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संगीत: जीवन में लय लौटी, सुर-ताल की शक्ति ने महामारी को किया अशक्त
Wed, 27 Dec 2023 05:42 AM IST
गुलाम अहमद
उस्ताद अकरम खान
उस्ताद अकरम खान
Published by: गुलाम अहमद
Updated Wed, 27 Dec 2023 05:42 AM IST
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विस्तार
कोरोना के बाद मन में घर कर गई एक प्रकार की दहशत से उबरने की ताकत हमें संगीत ने ही दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस महामारी के बाद संगीत की शक्ति एक बार फिर सामने आई। पहले वर्चुअली और फिर फिजिकली आयोजन होने शुरू हुए। 2023 में संगीत के कार्यक्रम तकरीबन पहले की तरह होने लगे। संगीत के रसिकों, प्रेमियों और जानकारों ने नए-नए प्रयोग किए। 2023 में एक नया सिलसिला भी शुरू हुआ। संगीत के जो बड़े-बड़े फनकार रहे हैं, उनकी जन्म सदी पर देश भर में संगीत समारोह आयोजित किए गए।
मशहूर तबला वादक पंडित किशन महाराज जी और प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित कुमार गंधर्व साहब की जन्म शताब्दियों पर पूरे देश में अनेक स्थानों पर संगीत उत्सव आयोजित हुए। ‘सप्तक फेस्टिवल’ में पूरा एक दिन उस्ताद अमीर खान साहब को समर्पित किया गया है। इससे पहले किसी कलाकार की स्मृति में इतने व्यापक रूप में संगीत के कार्यक्रम आयोजित नहीं हुए। यह सिलसिला 2024 में भी यों ही चलते रहना चाहिए। यह हम कलाकारों का भी कर्तव्य है और रसिकों का भी।
जहां तक परिवर्तन का सवाल है तो हर 25, 30, 40 साल में बदलाव आता ही है। हमारे जमाने में ठुमरी, दादरा का बहुत जोर था, अब लोग हर तरह का संगीत सुनना चाहते हैं। विदेश के लोग भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनना पसंद कर रहे हैं, हमारे यहां फ्यूजन सुना जा रहा है। यह स्वाभाविक है। रिद्म यानी लय तो यूनिवर्सल है। वह पश्चिम में भी उतने ही बीट्स की है और हिंदुस्तानी संगीत में भी उतने ही बीट्स की। बस, भाषा का फर्क है, अभिव्यक्ति वही है। मैं जिस तबले को जीता हूं, उसमें भी सभी घरानों के कलाकार नित नए प्रयोग कर रहे हैं। लग्गियां हमेशा ठुमरी, दादरा के साथ बजती हैं, लेकिन मेरे पिता जी उस्ताद हशमत अली खान साहब ने एक नया प्रयोग करते हुए उनको सोलो वादन में बजाया है।
सोलो में कायदे के साथ लग्गियां बजाने का यह अनूठा प्रयोग उन्होंने इसलिए किया, ताकि लग्गियां भी तबले के रिकॉर्ड में रहें और श्रोता भी जुड़े रहें। उस्ताद जाकिर हुसैन ने तबले में साउंड को लेकर बहुत प्रयोग किए हैं, लेकिन यह भी सच है कि आज से 50 साल पहले पंडित कंठे महाराज जी, मेरे दादा मुहम्मद शफी खान साहब या नत्थू खान साहब माइक्रोफोन के बिना तबला वादन करते थे। अगर उनके जमाने में इतनी समृद्ध तकनीक होती तो शायद वे भी कुछ और नए प्रयोग कर चुके होते।
हमारे बुजुर्गों ने तबले को हर्ष-उल्लास का वाद्य माना है। आप होली के गीत गाएंगे, तो उसमें जो ठेका बजता है, उससे लोग नाचने लगते हैं। अगर ठुमरी, कजरी, चैती में संगत करेंगे, तो तबला उनका माहौल तैयार कर देगा। फिल्मी गाने के साथ तबला बजाएंगे, तो वह वैसा वातावरण रच देगा। यह सदाबहार साज है। ताल भले न समझ आए, लेकिन श्रोताओं के हाथ-पैर थिरकने लगते हैं।
पंडित बिरजू महाराज का शोध है कि हर चीज में लय है। तो हमारे यहां रिद्म तो जन्मजात है। इसलिए अगर हम नए साल में संगीत से जुड़े रहेंगे, सुर-लय-ताल से जुड़े रहेंगे, तो हमारी बहुत-सी दिक्कतें, तनाव दूर हो जाएंगे। हम दुनियावी परेशानियों से मुक्त हो जाएंगे। इसलिए संगीत से जुड़े रहें, अच्छा संगीत सुनें और अच्छा सोचें।