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कृषि कानूनों पर बंटा दक्षिण, कहीं विरोध तो कहीं समर्थन 

Mon, 05 Oct 2020 01:22 AM IST
भास्कर साई एम. भास्कर साई
एम. भास्कर साई Published by: भास्कर साई Updated Mon, 05 Oct 2020 01:22 AM IST
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South indian states divided over agricultural laws
agriculture law

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के दस्तखत के बाद तीनों कृषि विधेयक अब कानून बन चुके हैं, लेकिन पिछले दिनों जब संसद से ये तीनों विधेयक पारित हुए थे, तब देश के दूसरे हिस्सों की तरह तमिलनाडु में भी राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ। सहयोगी भाजपा के साथ कई मुद्दों पर कथित मतभेदों के बावजूद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक जहां इन कानूनों का समर्थन कर रहा है, वहीं स्टालिन के नेतृत्व में मुख्य विपक्षी दल द्रमुक भाजपा से संबंधित हर चीज का विरोध कर रहा है और अपने सहोगियों के साथ इनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। 


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हाल ही में द्रमुक ने राज्य भर में अपने सहयोगी दलों (कांग्रेस, एमडीएमके, वीसीके इत्यादि) के साथ विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें स्टालिन किसान के वेश में शामिल हुए। चूंकि द्रमुक का प्रथम परिवार कई मीडिया हाउस  संचालित करता है, ऐसे में, मीडिया ने ऐसी तस्वीर पेश की कि यह विरोध प्रदर्शन केवल किसानों और द्रमुक द्वारा किया जा रहा है। जबकि अन्नाद्रमुक का आरोप है कि द्रमुक किसानों को उकसा रहा है और राजनीतिक कारणों से उनमें भय फैला रहा है। मुख्यमंत्री पलानीस्वामी का, जो खुद को अक्सर गर्व से किसान कहते हैं, कहना था, 'एम के स्टालिन को कृषि के बारे में कुछ भी नहीं पता। एक किसान के रूप में मैं कह सकता हूं कि ये कानून रैयतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। नए कानून उन्हें केवल लाभान्वित करेंगे।' उनका यह भी कहना था कि इन कृषि कानूनों से तमिलनाडु के किसानों को स्थायी आय का लाभ मिलेगा। राज्य के कृषि मंत्री आर. दोराइकानू और कृषि सचिव गगनदीप सिंह बेदी के अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती) का कानून किसानों को उनकी उपज खरीदने वाली कंपनियों के साथ अनुबंध के जरिये कृषि उपज का उचित मूल्य दिलाने में मदद करेगा। 

हालांकि, स्टालिन इन दावों को खारिज करते हुए कहते हैं, 'कानून की समीक्षा करने और उस पर टिप्पणी करने के लिए किसान होने की जरूरत नहीं है। कृषि का बुनियादी ज्ञान और किसानों के कल्याण की चिंता इसके लिए पर्याप्त है। पलानीस्वामी को किसान होने का दावा करने का भी कोई नैतिक अधिकार नहीं है।' स्टालिन इस पर हैरानी भी व्यक्त करते हैं कि अन्नाद्रमुक ने इस मुद्दे पर केंद्र का समर्थन आखिर क्यों किया। वह कहते हैं कि मुख्यमंत्री इस विधेयक में कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का जिक्र ढूंढकर दिखाएं। 'अगर वह ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें किसानों से माफी मांगनी चाहिए।' स्टालिन ने इन कानूनों का विरोध करते हुए  पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और अन्य राज्यों के किसान द्वारा किए जा रहे विरोधों का भी जिक्र किया है। 

हालांकि तमिलनाडु कावेरी डेल्टा किसान वेलफेयर एसोसिएशन ने कहा है कि नए कृषि कानून तमिलनाडु के किसानों को प्रभावित नहीं करने वाले हैं। चूंकि तमिलनाडु में गन्ना, कॉफी और पोल्ट्री में अनुबंध प्रणाली पहले से ही है, इसलिए ये कानून इन प्रणालियों को सुव्यवस्थित और नियमित ही करेंगे। इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसानों पर दबाव बनाए या उसे प्रभावित करे। केंद्र का कानून किसान और खरीदार, दोनों के हितों की रक्षा करेगा और किसानों को मूल्य में गिरावट से बचाएगा। किसानों को उनके हिस्से का लाभ निश्चित रूप से मिलेगा और इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। 

किसानों के व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून किसानों को अपनी उपज बेचने की पूरी आजादी देगा, क्योंकि वे अपने उत्पादों को कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। इससे कृषि उत्पादों के बाजार के बुनियादी ढांचे का भी विकास होगा। यह कानून राज्य के भीतर और बाहर, दोनों जगह पारदर्शी व्यापार का मार्ग प्रशस्त करेगा। विपक्ष के आरोपों के विपरीत, किसानों को पैन नंबर की आवश्यकता नहीं है। केवल उनसे कृषि उपज खरीदने वाले व्यापारियों को पैन की आवश्यकता होगी। जहां तक आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून का संबंध है, तो यह खाद्यान्न, दाल, आलू, प्याज, खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं के नियमितीकरण का मार्ग प्रशस्त करता है और असाधारण स्थितियों के दौरान मूल्य वृद्धि को रोक देगा। तमिलनाडु में जन वितरण प्रणाली के लिए किसानों से खरीद जारी रहेगी। 

तमिलनाडु में, जहां विधानसभा चुनावों में सिर्फ पांच महीने बचे हैं, राजनीतिक दल कृषि कानूनों का समर्थन और विरोध कर बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल का मानना है कि ये कानून किसान और उनके परिजनों को फायदा पहुंचाएंगे, जो कई निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करते हैं। जबकि विपक्षी खेमा किसानों को आश्वस्त कर रहा है कि अगर उन्होंने उसे वोट दिया, तो सत्ता में आने के बाद वे इन कानूनों को खत्म कर देंगे। जहां तक पड़ोसी राज्य केरल का संबंध है, तो मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने दोटूक कहा है कि उनकी सरकार इन कृषि कानूनों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय
में जाने की संभावना तलाश रही है। विजयन ने कहा कि यह मामला मंत्रिमंडल में आया था और कानून विभाग देख रहा था। केरल सरकार ने किसानों के हित में इन कानूनों  का विरोध किया है। केरल से कांग्रेस सांसद टी. एन. प्रतापन ने नए कृषि कानूनों के कई प्रावधानों की सांविधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। कर्नाटक में भी विपक्षी दल विधेयक का विरोध कर रहे हैं। 

तेलंगाना की सत्तारूढ़ पार्टी टीआरएस ने संसद में कृषि विधेयकों का विरोध किया था, लेकिन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव अब विरोध को तूल देना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें केंद्र सरकार की मदद की जरूरत है। आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस ने नए कृषि कानूनों का समर्थन किया है। जाहिर है कि दक्षिण भारत में नए कृषि कानूनों का समर्थन और विरोध, दोनों देखा जा सकता है। लेकिन आज सुदूर गांवों में रहने वाले किसान भी तकनीक से लैस हैं और राजनेता उन्हें आसानी से धोखा नहीं दे सकते। किसान जानते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा।

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