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श्रीमद्भगवद्गीता: ऐसी धारणा करें कि भगवान मुझे ही उपदेश दे रहे हैं; विश्वासी और श्रद्धावान बनें
Wed, 11 Dec 2024 05:21 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
स्वामी सत्यानंद
स्वामी सत्यानंद
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 11 Dec 2024 05:21 AM IST
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विस्तार
श्रीकृष्ण भगवान के श्रीमद्भगवद्गीतारूप गीत बड़े सरल, अतिशय सुंदर, बहुत ही बलाढ्य, अतीव सारगर्भित और अत्यंत उत्तम हैं। उनमें सत्य का और तत्व ज्ञान का निरूपण अत्युत्तम प्रकार से किया गया है। उनके श्रवण, पठन, मनन और निश्चय करने से मनुष्य का अंतरात्मा अवश्यमेव जग जाता है, उसके चिदाकाश में सत्य का प्रकाश अवश्य ही चमक उठता है और उसका परम कल्याण होने में संदेह तक नहीं रह जाता। गीता के उपदेशामृत को भावना सहित पान कर लेने से भगवद्भक्त को परमेश्वर का परमधाम आप ही आप सुगमता से प्राप्त हो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग की बड़ी महिमा है। कर्मों के फलों में आशा न लगाकर कर्तव्यबुद्धि से कर्म करना कर्मयोग है।
कर्तव्यों को करते हुए मोह में, ममता में तथा लालसा आदि में मग्न न हो जाना अनासक्ति है। अपने सारे कर्मों को, अपने ज्ञान-विज्ञान, तर्क-वितर्क और ममता सहित, मन, वचन, काया से श्रीभगवान की शरण में समर्पण कर देना, कर्तापन का अभिमान न करना और अपने आप सहित कर्ममात्र को विधाता की भक्ति की वेदी पर बलि बना देना भक्तिमय कर्मयोग, सच्चा संन्यास है। श्रीकृष्ण के समय में लोग ज्ञान और संन्यास को मतरूप मानते थे और कर्म की निंदा किया करते थे। इसलिए श्रीकष्ण ने कर्तव्य पालन पर अधिक बल दिया और कर्मत्याग का निषेध किया है। श्रीमद्भगवद्गीता को अपने जीवन में आत्मसात करने वाला व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में डगमगाता नहीं है। महात्मा गांधी इसके सच्चे उदाहरण हैं। गांधीजी कहते थे कि अंग्रेजों से लोहा लेते हुए जब वह थक जाते हैं, तो वह गीता मां की गोद में विश्राम करने के लिए चले जाते हैं और फिर नई ऊर्जा हासिल कर उस शक्तिशाली सत्ता का सामना करने के लिए उठ खड़े होते हैं। गांधीजी अपनी नित्य प्रार्थना में श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को भी शामिल किया करते थे। श्रीमद्भगवद्गीता में सांख्य, पातंजल और वेदांत का समन्वय है। इसका पाठ करने वाले स्त्री-पुरुष को ऐसी धारणा बनानी चाहिए कि मैं अर्जुन हूं और मुझ में पाप, अपराध, अकर्मण्यता, कर्तव्यहीनता, कायरता, दुर्बलता आदि जो भी दुर्गण हैं, उनको जीतने के लिए श्रीकृष्ण भगवान मुझे ही उपदेश दे रहे हैं। मेरी ही आत्मा की अमरसत्ता को जगा रहे हैं। मेरे ही चैतन्य रूप का वर्णन कर रहे हैं और आलस्य रहित होकर, समबुद्धि से स्वकर्तव्य कर्म करने को मुझे ही प्रेरित, उत्तेजित तथा उत्साहित करने में तत्पर हैं। श्रीभगवान का मैं ही प्रिय शिष्य हूं, परमप्रिय भक्त हूं और श्रद्धालु श्रोता हूं। ऐसे उत्तम विचारों से गीता का पाठक भगवान की कृपा का पात्र बन जाता है और उसमें गीता का सार सहज से समाने लग जाता है। भगवान ने श्रीमुख से स्वयं कहा है कि गीता का पाठ करना और उसको सुनना-सुनाना ज्ञान यज्ञ है, उससे मैं पूजा जाता हूं। श्रीमद्भगवद्गीता में नारायणी गीता का भी पूरा प्रतिबिंब विद्यमान है। इसका अपना मौलिकपन भी महामधुर और मनमोहक है।
सूत्र:विश्वासी व श्रद्धावान बनें
श्रीमद्भगवद्गीता के पाठक को चाहिए कि वह विश्वासी और श्रद्धावान यजमान बनकर बड़े गंभीर भाव से इस यज्ञ को किया करे और इसको परमेश्वर का पुण्यरूप परम पूजन ही समझे। सत्य पथ को प्रदर्शित करने के लिए संसार भर में गीता एक अद्वितीय और अद्भुत ज्योति स्तंभ है।