{"_id":"652def4ff2389522c3003558","slug":"social-pressure-have-no-impact-on-relationships-through-dating-apps-2023-10-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"डेटिंग से शादी तक: इंटरनेट ऐप्स से बने रिश्तों में नहीं काम करता सामाजिक दबाव","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
डेटिंग से शादी तक: इंटरनेट ऐप्स से बने रिश्तों में नहीं काम करता सामाजिक दबाव
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो :
iStock
विस्तार
इंटरनेट ने लोक व लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। जीवन साथी के चुनाव और दोस्ती जैसी भावनात्मक व निहायत व्यक्तिगत जरूरतों के लिए दुनिया भर के डेटिंग ऐप निर्माताओं की निगाह में भारत सबसे पसंदीदा जगह बनकर उभर रहा है। उदारीकरण के बाद बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं बड़े शहरों में ज्यादा बढ़ीं। जड़ों से कटे ऐसे युवा भावनात्मक संबल पाने के लिए रिश्ते बनाने में, जिसे वे शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें, डेटिंग ऐप का सहारा ले रहे हैं। शादी जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और खानदान के बड़े बुजुर्गों, मित्रों, रिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थी, अब इसमें बदलाव आया है।
मेट्रिमोनी वेबसाइट से शुरू हुआ यह सिलसिला अब डेटिंग ऐप्स तक पहुंच गया है। पहले इंटरनेट की सहायता से संबंध बनाना एक विशुद्ध शहरी घटना माना जाता था और छोटे शहरों को इस प्रवृत्ति से दूर माना जाता था। इस सांस्कृतिक अवरोध के बावजूद डेटिंग का व्यवसाय देश में तेजी से पैर पसार रहा है। इंटरनेट साइट स्टेटिस्टा के अनुसार, अभी देश में 3.8 करोड़ लोग डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और राजस्व के हिसाब से यह संख्या चीन और अमेरिका के बाद सबसे बड़ी है। ऑनलाइन प्यार भारत में एक नई परिघटना है। साल 2013 से शादी कराने वाली वेबसाइट्स सुर्खियों में आने लगीं, पर डेटिंग ऐप का ट्रेंड वर्ष 2014 में टिंडर के आने के बाद शुरू हुआ। तब से वैश्विक रूप से लोकप्रिय डेटिंग ऐप बम्ब्ल, हिन्ज आदि देश में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं।
जब से समलैंगिकता भारत में अपराध न रही 'एलजीबीटी' समुदाय के लिए ग्रिंडर जैसे ऐप भी भारत आए, पर बड़ी कंपनियों में शामिल टिंडर और बम्ब्ल भी समलैंगिक साथियों के चुनाव की सुविधा देते हैं। देश की सांस्कृतिक विविधता के हिसाब से सभी प्रचलित डेटिंग एप्स अंग्रेजी को ही प्रमुखता देते हैं। टिंडर ने हालांकि हिंदी में भी अपनी सेवा देनी शुरू की है, पर बोलबाला अब भी अंग्रेजी का ही है. जबकि देश की मात्र 12 प्रतिशत आबादी अंग्रेजी बोलती है।
यहां भाषा की समस्या डेटिंग ऐप्स के मामले में उतनी गंभीर नहीं, क्योंकि लोग मोटे तौर पर जानते हैं कि ऐप चलता कैसे है। जब संदेशों के आदान-प्रदान की बात आती है, तो लोग हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को रोमन में लिख लेते हैं।
इन ऐप्स ने अपने भारतीय संस्करणों में भारतीयता को भी अपनाया है। चूंकि अपने यहां शादी की ही प्रधानता है, इसलिए यहां शादियां कराने वाली वेबसाइट्स तेजी से उभरीं। ऐसी सबसे बड़ी वेबसाइट मेट्रिमोनी डॉटकॉम के देश में 50 लाख सक्रिय ग्राहक हैं। डेटिंग चूंकि पूरी तरह पश्चिमी अवधारणा है, लिहाजा जब ये विदेशी वेबसाइट्स भारत आईं, तो इन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसका मुकाबला करने में इन्होंने अपनी रणनीति बदली, जिसमें डेटिंग के सहारे ऐसे गंभीर संबंध विकसित करने पर जोर दिया गया, जो शादी तक पहुंचे।
सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण देश में डेटिंग ऐप्स को ज्यादा मान्यता नहीं दी जाती, पर जब छोटे शहरों में पले-बढ़े लोग बाहर निकले, तो ये ऐप्स उनकी पसंद बन गए। पर वे अपने शहरों में इनका इस्तेमाल ज्यादा नहीं करते। हालांकि जब लॉकडाउन लगा और अलग-अलग जगहों पर बिखरे लोग अपने घर लौटे, तो इनका इस्तेमाल बढ़ा। डेटिंग ऐप ट्रूली मैडली की शुरुआत देश में 2014 में हुई। इसके राजस्व में वर्ष 2020 में 10 गुना वृद्धि छोटे शहरों से हुई। सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था, वहीं अब वह धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। वर या वधू तलाशने का काम अब मेट्रिमोनिअल साइट्स और ऑनलाइन डेटिंग साइट्स कर रही हैं, वह भी बगैर किसी बिचौलिये के।
वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी है कि इससे पारदर्शिता आई है। इन ऐप्स से बने रिश्तों में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही है, इसे जांचने का कोई तरीका ये ऐप्स उपलब्ध नहीं कराते। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। इंटरनेट ऐप्स से बने रिश्तों के पीछे कोई सामाजिक दबाव नहीं काम करता और न ही गड़बड़ी की स्थिति में किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति बनती है।