मंजिलें और भी हैं: खेल ने मुझे दिखाई जीवन की नई राह
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उस समय मेरी उम्र बीस-इक्कीस वर्ष की थी। समझदारी के बारे में तो कह नहीं सकता, पर किसी भी काम को लेकर मुझमें जोश थोड़ा ज्यादा था। मेरे पिता सरकारी अस्पताल में ड्राइवर की नौकरी करते थे। मैं त्रिपुरा की राजधानी अगरतला का रहने वाला हूं। पापा सरकारी नौकरी में थे, तो जिंदगी आराम से कट रही थी। एक दिन अचानक पापा चल बसे। उनकी मृत्यु के बाद मेरी नौकरी विद्युत विभाग में लग गई, लेकिन नौकरी में मेरा मन नहीं लगता था।
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उस समय मेरी उम्र बीस-इक्कीस वर्ष की थी। समझदारी के बारे में तो कह नहीं सकता, पर किसी भी काम को लेकर मुझमें जोश थोड़ा ज्यादा था। मेरे पिता सरकारी अस्पताल में ड्राइवर की नौकरी करते थे। मैं त्रिपुरा की राजधानी अगरतला का रहने वाला हूं। पापा सरकारी नौकरी में थे, तो जिंदगी आराम से कट रही थी। एक दिन अचानक पापा चल बसे। उनकी मृत्यु के बाद मेरी नौकरी विद्युत विभाग में लग गई, लेकिन नौकरी में मेरा मन नहीं लगता था।
उसी दौरान मैंने एक राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ले ली। जवानी का जोश मेरे सिर चढ़कर बोल रहा था। कुछ ही समय में मेरा नाम मशहूर होने लगा। एक दिन हम सब बम बनाने का प्रशिक्षण ले रहे थे, तभी वह फट गया, जिससे मेरे हाथों के चीथड़े उड़ गए। मैं चार महीने अस्पताल में रहा, जहां मेरा इलाज चला। मुझे इस बात का जिंदगी भर अफसोस रहेगा कि जिन लोगों के लिए मैं जान पर खेल जाया करता था, उन्होंने मेरी कोई मदद नहीं की, यहां तक कि मेरा हालचाल लेने भी वे नहीं आए। उस हादसे और नेताओं के रवैये ने मेरी आंखें खोल दीं। मेरी जिंदगी ने एकदम रुख बदला। मैं शर्म से भर जाता था कि मैंने घरवालों की बात क्यों नहीं सुनी।
ऑपरेशन के बाद मैं उस क्लब में भी गया, जहां कभी फुटबॉल खेला करता था। लोगों को खेलते देख मैं पछतावे से भर गया था। अभी मैं स्वस्थ भी नहीं हो पाया था, कि इससे पहले मेरी मां की मौत हो गई। मैं जिंदगी से पूरी तरह निराश हो गया था। इस दौरान खेल में मुझे दोबारा जीने की उम्मीद नजर आई। इस बीच मुझे पुणे के डॉक्टर श्याम भादुड़ी के बारे में पता चला। मैंने उनसे संपर्क किया, तो उन्होंने करीब पांच महीने तक मेरा उपचार किया और किसी तरह से दायां हाथ इस तरह बना दिया, जिससे कि मैं टेबल टेनिस खेल सकूं। इसके बाद मैंने टेबल टेनिस खेलना शुरू किया। मैं अगरतला में अंतर विभागीय टेबल टेनिस खेलता हूं। साथ ही मैंने अगरतला में एक मल्टीनेट टेबल टेनिस सेंटर बनाया है। पूरे त्रिपुरा में ऐसा सेंटर किसी के पास नहीं है।
इस बात का मुझे गर्व है। मैने इंदौर में आयोजित पहली राष्ट्रीय पैरा टेबल टेनिस चैंपियनशिप में भाग लेने के बारे में सोचा था। चूंकि मेरे दोनों हाथ नहीं हैं, लिहाजा मैं विमान से एक सहयोगी के साथ इंदौर पहुंचा, लेकिन पहले ही दौर में हार गया। इस बात का मुझे मलाल रहेगा कि यदि मैं उस राष्ट्रीय स्पर्धा में क्वालिफाई कर पाता, तो अपने वर्ग में वहां से पदक लेकर ही लौटता। मैं चाहता हूं कि अपने अनुभव का लाभ बच्चों को दूं, ताकि अधिक से अधिक प्रतिभाएं राष्ट्रीय नक्शे पर त्रिपुरा का नाम रोशन कर सकें।
अपनी गलतियों पर अफसोस मुझे आज भी होता है, लेकिन जिंदगी के प्रति मेरा उत्साह इस खेल ने लौटा दिया। मेरा मानना है कि जीवन में कामयाबी यों ही नहीं मिलती है, उसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, विपरीत हालात का सामना करना होता है और मन को मजबूत बनाना पड़ता है। एक उम्मीद मन में जगानी पड़ती है, तब जाकर मंजिल का सफर तय किया जा सकता है।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)