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नर्म छवि, बुलंद इरादे
हेमेन्द्र मिश्र
Updated Fri, 29 Nov 2013 07:43 PM IST
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पाकिस्तान में 2007 में जारी जबर्दस्त राजनीतिक उथल-पुथल के बीच जब परवेज मुशर्रफ ने आपातकाल की घोषणा की और सर्वोच्च न्यायालय के जजों को फिर से शपथ लेने को कहा, तो कई कानूनी जानकार यह देखकर हैरान थे कि जिन 60 न्यायाधीशों ने उस आदेश को मानने से इन्कार किया था, उसमें नर्म छवि वाले तसादुक हुसैन जिलानी भी शामिल थे।
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जिलानी की गिनती उन जजों में होती थी, जो सभी की सुनना पसंद करते हैं और प्रतिकूल स्थिति में भी आपा नहीं खोते। तब जिलानी का कहना था कि बेशक सैन्य तानाशाह को सत्ता से दूर रखने और लोकतंत्र की जीवंतता को लेकर न्याय व्यवस्था मंझधार में फंसी है, पर यह अदालत का दायित्व है कि सांविधानिक प्रावधानों की रक्षा हो।
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उनके साहसी और सकारात्मक फैसले की तब काफी प्रशंसा हुई थी, लेकिन मुल्तान का यह लाल आज अगर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने जा रहा है, तो उसके पीछे यही एक वजह नहीं है। करीब चार दशक के अपने करियर में उन्होंने कई ऐसे फैसले दिए हैं, जिन्हें आज भी मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
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न्यायाधीश जिलानी देश-समाज में 'सौम्य जज' के नाम से जाने जाते हैं। इसकी वजह उनकी उदार, स्वतंत्र और संतुलित सोच है। उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनके दिए कई निर्देश और फैसलों ने लोगों का ध्यान खींचा। फिर चाहे बात मौलिक अधिकार की हो या लैंगिक समानता की या फिर कानूनी और चिकित्सा शिक्षा की।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश नसीर असलम जाहिद जैसे न्यायाधीश तो कहते हैं कि आज अगर पाकिस्तान न्यायिक स्वतंत्रता के पथ पर सरपट भाग रहा है, तो इसकी वजह जिलानी जैसे जजों की प्रतिबद्धता ही है।
निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी के विश्वासपात्रों में एक जिलानी ने अपने कार्यकाल का खाका खींच रखा है। उन्हें केवल सात महीने के लिए यह कुर्सी मिलनी है, लेकिन 64 वर्षीय यह शख्स इन चंद महीनों में ही मुकदमों के निपटारे में होने वाली बेवजह की देरी को खत्म कर कम कीमत पर लोगों को न्याय दिलाना चाहता है।
लक्ष्य मुश्किल जरूर है, लेकिन जैसा कि जिलानी मानते हैं, देश तभी आगे बढ़ेगा, जब फिजां में बारूद की नहीं, शांति की खुशबू फैलेगी, और शांति के फूल तभी खिल सकते हैं, जब लोगों को 'वास्तविक' न्याय मिलेगा।
- हेमेन्द्र मिश्र