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लोकतंत्र की राह में तालिबान रोड़ा

Tue, 22 May 2018 05:35 PM IST
kuldeep talwar कुलदीप तलवार
Updated Tue, 22 May 2018 05:35 PM IST
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Talibani hurdle in the path of democracy
कुलदीप तलवार
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी दबाव में है। सरकार चाहती है कि लंबित जिला सभाओं व संसद के चुनाव इस साल 20 अक्तूबर को करा लिए जाएं। तीन साल पहले ही वर्तमान संसद की अवधि समाप्त हो चुकी है और अगर इसमें और देरी हुई, तो अफगान जनता में लोकतंत्र के प्रति भरोसा कम हो जाएगा।

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चुनाव अधिकारियों को उम्मीद है कि अगले दो महीने में 1.4 करोड़ मतदाताओं के नाम पंजीकृत कर लिए जाएंगे। देश में अगले साल राष्ट्रपति का चुनाव भी होना है, जबकि दूसरी तरफ तालिबान व आईएस आतंकवादी आम नागरिकों को, अफगान सैनिकों, अमेरिकी और सहयोगी गठबंधन नाटो  सैनिकों के साथ मीडियाकर्मियों को निशाना बना रहे हैं। 

शनिवार को जलालाबाद के स्टेडियम में एक क्रिकेट मैच के दौरान हुए बम धमाके में आठ लोग मारे गए। राजधानी काबुल में 22 अप्रैल को एक आत्मघाती हमले में कम से कम 57 लोगों की मौत हो गई। यह हमला एक मतदाता पंजीकरण केंद्र के बाहर किया गया और आईएस ने हमले की जिम्मेदारी ली। छह मई को भी अफगानिस्तान के अशांत पूर्वी हिस्से में भी एक मतदाता पंजीकरण केंद्र में विस्फोट हुआ, जिसमें कम से कम 30 लोग की जान गई। 30 अप्रैल को भी तीन अलग-अलग बम धमाकों में 40 लोगों की जान गई। इनमें नौ मीडियाकर्मी मारे गए। ये भी फिदाइन हमले थे। इन धमाकों में 45 लोग घायल भी हुए। 

तालिबान की सत्ता के खात्मे के बाद मीडिया पर यह सबसे बड़ा जानलेवा हमला हुआ है। दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान के पत्रकार विश्व में सबसे ज्यादा साहसी पत्रकारों में जाने जाते हैं। वे सर्वाधिक मुश्किल हालात में काम करते हुए एक बड़े खतरे, डर व हिंसा का सामना कर रहे हैं। लेकिन जोखिम के बावजूद अपने काम को लेकर वह प्रतिबद्ध है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने इन शृंखलाबद्ध आतंकी हमलों पर सख्त नाराजगी जताई है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है। 

2016 में भी अफगानिस्तान में 34 पत्रकार मारे गए थे। सच तो यह है कि तालिबान और आईएस के आतंकियों ने इन दिनों अपनी लड़ाई तेज कर दी है। हालत यह है कि पिछले कुछ अर्से से आधे से ज्यादा क्षेत्र पर तालिबान का कब्जा है और सरकार का नियंत्रण कमजोर पड़ गया है। चिंता इस बात की जताई जा रही है कि ऐसे में वहां मीडियाकर्मी निडरता और निष्पक्षता के साथ काम कर पाएंगे या नहीं।
दरअसल, तालिबान व आईएस आतंकी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की नई अफगान नीति के सख्त खिलाफ हैं।

उनका मानना है कि अमेरिका लंबी अवधि तक अफगानिस्तान छोड़ने का कोई इरादा नहीं रखता। अफगानिस्तान में पिछले तीन महीने के दौरान अनगिनत बम गिराए गए हैं, जितने पहले कई वर्षों में नहीं गिराए गए थे। इस बमबारी में मस्जिदों व मदरसों में कुरान की शिक्षा पाने वाले अनेक बच्चों को जान गंवानी पड़ी। दूसरी तरफ अमेरिका ने कहा है कि तालिबान की ओर से नए सिरे से हमलों में लाई गई तेजी का कोई औचित्य नहीं है। 

इसलिए सलाह दी है कि जैसा कि राष्ट्रपति अशरफ गनी कह चुके हैं कि तालिबानियों को अपनी गोलियों व बमों को छोड़कर वोटों को हथियार बनाना चाहिए और उन्हें चुनाव में शामिल होना चाहिए और अफगानिस्तान के भविष्य के लिए रचनात्मक रूप से काम करना चाहिए। अगर मौजूदा हालात पर काबू न पाया गया, तो अफगानिस्तान में हिंसा भड़केगी और अफरा-तफरी का माहौल जारी रहेगा।
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