फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Stake in the development of margins

विकास में हाशिये के लोगों की भी हिस्सेदारी

Tue, 22 Apr 2014 07:04 PM IST
सुधांशु रंजन
सुधांशु रंजन Updated Tue, 22 Apr 2014 07:04 PM IST
विज्ञापन
Stake in the development of margins

राजनीतिक दलों द्वारा जारी घोषणा-पत्र सुनहरे भविष्य को आकार देते हैं। यह दीगर है कि इनमें किए गए वायदे शायद ही पूरे होते हैं, परंतु सत्ता में आने के बाद कोई दल यदि उन वायदों को पूरा करता है, तो उसकी वैधता पर सवाल उठाना मुश्किल होगा भले ही वे विवादास्पद क्यों न हों। ऐसा माना जाएगा कि जनता ने उन नीतियों एवं वायदों को अपना समर्थन दिया है। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में निजी क्षेत्र में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) के लिए सहमति बनाने की बात की है, जबकि जनता दल (एकीकृत) ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ी जातियों के लिए निजी क्षेत्र में नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान करने का वायदा किया है।

विज्ञापन


विकास की दौड़ में पीछे रह गए दबे-कुचले लोगों के लिए सकारात्मक कार्रवाई की जरूरत है। किंतु भारत में इसका अर्थ सिर्फ आरक्षण मान लिया गया है। कांग्रेस का घोषण-पत्र आते ही कॉरपोरेट जगत की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई कि यह निकृष्टतम किस्म का लोकलुभावन वायदा है, जिससे कार्यकुशलता प्रभावित होगी।
विज्ञापन


पूंजीवादी सिद्धांतों के अनुसार सरकार को किसी के काम में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। जॉन लॉक का तो स्पष्ट मत था कि सरकार का दायित्व मात्र व्यक्ति की जान एवं उसकी संपत्ति की रक्षा करना है। पर जनकल्याणकारी राज्य में यह तर्क स्वीकार्य नहीं है। हर आर्थिक गतिविधि का एक वृहत्तर उद्देश्य समाज एवं राष्ट्र का लाभ भी होता है। केवल मुनाफा कमाना किसी व्यापार का उद्देश्य नहीं हो सकता। इसके अलावा निजी क्षेत्र में उद्योग स्थापित या व्यापार करने के लिए उद्यमी वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेते हैं इसलिए उनकी एक नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है समाज के प्रति। सार्वजनिक क्षेत्र में तो नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है। इसके बावजूद तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, एनटीपीसी, भारतीय तेल निगम (आईओसी) जैसी नवरत्न कंपनियां अच्छा काम कर रही हैं और उनकी कार्यकुशलता प्रभावित होती नहीं दिख रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारत में निजी क्षेत्र में केवल 6.5 % कार्य संगठित क्षेत्र में हो रहे हैं। यही वह क्षेत्र है, जहां उत्कृष्ट रोजगार की गुंजाइश है। उदारीकरण, निजीकरण के बाद सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बहुत कम हुई हैं। इसलिए निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर काफी बढ़े हैं। नई दिल्ली स्थित मानव विकास संस्थान ने इंडिया लेबर ऐंड एम्प्लायमेंट रिपोर्ट 2014 जारी की है, जिसके अनुसार केवल जाति के कारण ही पिछड़ापन नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय विषमता भी पिछड़ेपन का बहुत बड़ा कारण है।

दलितों की आधी आबादी पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश) में बसती है। आदिवासी देश के 15 प्रतिशत भूभाग में बसते हैं। परंतु उद्योग अधिकतर दक्षिण एवं पश्चिमी भारत में लगे हैं। इससे मध्य भारत एवं पूर्वी हिस्से के निवासियों को निजी क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पाता है। ये वही इलाके हैं, जहां गरीबी सबसे ज्यादा है। देश की 47 प्रतिशत आबादी इन्हीं क्षेत्रों में बसती है, जबकि सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों में उनकी भागीदारी क्रमशः 35 एवं 27 प्रतिशत है।


रोजगार के समान अवसर न होने के कारण विषमता भी काफी बढ़ी है। परंतु सवाल फिर वही उठता है कि क्या आरक्षण ही एक मात्र जरिया है? सकारात्मक कार्रवाई में आरक्षण के अलावा भी कई उपाय हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना का दृष्टिकोण पत्र है- समावेशी विकास की चुनौती। इसलिए विकास की परिधि के अंदर सबको लाकर विषमता कम करना राज्य का दायित्व है। दलितों, आदिवासियों एवं पिछड़ों को सशक्त करने के लिए उन्हें शिक्षित किया जाना चाहिए तथा व्यापार शुरू करने के लिए आर्थिक मदद की जानी चाहिए। इससे वे न केवल अपने पैर पर खड़े होंगे, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे पाएंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed