कश्मीरियों से संवाद में है समाधान
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कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत ही कश्मीर समस्या का समाधान है। कश्मीरी आतंकवादी बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद मची उथल-पुथल के बीच प्रधानमंत्री का यह बयान काफी अहमियत रखता है। हालांकि शीर्ष नेतृत्व द्वारा हिंसा के करीब एक महीने बाद दिया गया यह वक्तव्य कितना कारगर होगा, यह समय ही बताएगा। अगस्त क्रांति के मौके पर चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली भाबरा से किए गए प्रधानमंत्री के आह्वान के कई मायने हैं। एक तो उन्होंने नक्सलवाद से पीड़ित लोगों को मुख्यधारा में शामिल होने का निमंत्रण दिया, वहीं कश्मीरी युवाओं को पत्थर छोड़ लैपटॉप व कलम की ताकत अपनाने की सलाह दी। प्रधानमंत्री का इशारा स्पष्ट था कि विकास का एकमात्र औजार है शिक्षा व लोकतंत्र में विश्वास। विगत नौ अगस्त को इरोम शर्मिला द्वारा सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्स्पा) के विरोध के अपने 16 वर्ष लंबे अनशन की समाप्ति तथा लोकतंत्र के माध्यम से अधिकारों की लड़ाई का प्रण कहीं न कहीं प्रधानमंत्री की बातों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन ही मानना चाहिए।
आजादी के समय से ही कश्मीर एक जटिल मसला रहा है। कुछ लोग इसका कारण संविधान के अनुच्छेद 370 को बताएंगे, कुछ पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को, तो कुछ अफ्स्पा जैसे दमनकारी कानून को। इसी के साथ देश में एक और सोच चलती है, जिसका मूल है कश्मीर घाटी में मुस्लिमों की बहुलता। फलतः आम भारतीयों में कश्मीर को पाकिस्तान समर्थक तथा भारत-विरोधी बताने की एक मुहिम चलती है।
कश्मीर घाटी में व्याप्त हिंसा में साठ से अधिक नौजवान मारे गए हैं तथा सैकड़ों लोगों की आंखों की रोशनी पैलेट गन से जा चुकी है। इस लड़ाई में सुरक्षा बल के जवानों को भी क्षति पहुंची है। लेकिन सैन्य कार्रवाई में इतने लोगों की मौत तथा लोगों का अंधा होना बहुत बड़ी बात है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, घाटी में घायलों की संख्या पांच हजार से अधिक है।
कश्मीर पर राजनीति करने वाले बहुत हैं, लेकिन सवाल यह है कि पिछले पच्चीस वर्षों में कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए हमने क्या किया। पूर्व में गठित कमेटियों के क्या सुझाव थे और उन सुझाओं पर क्या अमल हुआ? इतने लंबे समय से कश्मीर में कर्फ्यू लगा हुआ है और विश्वास बहाली नहीं हो पा रही, तो हमें अपनी संवाद-प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना चाहिए। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि बीती सदी के नब्बे के दशक में जो कश्मीरी आतंकी गतिविधियों को समस्याओं का हल समझकर चल रहे थे, वे अब शिक्षा और लोकतंत्र के समर्थक हैं। इसके प्रमाण के रूप में भारतीय प्रशासनिक सेवा व अन्य सेवाओं में प्रतिवर्ष चयनित युवाओं को देखा जा सकता है। तमाम धमकी भरे आह्वानों के बाद भी वहां लोकतंत्र और गठबंधन की सरकार है।
हम इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की बात तो करते हैं, पर इन पर अमल करने में हमसे भेदभाव दिख जाता है। यह वही कश्मीरियत है, जिस पर गांधी जी की छाप देखने को मिलती है। आजादी से पूर्व शेख अब्दुल्ला की कश्मीर योजना में इसे स्पष्टता से देखा जा सकता है, जब उन्होंने उर्दू की जगह हिंदुस्तानी भाषा, फारसी व देवनागरी लिपि को राजभाषा बनाने की वकालत की थी। शेख अब्दुल्ला ने भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तथा जमींदारी, बेलदारी प्रथा की समाप्ति का प्रस्ताव लागू किया था। कश्मीरियत की मिसाल हमें तब भी देखने को मिली, जब कर्फ्यूग्रस्त इलाके में तीर्थयात्रियों से भरी बस खाई में गिरी और उनकी मदद के लिए लोग जान की परवाह किए बगैर घरों से बाहर आए। कश्मीर के लोगों ने न सिर्फ उनके खाने-पीने और रहने की, बल्कि इलाज की व्यवस्था भी की। तीर्थयात्रियों ने कश्मीरियों के इस रुख की सराहना करने के साथ ही एक अपील भी कि कश्मीरी हमारे भाई-बहन हैं, आवश्यकता उनके मुद्दों को समझने और विश्वास बहाली की है।
कश्मीरियों के प्रमुख मुद्दे क्या हैं, इन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। हम इसे पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा कहकर पीछा नहीं छुड़ा सकते। क्या पाकिस्तान इतना ताकतवर देश है कि वह हमारे देश के किसी भी राज्य को हिंसा की आग में झोंक सकता है? हमारे रक्षा बजट का अधिकतम हिस्सा कश्मीर पर खर्च होता है। फिर भी अगर पड़ोसी देश कश्मीर में ऐसी मनमानी करने में सफल है, तो यह बहुत चिंताजनक है। कश्मीरियों से प्रत्यक्ष संवाद ही समस्या का समाधान है, सेना अथवा गोली नहीं। कश्मीरियों एवं वहां की चुनी हुई सरकारों ने अफ्स्पा को प्रमुख मुद्दा बताया है। इस पर निर्णय लेना चाहिए। इरोम शर्मिला के 16 साल तक अहिंसक भूख हड़ताल के बाद भी मणिपुर में अफ्स्पा के तहत किए गए सैन्य अत्याचार के मामलों में न्याय मिला क्या? यदि सरकारी मशीनरी द्वारा किए जघन्य अपराधों में न्याय नहीं मिल पा रहा, तो जनता क्या समझे? अफ्स्पा अशांत क्षेत्रों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया कानून है, इसे जल्दी हटाने का फैसला करना चाहिए।
समय आ गया है कि हम ऋषियों और सूफी संतों की भूमि में पुनः कश्मीरियत की अलख जगाएं तथा कश्मीरियत को देश के अन्य राज्यों के समान सम्मान व सुरक्षा का आश्वासन दें। ऐसे ही कश्मीरी युवाओं को अपने विरोध प्रदर्शन को अहिंसात्मक बनाना होगा। कश्मीरी युवा उन लोगों के बहकावे में भी न आएं, जो खुद तो परिवार के साथ शाही जीवन जीते हैं, जबकि खुद को शहीद बताकर युवाओं को भटकाते और भड़काते हैं। बहकावे में आकर घाटी के युवा तो अपनी जान गंवा देते हैं, जबकि उनके माता-पिता को घुट-घुट कर मरना पड़ता है। पत्थरबाजी में मारे गए युवाओं और घायलों के परिवारों की खबर लें, तो शायद इन युवाओं की आंखें खुलेंगी। हिंसा से तो सिर्फ यतीम, बेवा व अनाथ परिवार ही बनते हैं,चाहे वे कश्मीरी युवाओं के हों या सैनिकों के। इल्म ही वह ताकत है, जिससे सभी समस्याओं का हल निकलता है। यही कश्मीरियत है और इसी से इंसानियत और जम्हूरियत का रास्ता निकलता है।