्रीकरण और राज्यों की संप्रभुता की कमी का कड़ा विरोध किया। स्वरूप ने यहां तक कहा कि बहुत अधिक केंद्रीकरण 'अधिनायकवाद' की ओर ले जाएगा।

संविधान सभा की बहसें हमें दिखाती हैं कि भले ही भारत को राज्यों का एक संघ होना था, लेकिन यह किसी भी तरह से वैसा संघ नहीं बनने जा रहा था, जिसकी देसी रियासतों और अल्पसंख्यकों द्वारा वकालत की गई थी। देसी रियासतों और अल्पसंख्यकों के विचार में, क्षेत्रवाद और प्रांतीय स्वायत्तता की एक मजबूत भावना से अनुप्राणित, केंद्र सरकार को न्यूनतम कार्य करने थे, जिसमें अधिकांश विषय केंद्र और प्रांतों के बीच विभाजित थे। समवर्ती सूची छोटा होने के बजाय बहुत बड़ी हो गई। यह अपने आप में राष्ट्रवादी प्रभुत्व के बढ़ते विचार को दर्शाता है, जिसने स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक राज्य के एकात्मक ढांचे को पुनः स्थापित करने की मांग की।

दो सितंबर, 1949 को संविधान सभा में आंबेडकर और नेहरू के खिलाफ हसरत मोहानी ने ठीक यही आरोप लगाया था कि केंद्रीय शक्तियों को बढ़ाकर, उन्होंने 'पुराने ब्रिटिश एकात्मक भारतीय साम्राज्य' की तरह एक 'एकात्मक भारतीय साम्राज्य' बनाया है। भले ही 'केंद्र सरकार' लिखित संविधान में शामिल नहीं है, यह हमें बताता है कि संविधान का पाठ उस राजनीतिक भाषा का संतोषजनक अभिलेख नहीं है, जिसमें इसके लेखन से पहले इसकी कल्पना और बहस की गई थी।

तमिलनाडु की हठधर्मिता हमारे लिए राजनीतिक भाषा की एक नई दुनिया खोलती है। कई भारतीय भाषाओं में, 'संघ' और 'केंद्रीय' के बीच का अंतर तक न पाया जाना बताता है कि हमने संघ को संघीय के बजाय केंद्र मान लिया है। संघ अपने जन्म के समय से केंद्र से नाभिनालबद्ध था, और इससे यही पता चलता है कि राजनीतिक विमर्श में संघ और केंद्र के बीच का अंतर बताने के लिए हमारे पास शब्दों की कितनी कमी है। उदाहरण के लिए, मलयालम में संघ या संघीय सरकार और एकात्मक सरकार का अर्थ अलग-अलग होता है, हालांकि केंद्र और संघ के बीच का अंतर बहुत ही सूक्ष्म है। केंद्र का अर्थ है केंद्रम, और संघ का अर्थ है एक्यम/एकता। लेकिन मलयालम के पास केंद्र शासित क्षेत्रों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच अंतर करने के लिए कोई शब्द नहीं है, दोनों का मतलब केंद्र बराना प्रदेशम है।

भारत को एक संघ कहना, या भारत सरकार को केंद्र सरकार के रूप में संदर्भित करना पाठ के बाहर के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि संविधान में न तो संघ/संघीय और न ही केंद्रीय शब्द की उपस्थिति है। फिर भी, संघ एक अनूठी भाषायी और राजनीतिक श्रेणी है, जो अधिकांश भारतीय भाषाओं में मौजूद है। भले ही सत्तारूढ़ और विपक्षी दल भारत को एक महासंघ के रूप में देखना पसंद करते हैं, लेकिन यह तथ्य कम से कम उन सभी के लिए मायने रखता है कि तमिलनाडु एक ऐसे शब्द का उपयोग करना चुन रहा है, जो उचित रूप से सांविधानिक है। तमिलनाडु का रुख हमें संघवाद की भाषा को पुनः प्राप्त करने की तात्कालिकता से अवगत कराता है, जिसे संघ और केंद्र के बीच अंतर करना चाहिए। यह कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि भारत में केंद्रीयकरण बढ़ता जा रहा है।

-सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च फेलो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed