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संग्रहालय और पुरालेखपालों के सम्मान में, नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय की कुछ यादें
Sun, 17 Jan 2021 01:55 AM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा
Published by: रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 17 Jan 2021 01:55 AM IST
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ठीक एक साल पहले 2020 की जनवरी के तीसरे हफ्ते में मैं नई दिल्ली में नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (एनएमएमएल) के संग्रह खंगाल रहा था। 1980 के दशक की शुरुआत में मैं पहली बार एनएमएमएल की समृद्ध पुरालेखीय संपदा के संपर्क में आया था और 1988 से 1994 के दौरान जब मैं दिल्ली में रह रहा था, मैंने इसे खंगाल डाला। उन वर्षों में मैं हर हफ्ते कई दिन एनएमएमएल में गुजारा करता था और आधुनिक भारतीय इतिहास की बड़ी (और छोटी) हस्तियों से जुड़े निजी दस्तावेज के संग्रह खंगालता था और पुराने अखबारों में गहराई से डूब जाता था।
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1994 में मैं बंगलूरू चला गया। इसके बाद एनएमएमल में मेरा रोज का जाना रुक गया और फिर हर साल वहां के कुछ चक्कर ही लग सके। अमूमन जनवरी, अप्रैल, सितंबर और नवंबर में, जिससे गर्मियों के ताप और मानसून की चिपचिपाहट से बचा जा सके। नई दिल्ली में मैं किसी ऐसी जगह एक हफ्ते या दस दिन ठहरता था, जहां से पैदल ही एनएमएमल जाया जा सके। सुबह नौ बजे जैसे ही यह खुलता मैं पांडुलिपियों के कमरे में पहुंच जाता, खिड़की से सटी किसी डेस्क पर कब्जा जमाता और अपनी फाइलों को व्यवस्थित कर दिन भर काम में जुट जाता। दोपहर के भोजन अवकाश के अलावा चाय के लिए दो छोटे विराम लेने के साथ मैं शाम पांच बजे तक वहां काम करता और फिर अगले दिन सुबह वहां पहुंच जाता।
मैंने दुनिया भर के दर्जनों संग्रहालयों में काम किया है, लेकिन शोध के लिए एनएमएमएल हमेशा से मेरी पसंदीदा जगह रही है। इसकी कई वजहें हैं (या थीं)- बैठने की व्यवस्था, तीन मूर्ति के पीछे पेड़ों से आच्छादित परिसर जहां समृद्ध पक्षी-जीवन है; हमारे इतिहास से जुड़े हर पहलू की ढेर सारी प्राथमिक सामग्री; क्षमतावान और मदद करने वाले कर्मचारी; वहां काम करने के लिए आने वाले अध्येताओं से नियत या अनियत होने वाली मुलाकातें इत्यादि। पिछले पच्चीस वर्षों के दौरान मैंने ऐतिहासिक शोधकर्ताओं के इस तीर्थ की हर साल कम से कम चार और कई बार पांच यहां तक कि छह यात्राएं की हैं। पिछली जनवरी में जब मैं वहां था, तो जरा भी अंदाजा नहीं था कि 2020 कुछ अलग होने वाला है। महामारी आ गई और फिर मैं तकरीबन पूरे साल दक्षिण भारत में सिमट गया। यदि मैं किसी उड़ान से नई दिल्ली तक पहुंच भी जाता, तो एनएमएमएल बंद ही मिलता।
फिर भी, मैं जिस संग्रहालय से प्रेम करता हूं, उससे पूरे साल मेरा साथ बना रहा। नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय में किए गए पहले शोध के आधार पर मैं उन विदेशियों पर एक किताब को अंतिम रूप दे रहा था, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। 2020 की गर्मियों और शरद में मैंने राहुल रामागुंडम द्वारा लिखी गई समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज की जीवनी के अध्यायों का मसौदा और भाजपा के प्रतीक पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी की अभिषेक चौधरी द्वारा लिखी गई जीवनी पढ़ी। अक्षय मुकुल के साथ मैंने कई दौर की लंबी बातचीत भी की, जो कि जयप्रकाश नारायण की नई जीवनी पर काम कर रहे हैं।
इन तीन किताब परियोजनाओं में चार चीजें समान हैं। पहली, प्रकाशित होने पर ये सभी संबंधित शख्सियतों की बड़ी और संभवतः निर्णायक जीवनियां होंगी। दूसरी, ये किताबें महत्वपूर्ण (और विवादास्पद) ऐतिहासिक शख्सियतों के बारे में हैं, जिससे इन्हें बड़ा पाठक वर्ग मिलना चाहिए। तीसरी, ये तीनों किताबें जिन लोगों के जीवन पर केंद्रित हैं, वे सभी कांग्रेस पार्टी और इसके सर्वश्रेष्ठ नेता जवाहर लाल नेहरू के विरोधी (कई बार अडिग रूप से) थे। चौथी, इनमें से किसी भी किताब की कल्पना, शोध या इनका लेखन उस संग्रहालय में मौजूद दुर्लभ तथा समृद्ध सामग्री तक पहुंच के बिना संभव ही नहीं होता, जिसका नाम फर्नांडीज, वाजपेयी और जेपी के साझा राजनीतिक विरोधी के नाम पर है।
हालांकि एनएमएमएल नेहरू के नाम पर है, लेकिन अपने अनुस्थापन में यह कभी पक्षपाती नहीं रहा। इसीलिए जेपी, फर्नांडीज और वाजपेयी के जीवनीकारों को अपना काफी शोध यहां करना पड़ा। ठीक इसी तरह से श्यामाप्रसाद मुखर्जी और सी राजगोपालाचारी जैसे कांग्रेस विरोधी (और नेहरू विरोधी) अन्य महत्वपूर्ण राजनेताओं के जीवनीकारों को भी। अन्य भारतीय संस्थानों के विपरीत एनएमएमएल इसे बनाने वाले लोगों के कारण सौभाग्यशाली है। इसके पहले दो निदेशक बी आर नंदा और रवींद्र कुमार शानदार विद्वान होने के साथ ही वैसे ही शानदार प्रशासक थे। नंदा और कुमार के साथ शानदार पुरालेखपालों की टीम काम करती थी, जो कि देश भर से पांडुलिपियां और अखबार इकट्ठा कर उन्हें सूचीबद्ध कर उन्हें शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध करवाती थी। अनेक दशकों में एनएमएमएल संग्रहों के आधार पर हजारों किताबें तथा शोध प्रबंध लिखे गए हैं। आधुनिक भारतीय इतिहास के किसी भी पहलू पर कोई गंभीर काम करना चाहे, तो उसे यहां आना ही होता। फिर वह देसी या विदेशी हो, युवा, बुजुर्ग या मध्य वय का, चाहे वह सामाजिक इतिहासकार, आर्थिक इतिहासकार, सांस्कृतिक इतिहासकार, विज्ञान का इतिहासकार, फिल्म इतिहासकार या मीडिया या खेल का इतिहासकार हो, नारीवाद या पर्यावरणवाद या समाजवाद या संप्रदायवाद का विद्यार्थी हो, उसका शोध एनएमएमएल से शुरू होकर अक्सर वहीं खत्म होता।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय को बनाने वाले अन्य पुरुषों और महिलाओं का किसी तरह असम्मान न करते हुए कहना चाहूंगा कि इसकी भावनाओं से और इसके चरित्र से जो सर्वाधिक करीब से जुड़े रहे वह थे अध्येता डॉ. हरिदेव शर्मा। पंजाब से ताल्लुक रखने वाले यह इतिहासकार 1966 में इसकी स्थापना के थोड़े दिनों बाद इससे जुड़े और लगभग साढ़े तीन दशकों तक यहां काम किया। एनएमएमएल के अधिकांश महत्वपूर्ण संग्रह हरिदेव शर्मा के कौशल, उद्यम और नि:स्वार्थ सेवा की देन थे।
मेरा सौभाग्य है कि मैं डॉ. शर्मा के काम और उनके ज्ञान का सीधा लाभ ले सका। हरिदेव जी हमेशा खादी का सफेद कुर्ता पाजामा पहने होते थे। वह अपने स्कूटर से कार्यालय आते थे और उन्होंने दृढ़तापूर्वक सरकारी परिवहन सुविधा को अस्वीकार कर दिया था। मैं जब यह लिख रहा हूं, तो मैं सर्द जनवरी की एक सुबह पुस्तकालय भवन की सीढ़ियों पर हुई हमारी एक मुलाकात को याद कर सकता हूं। मैं बस ऑटोरिक्शा से उतरा ही था और वह वेस्पा को खड़ा कर अपना हेलमेट उतार रहे थे। आमना-सामना होते ही हमारे बीच यह संवाद हुआः
पुरालेखपाल ( हिंदी में): कहो राम कैसे हो? बंगलोर से कब आए?
शोधकर्ता (हिंग्लिश में): मेरी फ्लाइट कल रात को पहुंची, हरिदेव जी।
पुरालेखपालः तो इस बार क्या देख रहे हो?
शोधकर्ताः मैं गांधी जी के डिसाइपल्स (अनुयायियों) पर कुछ काम स्टार्ट करना चाहता हूं।
पुरालेखपालः तब आओ मेरे साथ कमरे में।
यदि मैं हरिदेव जी के साथ पुस्तकालय की सीढ़ियों पर भागकर नहीं जाता तो मैं अंधेरे में मैन्यूस्क्रिप्ट रूम की ओर आगे बढ़ता और दिशाहीन और मदद के बिना अपना शोध करता। मैं जानना चाहता था कि महात्मा की हत्या के बाद उनके करीबी अनुयायियों ने क्या कहा था? उन्होंने कहा कि मुझे अर्थशास्त्री जे सी कुमारप्पा का संग्रह खंगालना चाहिए, खासतौर से विनोबा भावे और मीरा बहन के साथ हुए उनके पत्र व्यवहार को। इसके बाद मुझे डी जी तेंदुलकर और कमलनयन बजाज के दस्तावेज में समाहित सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान से संबंधित सामग्री देखनी चाहिए। और इस तरह संस्तुतिपरक सलाह की धारा बहने लगी जिससे शोधकर्ता का काम आसान हो गया।
हरिदेव शर्मा एनएमएमएल से उप निदेशक पद से 2000 की शुरुआत में सेवानिवृत्त हो गए और उसी वर्ष बाद में उनका निधन हो गया। उसके बाद से जब कभी मैं एनएमएमएल जाता हूं उनसे हुई मुलाकात का स्मरण हो आता है। हालांकि 2020 के ग्यारह महीने मैं अपने पसंदीदा संग्रहालय में नहीं जा सका। मैं नहीं जानता कि 2021 में यह संभव हो पाएगा या नहीं। संभवतः इसलिए कि हाल के वर्षों में, नेहरू मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय में लगातार और शायद अपरिवर्तनीय गिरावट आई है। शानदार पुरालेखपालों के सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी जगह नियुक्तियां नहीं हुई हैं, कुछ सुचिंतित भारतीयों द्वारा दान दिए गए महत्वपूर्ण संग्रह बिना सूचीबद्ध हुए धूल खाते पड़े हैं।
इस बीच, एनएमएमएल प्रशासन को उनके राजनीतिक आकाओं ने विद्वानों और शोध पर ध्यान देने के बजाय परिसर में बन रहे नए निर्माण पर केंद्रित करने के निर्देश दिए हैं। प्रकट रूप में यह भारत के सारे प्रधानमंत्रियों के सम्मान में स्थापित किया जाने वाला संग्रहालय है- नई दिल्ली में निर्माणाधीन कई असुंदर ढांचों की तरह- वास्तव में यह मौजूदा प्रधानमंत्री के दंभ को तुष्ट करने वाला स्मारक है। कोई नहीं जानता कि मोदी के कार्यकाल में हो रही हलचल में एनएमएमएल किस रूप में होगा। बौद्धिक उत्कृष्टता के इस केंद्र में कभी हरिदेव शर्मा जैसे पुरालेखपाल काम करते थे, कभी यह सारी पीढ़ियों, विचारधाराओं और राष्ट्रीयताओं के विद्वानों का स्वागत करता था और आज यह उदास और उजाड़ होता जा रहा है। एनएमएमएल को उसके अच्छे दिनों से जानने वाले व्यक्ति के रूप में मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैंने यहां से ढेर सारे नोट्स लिए जो मुझे मेरे बाकी जीवन में बनाए रखेंगे और साथ ही कसूरवार महसूस कर रहा हूं, क्योंकि युवा या अजन्मे विद्वान कभी इस महान संग्रहालय से उस तरह लाभान्वित नहीं होंगे जिस तरह से मैं हो सका।