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सुष्मिता से साहब कमाल तक की जिंदगी

Sun, 08 Sep 2013 04:26 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 08 Sep 2013 04:26 AM IST
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sushmita banerjee writer

पक्तिका को अफगानिस्तान के सबसे पिछड़े, खतरनाक और दूर-दराज प्रांतों में शामिल किया जाता है। यह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन के आगे स्थित है।

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यहां आधारभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं भी यहां नाममात्र हैं। स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर दवाओं और स्वास्थ्यकर्मियों सबकी कमी है। सत्ता से तालिबान की बेदखली के बाद यहां पुर्निर्माण के काम तो शुरू हुए, लेकिन इसकी रफ्तार खोस्त जैसे पड़ोसी क्षेत्रों की तुलना में धीमी है।
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इस क्षेत्र के पिछड़ेपन का सबसे प्रमुख कारण नाटो सैनिकों और यहां काम करने वालों के ऊपर लगातार हमले हैं। हाल तक, भारत और दुनिया के बहुत कम लोगों ने पक्तिका का नाम सुना होगा। वैसे बहुत कम लोगों को यहां के हालात की फिक्र है।
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पर उस समय काफी कुछ बदल गया, जब पिछले सप्ताह 49 वर्षीया एक भारतीय लेखिका और स्वास्थ्य कार्यकर्ता सुष्मिता बनर्जी की यहां हत्या कर दी गई। सुष्मिता ने एक अफगान कारोबारी से शादी की थी।

इसके बाद यह प्रांत दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया। तालिबान ने इस हत्या से पल्ला झाड़ लिया है। वहीं, मीडिया की मानें तो आतंकवादी भोर होने से पहले बनर्जी के घर आ धमके थे। उनका घर ऐसे क्षेत्र में है, जहां तालिबान का खास प्रभाव है।

प्रांतीय पुलिस प्रमुख जनरल दौलत खान जदरान ने एक न्यूज एजेंसी से कहा कि सुष्मिता के पति जानबाज खान ने दरवाजा खोला था। इसके बाद आतंकवादी सुष्मिता को घर के बाहर घसीट ले गए और उन्हें कम से कम 15 गोलियां मारी।

सवाल यह है कि सुष्मिता को क्यों मारा गया? इसका जवाब हमें शायद कभी नहीं मिलेगा। लेकिन उनके लेखन से हमें बहुत कुछ संकेत मिलते हैं। उनकी मातृभाषा बंगाली में लिखी उनकी किताब 'काबुलीवालार बंगाली बोऊ' में उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अफगानिस्तान के इस प्रांत में यातनाएं सहनी पड़ीं।

किताब में उन्होंने अफगानिस्तान में अपनी जिंदगी और 1990 के दशक में तालिबान से बचकर भागने का चित्रण किया है। साथ ही यह भी बताया है कि वह भारत में जानबाज से कैसे मिलीं और फिर मां-बाप की सहमति न होने के बावजूद उससे शादी कर ली।

2003 में इस किताब पर एक बॉलीवुड फिल्म 'एस्केप फ्रॉम तालिबान' बनी, जिसमें मनीषा कोइराला ने मुख्य किरदार निभाया था। उनकी हत्या अफगानिस्तान में प्रभावशाली महिलाओं पर होने वाले हमलों की एक ताजा कड़ी है और ये उस देश में महिला अधिकारों के लिए एक खतरा है, जहां महिलाएं बहुत कम घर से बाहर निकल पाती हैं। आखिर ये महिला है कौन?

जो तालिबान के आंतक से वहां से बच निकलने में कामयाब हो गई थी, लेकिन फिर अपने पति के साथ वापस लौटकर लोगों की सेवा में जुट गई। ज्यादातर लोग सुष्मिता को एक बहादुर लेखिका के रूप में जानते हैं, जिसने महिला अधिकारों की बात की।

लेकिन वह अफगानिस्तान के एक दूर-दराज वाले इलाके में रहती थीं और उन्होंने एक स्वास्थ्यकर्मी के रूप में प्रशंसनीय काम किया। अगर हम उनके लेखन की बात करें, तो स्वास्थ्यकर्मी के रूप में उनके काम से आतंकवादी नाखुश थे।

आउटलुक पत्रिका में 1998 के अपने एक लेख में उन्होंने ग्रामीण अफगानिस्तान और विशेष रूप से वहां अपने जीवन का बेहद जीवंत चित्रण किया था। उन्होंने लिखा था, 'कोलकाता में कारोबार करने वाले मेरे पति जानबाज को अचानक भारत आना पड़ा। मैं वहीं रुकी रही।

दुर्भाग्य से जानबाज अफगानिस्तान नहीं लौट पा रहे थे। मेरी सास भी कोई दयालु महिला नहीं थी। इस तरह 1993 में तालिबान की सत्ता से बेदखली तक हमारी जिंदगी कष्टप्रद रही। मुझे याद है कि शुरुआती वर्षों में तालिबान के सदस्य हमारे घर आ धमके थे।

उन्होंने सुना था कि हम अपने घर में डिस्पेंसरी चलाते हैं। मैं कोई योग्यता प्राप्त डॉक्टर नहीं हूं। लेकिन सामान्य बीमारियों के इलाज की समझ मेरे भीतर है और वैसे भी वहां आस-पास कोई भी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए मैंने सोचा कि डिस्पेंसरी के जरिये मैं खुद की मदद कर सकती हूं और व्यस्त रह सकती हूं।

तालिबान के सदस्य यह देखकर हक्के-बक्के थे कि एक महिला डिस्पेंसरी चला रही है। उन्होंने मुझे डिस्पेंसरी बंद करने का आदेश दिया और साथ ही एक अनैतिक महिला घोषित कर दिया।' यह सुष्मिता की हत्या की एक अहम वजह प्रतीत होती है, क्योंकि वह एक बार फिर वहां लोगों को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में जुट गईं थी।

इससे महिलाओं को खासतौर पर फायदा मिल रहा था, क्योंकि उनके लिए तो स्वास्थ्य सेवाओं का वहां घोर अभाव है। अमेरिकी अखबार 'द लॉस एंजिल्स टाइम्स' की एक रिपोर्ट के अनुसार वह पक्तिका में एक निजी अस्पताल में आया की नौकरी कर रही थीं।


अपनी मौत से पहले वह एक स्वास्थ्यकर्मी के रूप में अपने काम के तहत स्थानीय महिलाओं की जिंदगी पर फिल्म बनाने में व्यस्त थीं। क्या लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना और स्थानीय महिलाओं की जिंदगी पर फिल्म बनाना कोई अपराध है? क्या यह मायने नहीं रखता कि वह इस्लाम स्वीकार करके साहब कमाल हो गईं थी और लोगों की जिंदगियां बचा रहीं थी।

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