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सब्जियों का समर्थन मूल्य भी तय हो, मुट्ठी भर व्यापारियों के हाथ में प्याज का कारोबार

Devinder Sharma देविंदर शर्मा
Updated Wed, 28 Oct 2020 12:50 PM IST
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प्याज
प्याज - फोटो : अमर उजाला
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पिछले कई वर्षों से आलू और प्याज की कीमतें जिस गति से बढ़ती हैं, उसमें एक पैटर्न नजर आता है। वह पैटर्न यह है कि हर बार इसी मौसम में (अगस्त, सितंबर, अक्तूबर के दौरान) कहा जाता है कि बारिश के कारण फसलों का काफी नुकसान हो गया, जिसके चलते प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं। दूसरा पैटर्न यह नजर आता है कि जब भी चुनाव आता है, तो उससे पहले प्याज की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो इसका कोई न कोई राजनीतिक निहितार्थ जरूर होगा। इसके पीछे व्यापारी जो भी कारण बताएं, लेकिन एक साल मैंने देखा कि प्याज की पैदावार में मात्र चार फीसदी की गिरावट आई थी, लेकिन कीमतों में चार सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। इसके पीछे कारण यह है कि प्याज का व्यापार मुट्ठी भर लोगों के हाथों में है और वे उसकी कीमत नियंत्रित करते हैं।
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इस साल जब प्याज की कीमतें 80 से सौ रुपये प्रति किलो हो गई, तो सरकार ने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी है और आयात को भी मंजूरी दे दी है। मुख्य रूप से यही कहा जा रहा है कि बरसात से फसल को नुकसान हुआ, जिससे कीमतें बढ़ गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहली सितंबर से लेकर 30 सितंबर तक सरकारी वेबसाइट पर जो आधिकारिक आंकड़ा है, वह बता रहा है कि सितंबर में लासलगांव की मंडी, जो प्याज की एशिया की सबसे बड़ी मंडी है, में 38.84 फीसदी प्याज की ज्यादा आवक हुई है। और पूरे महाराष्ट्र में देखा जाए, तो 53.17 फीसदी प्याज की आवक ज्यादा हुई है। यानी महाराष्ट्र की मंडियों में 19.23 लाख क्विंटल अधिक प्याज आया। फिर भी कीमतें बढ़ जाती हैं, तो साफ है कि कोई तो बात है, जिसे हमें समझने की जरूरत है। 



यह तो हुई प्याज की बात, पर आलू की कीमतें भी बढ़ी हैं। अभी बाजार में साठ रुपये प्रति किलो आलू उपभोक्ताओं को खरीदना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा आलू की पैदावार उत्तर प्रदेश में होती है और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समय उत्तर प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं, जहां 30.56 लाख टन आलू जमा है, फिर भी आलू की कीमतें बढ़ रही हैं। हालांकि आलू उत्पादकों का कहना है कि इसमें एक बड़ा हिस्सा बीज के लिए है। इसी को देखते हुए सरकार ने यह निर्देश जारी किया है कि 31 अक्तूबर तक सभी कोल्ड स्टोरेज को खाली कर दिया जाए। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि कीमतों को नियंत्रण में लाया जा सके। उत्तर प्रदेश के कोल्ड स्टोरेज में जरूरत से 22 लाख टन ज्यादा आलू पड़ा हुआ है। साफ है कि बाजार में कमी पैदा करके कीमतों को बढ़ाया जा रहा है। इसी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने 31 दिसंबर तक प्याज के खुदरा और थोक भंडारण के लिए क्रमशः दो टन और पच्चीस टन की सीमा तय की है। इसका असर भी तुरंत दिखा, जिस दिन सरकार ने यह घोषणा की, उस दिन थोक में 8,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर थी, जो घटकर 6,000 रुपये पर आ गई। कीमतों के बढ़ने के पीछे जमाखोरी एक बहुत बड़ा कारण है, जिस पर नियंत्रण जरूरी है। 

मगर अफसोस कि जमाखोरी पर हम आज तक नियंत्रण नहीं लगा पाए हैं। जमाखोरी का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 पारित किया है, उसमें भंडारण की ऊपरी सीमा को हटा दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि जमाखोरी अब वैध हो गई है। ऊपरी सीमा हटाने का क्या नतीजा हो सकता है, इसका अनुमान प्याज और आलू की बढ़ रही कीमत से लगाया जा सकता है। इस संशोधन से किसानों को तो कोई फायदा नहीं होगा, हां, उपभोक्ताओं को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। देश के उपभोक्ता यह समझ रहे हैं कि ये तीनों कानून खेती से संबंधित हैं और उसका असर किसानों पर पड़ेगा। लेकिन आलू और प्याज के उदाहरण से पता चलता है कि ऊपरी सीमा हटाने से उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा। यानी जिस चीज को विनियमित करना चाहिए था, या जिस बड़ी आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करना चाहिए था, वह न करके बड़े खिलाड़ियों को भंडारण की अनुमति दे दी गई। इससे कीमतों में जो छेड़छाड़ होती है और इसका जब तक उपभोक्ताओं को पता चलता है, तब तक वे भारी नुकसान उठा चुके होते हैं। 

कीमतों को नियंत्रित करने का एक तरीका तो यह है कि अभी हमारे पास टेक्नोलॉजी है, अन्य तमाम संसाधन हैं, तो क्यों न हम फसल उत्पादन से पहले ही यह जान लें कि हमें पूरे देश के लिए कौन-सी फसल कितनी चाहिए, और किस राज्य में किस फसल की कितनी जरूरत है और उस हिसाब से हम उसका मैपिंग करें और आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करें। दूसरा तरीका यह है कि बिचौलियों को नियंत्रित करने के लिए हमें एक तंत्र विकसित करना होगा। छोटे व्यापारी और बिचौलियों को हम खराब मानते हैं, पर बड़े व्यापारी व बिचौलिए भी उससे कम नहीं हैं। आप देखेंगे कि स्थानीय बाजार में अभी आलू, प्याज की जो कीमत है, उससे कम अमेजन या फ्लिफकार्ट पर नहीं है। तो दोनों में फर्क क्या है? किसान को मक्के का दाम अभी आठ से नौ रुपये प्रति किलो मिल रहा है और पैकेटबंद होकर जो मक्का बाजार में बिकने आ रहा है, उसकी कीमत 45 से 50 रुपये प्रति किलो है। हम समझते हैं कि बाजार की अदृश्य शक्तियां अपने-आप इसमें संतुलन ले आएगी, लेकिन ऐसा होता नहीं है।

जब भी आलू, प्याज के व्यापारियों पर आयकर विभाग का छापा पड़ता है, तो हंगामा मच जाता है कि इससे व्यापारियों में गलत संदेश जाएगा। पर जमाखोरी रोकने के लिए ऐसा करने की जरूरत है। जब कीमतें बढ़ती हैं, तब सारे देश में उपभोक्ताओं के हित में हंगामा होता है। पर जब किसानों को वाजिब कीमत नहीं मिलती है और वह अपनी उपज सड़कों पर फेंकता है, तब कोई हंगामा नहीं होता। क्या कारण है कि सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए ही सरकार सक्रिय होती है, किसानों के लिए नहीं? किसान जब अपनी फसल को औने-पौने दाम में बेचने के बजाय उसे सड़कों पर फेंकता है, तो उसे कितनी पीड़ा होती होगी और उसकी आजीविका पर कितना असर पड़ता होगा, इसे समझने की जरूरत है। सरकार किसानों के लिए एक योजना लेकर आई थी 'टॉप' (टमाटर, ओनियन, पोटेटो), उसे और सुदृढ़ करने की जरूरत है और सब्जियों का एक आधार मूल्य तय करना चाहिए, अगर कीमत उससे कम होती है, तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसकी भरपाई किसानों को करनी चाहिए। 

केरल ने सभी सब्जियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। इससे सबक लेकर सब्जियों के लिए एक आधार मूल्य पूरे देश में तय होना चाहिए। यही किसानों की असली आजादी है। पंजाब के किसान भी इसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

 
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