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बिगड़ी तस्वीरों का अलबम सजाते हुए कुछ नया
कल्लोल चक्रवर्ती
Updated Sat, 04 Jan 2014 01:05 PM IST
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प्रियदर्शन, पीयूष दईया और संजीव ठाकुर के पहले काव्य संग्रह से समकालीन हिंदी कविता के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। बल्कि कविता की इन तीन किताबों में कोई समानता भी नहीं है। इनमें बस एक समानता है ये तीनों केवल कवि के रूप में नहीं जाने जाते। प्रियदर्शन की कविताएं वाद और फैशन से परे मनुष्यत्व की मुकम्मल परिभाषा तक जाती हैं।
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महानगरीय जीवन से जुड़े होने के बावजूद ये अपनी जड़ से अविच्छिन्न हैं। यहां अपनी मां की आकुल करने वाली स्मृति है, तो गुजर चुके साथियों की करुण यादें भी। यहां महानगर में हारी हुई लड़ाई लड़ रहे लोग भी हैं। ये कविताएं प्रकारांतर से स्वीकारती हैं कि समाज के एक हिस्से में ऐसी यंत्रणा है, तो इसके लिए हम भी कम दोषी नहीं। 'आमने-सामने कवि' प्रियदर्शन की एक चर्चित कविता है, जो हिंदी के दो चर्चित कवियों के बारे में है।
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शुरुआत में व्यंग्य का आभास दिलाती हुई यह कविता अंत तक पहुंचते-पहुंचते महानगरीय जीवन के उस विद्रूप को निशाने पर लेती है, जिसमें किसी को किसी के लिए समय नहीं है और आखिर में इस भरोसे तक पहुंचती है कि बेहतर हो कि ये दो कवि अच्छे पड़ोसी भी बने रहें। सिर्फ यही नहीं कि प्रियदर्शन किसी तरह की हड़बड़ी में नहीं दिखते, बल्कि इस संग्रह के जरिये उनकी काव्य यात्रा की पड़ताल भी की जा सकती है।
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पीयूष दईया संपादन, अनुवाद और कला-संस्कृति की दुनिया में जितने चर्चित हैं, एक कवि के रूप में उतने ही अलग और लीक से हटकर। समकालीन हिंदी कविता में उनकी मौजूदगी बहुत अधिक नहीं है, फिर अपने जटिल काव्यगत विन्यास और कला तत्व की प्रधानता के कारण भी उन्हें एक खास मिजाज के कवि के तौर पर सीमित कर दिया गया है। यह सच है कि उनकी कविताएं बहुत कम खुलती हैं।
अपनी छोटी कविताओं में भी मितकथन को उन्होंने शैली में बदल दिया है, जो दिवंगत पिता पर लिखी हुई उनकी कविताओं में ज्यादा प्रभावी ढंग से सामने आता है। लेकिन 'मेरा झूठ बगुले के पंख की तरह सफेद था' और 'तरकीब' जैसी कविताएं बताती हैं कि कलावादी का ठप्पा लगा दिए जाने के बावजूद वह समकालीन जीवन के विद्रूप की अनदेखी नहीं करते। उनकी कुछ कविताओं में अनुप्रास के प्रयोग अच्छे लगते हैं, तो सन्निपातसिफत, पर्णहीन दरख्त और अनाप्त...वक्फों पर जैसे संस्कृत-उर्दू-फारसी के मिले-जुले प्रयोग हैरत में भी डालते हैं।
संजीव ठाकुर की कविताओं में न सिर्फ व्यंग्य है, बल्कि दुस्साहसी शब्द प्रयोग में भी उनका सानी नहीं है। अपने गद्य की तरह कविताओं में भी वह चीजों को तिर्यक ढंग से कहने के आदी नहीं। इसीलिए इस संग्रह की कई कविताएं सपाटबयानी लगती हैं, लेकिन यह दरअसल चीजों को देखने का उनका अपना ढंग है, चाहे वह गांव का चित्र हो या दिल्ली दर्शन या गणेश जी के दूध पीने का प्रसंग। संगीत के प्रति लगाव के कारण उनकी कई कविताओं की आंतरिक लय देखने लायक है। संजीव ठाकुर का कविता संग्रह एक संभावनाशील कवि की याद दिलाता है, जिनका सर्वश्रेष्ठ अभी आना है।
चिह्न
लेखक - पीयूष दईया
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन
मूल्य - 150 रुपये
नष्ट कुछ भी नहीं होता
लेखक - प्रियदर्शन
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य - 200 रुपये
इस साज पर गाया नहीं जाता
लेखक - संजीव ठाकुर
प्रकाशक - मेधा प्रकाशन
मूल्य - 200 रुपये