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छुट्टियों से निकम्मा बनता समाज

Thu, 20 Apr 2017 09:09 AM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Thu, 20 Apr 2017 09:09 AM IST
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Society become lazy by holidays
अवधेश कुमार

महापुरुषों के नाम पर छुट्टियां इस समय फिर बहस के केंद्र में है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंबेडकर जयंती पर कहा कि महापुरुषों के नाम पर छुट्टियां बंद होनी चाहिए, लेकिन इसका आयाम देशव्यापी है। छुट्टी के बजाय उन्होंने विद्यालयों में महापुरुषों पर विशेष कार्यक्रम करने का सुझाव दिया, ताकि बच्चों को महापुरुषों के बारे में जानकारी मिल सके। देश में सबसे ज्यादा छुट्टियां उत्तर प्रदेश में होती हैं। योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद कार्यसंस्कृति बदलने की बात की थी और अधिकारियों तथा कर्मचारियों को चेतावनी दी थी कि जो लोग उनके साथ ज्यादा घंटे काम नहीं कर सकते, वे त्यागपत्र देकर चले जाएं। ऐसे में महापुरुषों के नाम पर पूर्व सरकारों द्वारा छुट्टियों की होड़ की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। यह स्थिति कम या ज्यादा पूरे देश की है।

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सामान्य तौर पर देखें, तो 52 रविवार को यों ही छुट्टियां होती थीं। हालांकि इस पर भी अंग्रेजों के जाने के बाद से बहस चल रही है कि रविवार की छुट्टियों के पीछे क्या तर्क है। अंग्रेज तो सप्ताह में एक दिन चर्च जाने के लिए रविवार का उपयोग करते थे। इसके बाद राजीव गांधी की सरकार ने काम की संस्कृति बदलने के नाम पर सप्ताह में काम के पांच दिन तय कर दिए। कामकाज के पांच दिन वाली व्यवस्था को कई राज्यों ने भी अपना लिया। इसमें 104 दिन तो ऐसे ही निकल जाते हैं। इसके अलावा अर्जित अवकाश, कैजुअल अवकाश तथा ऐच्छिक अवकाश को मिलाकर 75 दिन हो जाते हैं। इसके बाद सार्वजनिक अवकाश, जो औसतन 38 दिन के करीब होता है। इसमें महापुरुषों के नाम पर राज्यों की सरकारें वहां छुट्टियां बढ़ाती जाती हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह हो गई है कि काम के दिन और घंटे कम हो गए तथा छुट्टियों के दिन और घंटे ज्यादा। जरा सोचिए, उत्तर प्रदेश में शिक्षा का सत्र 220 दिन निर्धारित किया गया, लेकिन छुट्टियों के कारण यह 120 दिनों तक सीमित हो गया। अन्य राज्यों की भी कम या ज्यादा यही स्थिति है। अपनी जाति के महापुरुषों के नाम पर छुट्टियों की खतरनाक परंपरा कुछ पार्टियों और नेताओं ने आरंभ की है।
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साफ है कि इस स्थिति से पूरे देश को बाहर निकालना होगा। कोई भी देश या समाज काम करने से आगे बढ़ता है, छुट्टियां या आराम करने से नहीं। हमारे सामने दुनिया के विकसित देशों का उदाहरण है। किसी देश में इतनी छुट्टियां नहीं होतीं। हम महाशक्ति होने का ख्वाब देखते हैं। यह छुट्टियां करने से तो नहीं होगा। यह लक्ष्य तभी हासिल होगा, जब देश का एक-एक व्यक्ति काम में अपनी क्षमता और समय का पूरा-पूरा उपयोग करे। ऐसा नहीं है कि निजी क्षेत्र में एकदम स्वर्गिक माहौल है, लेकिन वहां काम करना मजबूरी है। कुछ कंपनियों ने वातावरण ऐसा हल्का तथा अनुकूल बना दिया है कि कर्मचारी काम करने में आनंद महसूस करते हैं। फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियां इसका उदाहरण हैं।
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इसका एक पहलू और है। सरकारी कर्मचारी दरअसल लोकसेवक हैं। आम लोगों के कर से उन्हें वेतन मिलता है। यह भाव उनके अंदर पैदा होना चाहिए था कि वे सेवक हैं और लोगों की सेवा करना उनका दायित्व है। सरकारी कार्यालयों में किसी आम आदमी की दशा देखिए। लोकतंत्र में जो स्वामी है, वह सरकारी कार्यालय के एक बाबू के सामने अपने काम के लिए गिड़गिड़ता है। ज्यादातर महापुरुषों ने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और देश के लिए अपने को समर्पित किया। इसलिए महापुरुषों की जयंती या पुण्यतिथि तो ज्यादा काम करने की प्रेरणा का दिन होना चाहिए।

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