स्वेज नहर, निर्गुट और नेहरू

स्वप्न कोना नायडु Updated Mon, 07 Nov 2016 07:43 PM IST
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इसी हफ्ते स्वेज नहर संकट को छह दशक पूरे हो गए; यह ऐसा घटनाक्रम था, जिसका उस क्षेत्र में भारत के दृष्टिकोण और अरब राष्ट्रवाद के उभार के लिहाज से बहुत महत्व था। इस संकट को उत्पन्न करने वाले घटनाक्रमों से भारत अवाक था और संयुक्त राष्ट्र और कूटनीति के जरिये उसने जिस तरह की राजनीतिक पहल की थी, उसमें भारत को कई सबक मिले। इस संकट की जड़ इस्राइल, ब्रिटेन और फ्रांस की तिकड़ी द्वारा 29 अक्तूबर, 1956 में किए गए हमले में निहित थी। यह संकट हालांकि सिर्फ दस दिन तक चला, लेकिन भारत के लिए यह बेहद चिंता का वक्त था। तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फॉस्टर डल्स को नेहरू ने पत्र लिखा, 'यूरोप और एशिया का रिश्ता अधर में है। भारत सरकार यह अनुमान लगा रही है कि इस संकट का भारत पर आर्थिक और राजनीतिक, दोनों असर पड़ेगा, यदि नहर से परिवहन पर किसी तरह की रोक लगती है, तो इसके नुकसानदेह परिणाम सामने आएंगे और इसका असर दूसरी पंचवर्षीय योजना की प्रगति पर पड़ सकता है।'
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वर्ष 1956 में मिस्र की आर्थिक प्रगति नील को नियंत्रित करने पर निर्भर थी। इस नदी पर आसवान बांध बनाया गया था, जिसके निर्माण के लिए सोवियत संघ और अमेरिका, दोनों ने मदद की पेशकश की थी, पर मिस्र को आर्थिक रूप से कमजोर बताकर यह पेशकश वापस ले ली गई। मिस्र के राष्ट्रपति गमेल अब्दुल नासिर इन दोनों के इस रुख से नाराज थे, जबकि दोनों नहर के जलमार्ग का उपयोग कर रहे थे। नासिर ने मिस्र के स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर खुद ही बांध बनाने का निर्णय लिया। नेहरू को इस योजना पर संदेह था, इसलिए उन्होंने भारत को इससे दूर रखा।
वर्ष 1954 में नासिर जब सत्ता में आए थे, तो उन्हें पश्चिमी ताकतों ने 'एशिया का मुसोलिनी', 'हिटलर की नकल करने वाला' और 'भावी तानाशाह' जैसी उपमाओं से नवाजा था। लंदन और पेरिस ने नासिर के अरब राष्ट्रवाद को अफ्रीका में अपने हितों के लिए खतरा माना। दूसरी ओर भारत ने राष्ट्रपति नासिर के नेतृत्व को इस क्षेत्र में मित्रता के विस्तार के अवसर के रूप में देखा। नासिर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मसलों पर नेहरू के सुझावों पर पूरी तरह से निर्भर थे। नेहरू क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से नासिर को अहम सहयोगी मानते थे और उन्होंने उन्हें रक्षा समझौतों में शामिल होने के प्रति हतोत्साहित किया और मिस्र को निर्गुट बनने के लिए प्रेरित किया। युगोस्लाविया, मिस्र और भारत पूरे यूरोप, अफ्रीका और एशिया में निर्गुट देशों की एकता का केंद्र बन गए।
नासिर ने जब नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की तो भारत को आसन्न संकट का आभास हो गया। नेहरू टकराव टालने के साथ ही शांतिपूर्ण तरीके से नहर के पूर्ववत उपयोग की स्थिति चाहते थे। सुरक्षा परिषद में सुनवाई के लिए यह मुद्दा जब तक आ पाता, इस्राइल ने मिस्र पर हमला कर दिया। ब्रिटेन और फ्रांस भी इस्राइल के साथ खड़े हो गए। नेहरू ने मध्यस्थता के कई प्रयास किए, जिनमें सबसे अहम था नेहरू-आइजेनहावर फॉर्मूला, जिससे संयुक्त राष्ट्र में संघर्ष विराम प्रस्ताव पारित हुआ। आइजनेहावर जहां पश्चिमी ताकतों को मनाने में सफल हुए, वहीं नेहरू एशियाई और अफ्रीकी देशों को। स्वेज संकट से भारत को जो अनुभव हुए उनसे पता चलता है कि खुद को संयुक्त राष्ट्र तक सीमित रखने और निर्गुट रहने के कारण भारत को लाभ हुआ और उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी। यह नीति आज भी कूटनीति के लिए प्रासंगिक है।

- सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में विजिटिंग फेलो हैं
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