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राजनीति और पैसे का अटूट रिश्ता

Sun, 21 Jun 2015 08:17 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 21 Jun 2015 08:17 PM IST
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symbiotic relationship of Money and Politics

ललित मोदी मामले में फिलहाल सुषमा स्वराज या वसुंधरा राजे के इस्तीफा देने की स्थिति नहीं है, लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है। अगर मोदी सरकार की लाज रखने के लिए इस्तीफे दिए जाते हैं, तो कुछ ही दिनों में हम भूल जाएंगे कि इन दोनों ने ललित मोदी की मदद की थी। अगर  इस्तीफे नहीं दिए जाते, तब भी कुछ ही दिनों में हम भूल जाएंगे ठीक वैसे, जैसे हम भूल गए हैं रॉबर्ट वाड्रा का किस्सा। बिल्कुल उसी तरह, जैसे हम भूल चुके हैं सोनिया गांधी और ओट्टावियो क्वात्रोच्चि की दोस्ती। फिर अगली बार जब इस तरह का कोई नया किस्सा सामने आएगा, तब हम फिर हल्ला मचाएंगे थोड़ी देर के लिए, और फिर से भुला देंगे कि राजनीति और पैसे का रिश्ता चोली-दामन का है।

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हर चुनाव में हम देखते हैं कि कैसे जनप्रतिनिधि बनने के प्रयास में प्रत्याशी पानी की तरह पैसा बहाते हैं, और हम यह भी जानते हैं कि यह पैसा उनके पास राजनीतिक दलों की तरफ से नहीं आता है। आता है ललित मोदी जैसे उद्योगपतियों से। उद्योगपति किसी राजनेता में इस उम्मीद से निवेश करते हैं कि जरूरत आने पर नेताजी मदद करेंगे। मुफ्त में राजनीतिज्ञों को नहीं मिलता है पैसा।
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सो, कौन-सी बड़ी बात है कि सुषमा स्वराज ने ललित मोदी की उस समय मदद की, जब वह देश छोड़कर भाग गए थे, और भारत सरकार ने उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया था? ललित मोदी ने स्वीकार किया है कि सुषमा स्वराज से उनकी दोस्ती पुरानी हैं, और यह भी माना है कि उनके पति और बेटी उनकी कंपनी के लिए वकालत करते आए हैं। साथ-साथ ललित मोदी ने बेझिझक कह दिया कि वसुंधरा राजे ने उनकी मदद की थी ब्रिटिश वीजा हासिल करने में, और उनकी दोस्ती इतनी गहरी है कि उनकी बीमार पत्नी के साथ वसुंधरा खुद पुर्तगाल गईं दो बार लिस्बन के कैंसर अस्पताल में श्रीमती मोदी का इलाज करवाने। न ऐसा करना अपराध है कानूनी तौर पर, और न ही विदेश मंत्री की ललित मोदी को मदद। लेकिन कुछ सवाल उठ रहे हैं ललित मोदी की इस गाथा से, जिसका सामना अगर हम करते हैं, तो संभव है कि राजनीति और पैसे का यह अटूट रिश्ता थोड़ा-सा कमजोर होने लगेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने काले धन के खिलाफ मुहिम शुरू की थी, तो क्या वह जानते नहीं थे कि काले धन से ही लड़े जाते हैं इस देश में चुनाव? कौन-सा राजनीतिक दल ईमानदारी से कह सकता है कि चुनाव के समय जो पैसा ईमानदारी से इकट्ठा होता है, वह काला धन नहीं है? सो, पहली बात तो यह है कि काला धन और चुनावों का रिश्ता कैसे तोड़ा जा सकता है?
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सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे का दोष सिर्फ इतना है कि वे पकड़ी गई हैं। वर्ना बिल्कुल वैसे, जैसे उनकी दोस्ती ललित मोदी के साथ थी, बाकी मंत्रियों के भी दोस्त होंगे उद्योग जगत में, जो चुनाव के समय इस उम्मीद से मदद करते हैं कि जरूरत पड़ने पर नेताजी भी उनकी मदद करेंगे। ऐसा अन्य मुल्कों में भी होता है, लेकिन अमेरिका जैसे देश में राजनेता सरेआम पैसा लेते हैं उद्योपतियों से, जबकि हमारे यहां यह काम चोरी-छिपे है, क्योंकि हमारे राजनेता 'समाजवादी' होने का ढोंग रचाना चाहते हैं, देश के आम आदमी के सामने। सो, संसद में ये निशाना बनाते हैं 'सूट-बूट' वालों को। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही ये लोग पहुंच जाते हैं 'सूट-बूट' वालों के पास।

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