फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Start of a new politics

पार्टी की लंबी छलांग और राजनीति का नन्हा कदम

Wed, 11 Feb 2015 05:00 AM IST
योगेंद्र यादव
योगेंद्र यादव Updated Wed, 11 Feb 2015 05:00 AM IST
विज्ञापन
Start of a new politics
चांद पर पहला कदम रखते वक्त नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था, 'एक मानव के लिए यह एक छोटा कदम है, लेकिन मानवता के लिए लंबी छलांग है।' टीवी पर दिल्ली के चुनाव परिणाम देखते हुए बार-बार यह बात याद आ रही थी। बस इस बात को तनिक बदलकर कहने की जरूरत है।
विज्ञापन


दिल्ली का चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी जैसे शिशु के लिए एक लंबी छलांग है। लेकिन देश की राजनीति बदलने के हमारे सपने की दिशा में एक नन्हा सा कदम भर है। पिछले तीन-चार हफ्तों से यह एहसास गहरा रहा था कि दिल्ली की चुनावी फिजा में हवा नहीं आंधी चल रही है।
विज्ञापन


जब मैं यह कहता था तो लोग इसे चुनावी प्रचार समझते थे। हमने बाकायदा सर्वे करवाया और उसके परिणाम सार्वजनिक भी किए। मैंने कहा था कि आम आदमी पार्टी को 51 सीट आने की संभावना है और यह आंकड़ा 57 तक जा सकता है। खैर, नतीजे तो उससे भी पार निकल गए। अपनी भविष्यवाणी गलत निकलने की इतनी खुशी शायद कभी नहीं हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह एक ऐतिहासिक जीत है। सिर्फ जीत के अंतर की वजह से नहीं, क्योंकि तमिलनाडु में शायद एक दो बार ऐसी जीत हुई थी, जब विपक्ष लगभग खत्म हो गया था। आप को भाजपा पर 22 फीसदी से ज्यादा की बढ़त हासिल हुई है। जाहिर है, ऐसी जीत सिर्फ एक वर्ग या समुदाय के समर्थन से नहीं मिलती।

शुरू-शुरू में आप को गरीब, मेहनतकश, झुग्गी-झोपड़ी के लोगों में ज्यादा समर्थन मिला। पर चुनाव का दिन आते-आते मध्य वर्ग और संपन्न तबका भी आप की ओर झुका। आम तौर पर चुनावी विश्लेषण में 'जनादेश' शब्द का दुरुपयोग होता है। पर अगर चुनाव ने कभी भी जनादेश देखा है, तो वह इस चुनाव में देखा है।

यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है कि महज 10 महीने पहले सारी सीटें हारने और 14फीसदी फीसदी वोट से पिछड़ने के बाद शायद ही कोई पार्टी इस तरह से कभी सत्ता में वापिस आई है। कर्नाटक में 1985 में रामकृष्ण हेगड़े ने यह कमाल किया था, पर आज की मिसाल के सामने वह जीत भी फीकी है। जाहिर है, ऐसी बड़ी सफलता से बड़े निष्कर्ष निकाले जाएंगे। मोदी लहर के खत्म होने और देश की राजनीति के पलटने की बातें शुरू हो गई हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले साल भर से देश में भाजपा के चुनावी अश्वमेध यज्ञ के दौड़ते घोड़े को एक छोकरे ने रोक लिया है। प्रधानमंत्री ने नाहक ही इस चुनाव को अपनी नाक का सवाल बना लिया, जाहिर है उनकी प्रतिष्ठा पर छींटे तो पड़ेंगे हीं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मोदी-युग समाप्त हो गया है। प्रधानमंत्री पहले एक दो साल लोकप्रिय रहते हैं। अभी भी देश की जनता ने प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी को खारिज नहीं किया है। बिहार और उत्तर प्रदेश में बिना आम आदमी पार्टी जैसा विकल्प पेश किए भाजपा की हार की भविष्यवाणी करना बहुत नासमझी होगी।

आज से तीन साल पहले देश के लोगों ने एक आशा बांधी थी। नेताओं को राजा और अपने आप को बेबस प्रजा मानने वाली जनता ने अपने आप में भरोसा करना सीखा था। इस भरोसे का प्रतीक बनी थी आम आदमी पार्टी। आज यह आशा का दीया दुबारा जगमगा उठा है। मगर आम आदमी पार्टी जिस आंदोलन से पैदा हुई है, उसका ध्येय सिर्फ दिल्ली का चुनाव जीतना नहीं था।


यह आंदोलन देश के सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ आम आदमी की आवाज है, लोकतंत्र में तंत्र से दबे लोक की पुकार है। इस आंदोलन की आकांक्षा देशभर में वैकल्पिक राजनीति स्थापित करने से कम नहीं हो सकती। सुनते हैं, चांद पर गुरुत्वाकर्षण कम होने के कारण कदम हलके पड़ते हैं। आज इस विजय में ऐसा ही हल्कापन महसूस हो सकता है। पर जन-आकांक्षाओं के बोझ से भारी दुनिया में कोई वजन नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed