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भाषा: नेताजी ने न सिर्फ हिंदी सीखी, कांग्रेस और आजाद हिंद फौज में बढ़ावा भी दिया
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आजाद हिंद फौज
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सोशल मीडिया
विस्तार
हिंदी के विकास में बंगाल, विशेषकर कोलकाता का योगदान बहुत ज्यादा है। हिंदी ही भावी भारत की संपर्क भाषा होगी, यह विचार पहली बार बंगाल की धरती के ही आचार्य केशवचंद्र सेन ने 1875 में दिया था। कोलकाता की ही धरती पर 1830 में पहला हिंदी अखबार निकला। कोलकाता में 26-28 मार्च, 1929 को हिंदी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था। उसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे, जिन्होंने हिंदी में भाषण दिया था। उन्हें पता था कि हिंदी के विकास में कोलकाता का क्या स्थान है। तब कोलकाता में करीब पांच लाख हिंदी भाषा-भाषी लोग रहते थे।तब नेताजी ने बांग्ला भाषियों से हिंदी सीखने और हिंदी के प्रति कोई आग्रह न रखने को लेकर अपील भी की थी। उन्होंने महात्मा गांधी समेत हिंदी साहित्य सम्मेलन के लोगों से भी अपील की थी कि मद्रास प्रांत की तरह वे बंगाल और असम में भी हिंदी के प्रचार का प्रबंधन करें। उन्होंने कोलकाता और बंगाल में हिंदी पढ़ाने के लिए लोगों से कहा भी था। उन्हें उम्मीद थी कि इसकी वजह से बहुत सारे बंगाली छात्र हिंदी पढ़ने के लिए तैयार हो जाएंगे। उन्होंने बंगाल के छात्रों को छात्रवृत्ति देकर हिंदी का प्रचारक बनाने का भी प्रस्ताव दिया था।
नेताजी उन दिनों मजदूरों के बीच भी काम कर रहे थे। तब उन्हें समझ आया कि आम बोलचाल की भाषा के बिना बुनियादी स्तर पर सहज संपर्क स्थापित नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशा जताई थी कि यदि तन-मन-धन से प्रयत्न किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी। नेताजी को लगता था कि अगर हिंदी को सहज संपर्क भाषा के रूप में अपना लिया गया और दिल-खोलकर लोग इसे सीखेंगे, तो आने वाले दिनों में प्रांतीय वैचारिक खाइयों को पाटने में हिंदी ही मददगार होगी।
वर्ष 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष चुने जाने के बाद नेताजी ने हिंदी में ही भाषण देते हुए कहा था, 'यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है, तो उसका माध्यम हिंदी ही हो सकती है। बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊं, तो किस भाषा में बोलूं? इसलिए कांग्रेस का सभापति बनकर मैं हिंदी खूब अच्छी तरह न जानूं, तो काम नहीं चलेगा।' इसलिए उन्होंने हिंदी सीखने पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने लक्ष्मीनारायण तिवारी नाम के सज्जन से हिंदी सीखी।
आजाद हिंद फौज में भी उन्होंने हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया। नेताजी समझते थे कि जिस देश के पास अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता। उन्होंने कहा था कि भारत की स्वाभाविक लोकभाषा हिंदी एवं उर्दू का मिश्रण होगी, जो देश के बड़े भाग में बोली भी जाती है। उन्होंने इसे लिखने के लिए देवनागरी अथवा उर्दू यानी फारसी, दोनों लिपियों को सुझाया था। यहां पर वे गांधी और विनोबा से अलग विचार रखते हैं। गांधी ने जहां हिंदी और उर्दू-दोनों के लिए देवनागरी लिपि अपनाने का सुझाव दिया, वहीं विनोबा इससे एक कदम आगे, भारत की सभी भाषाओं को नागरी लिपि अपनाने पर जोर देते रहे।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से ब्रिटिश सेना पर हमला किया। नेताजी की अगुआई में पूर्वी भारत के कई हिस्सों पर आजाद हिंद फौज ने कब्जा कर लिया था। तब नेताजी ने फौज को प्रेरित करने के लिए हिंदी में नारा दिया था, 'दिल्ली चलो।' जब आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप छीन लिए, तो नेताजी ने इन द्वीपों को 'शहीद द्वीप' और 'स्वराज द्वीप' नाम दिया। आजाद हिंद फौज का प्रयाण गीत- कदम-कदम बढ़ाए जा/खुशी के गीत गाए जा/यह जिंदगी है कौम की, तू कौम पे लुटाए जा-आज भी भारतीय सेनाओं का प्रयाण गीत बना हुआ है, जिसे रामसिंह ठाकुर ने लिखा था। यह गीत भी हिंदी के प्रति नेताजी की सोच के बारे में बताता है। गैर हिंदीभाषी होते हुए भी हिंदी को लेकर नेताजी की सोच इस बात की द्योतक है कि हिंदी को आगे बढ़ाने में हमारे स्वाधीनता संग्राम के नायकों ने कैसा योगदान दिया।