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सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग

Thu, 07 Jun 2018 06:48 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 07 Jun 2018 06:48 PM IST
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Social Media Strikes
इमरान और रेहम खान
पाकिस्तान इस हफ्ते ट्वीटरिस्तान में बदल गया, जहां साइबर स्पेस सैन्य, राजनीतिक और व्यक्तिगत लड़ाइयों के लिए जंग का मैदान बन गया। सबसे पहले पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) के नेता इमरान खान और उनकी पत्नी रेहम खान के बीच जुबानी जंग चली।

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रेहम खान जल्द ही अपनी किताब लेकर आ रही हैं, जिसमें उनके अपने जीवन के साथ ही इमरान खान के साथ बिताए समय के ब्यौरे हैं और ऐसा माना जा रहा है कि ऐन चुनाव के समय यह किताब इमरान के व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन के बारे में ऐसे खुलासे कर सकती है, जिससे उन्हें नुकसान हो सकता है। 

इमरान खान पहले ही अपनी पार्टी में अपराधियों, डकैतों, इस्लामिक चरमपंथियों और बलात्कारियों की मौजूदगी से मुश्किल में हैं। उन्होंने जब एक बलात्कारी फारूक बांदियाल को अपनी पार्टी में शामिल करते हुए उन्हें पीटीआई का स्कार्फ पहनाया तो, ट्वीटरिस्तान में उसकी पुरानी तस्वीरों की बाढ़-सी आ गई। सोशल मीडिया बांग्लादेशी अभिनेत्री शबनम के साथ उनके द्वारा किए गए दुष्कर्म की खबरों से अट गया।

सोशल मीडिया पर हुई तीखी प्रतिक्रिया से इमरान खान इतने हिल गए कि उन्होंने तुरंत फारूक बांदियाल की पार्टी की सदस्यता रद्द कर दी। रेहम खान की किताब अभी छपकर आई नहीं है, लेकिन उनके पास जिस तरह की गोपनीय जानकारी रही है, उसे देखते हुए इमरान खान कोशिश करेंगे कि उनकी किताब बाजार में न आए। कोशिश की जा रही है कि अदालत के जरिये किताब के प्रकाशन पर रोक लगवाई जाए, लेकिन ब्रिटेन के कानूनों के मुताबिक एक अप्रकाशित किताब पर रोक लगवाना बेहद मुश्किल है। 

ट्वीटरिस्तान एक बार फिर तब पाकिस्तान के बचाव में आगे आया, जब इमरान खान ने पंजाब के कार्यवाहक मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित किया और पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन के नेता नवाज शरीफ ने उनकी पसंद की तारीफ कर दी। इसके तुरंत बाद इमरान ने वह नाम वापस ले लिया! इससे ट्वीटरिस्तान ठहाकों से गूंज उठा। इमरान खान इतना असुरक्षित महसूस करते हैं कि वह अपने द्वारा नामित व्यक्ति की सिर्फ नवाज शरीफ की तारीफ की वजह से घबरा गए और उनका नाम वापस ले लिया। 

पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक, जब कभी कार्यकाल खत्म होता है, तब मौजूदा सरकार नेशनल एसेंबली में विपक्ष के नेता के साथ मशविरा कर कार्यवाहक प्रधानमंत्री का नाम तय करती है और फिर वह अपनी पसंद से मंत्रिमंडल का गठन करता है। चार प्रांतों में यह प्रक्रिया उन प्रांतों के मुख्यमंत्री विपक्षी नेताओं के साथ मशविरा कर पूरी करते हैं। कार्यवाहक सरकार का काम रोजाना के कामकाज निपटाने के साथ ही निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराना है। जिन पदों पर बदलाव नहीं होता, वे हैं, पाकिस्तान के राष्ट्रपति, सेना प्रमुख और चुनाव आयोग के प्रमुख। 

इसके अलावा एक और मनोवैज्ञानिक युद्ध चल रहा है और यह है सेना के प्रमुख प्रवक्ता, सेना के महानिदेशक जनरल गफूर और नवगठित पख्तून मूवमेंट फॉर जस्टिस के बीच। पख्तून मूवमेंट की अगुआई उत्तर पाकिस्तान स्थित पूर्व फेडरल एडमिनिस्टर्ड एरिया से ताल्लुक रखने वाले मंजूर पुश्तीन कर रहे हैं। इसे अब खैबर पख्तूनख्वा में शामिल कर दिया गया है।

मंजूर पुश्तीन के लाखों समर्थक हैं और पाकिस्तान के संविधान को मानते हैं और पाकिस्तानी झंडे को बुलंद किए हुए हैं। लेकिन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल बाजवा इस मूवमेंट का विरोध करते हैं और भारत तथा अफगानिस्तान के नाम लिए बगैर आरोप लगाते हैं कि इसे दूसरे देशों का समर्थन हासिल है। 

इसकी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के उत्तरी हिस्से में पिछले कई वर्षों से चलाया गया सेना का ऑपरेशन है, जहां हर तरह के आतंकवादी को निशाना बनाया गया। सिर्फ जिन आतंकियों को बख्शा गया वे अफगान हक्कानी नेटवर्क से संबंधित थे और बाद में वे बलूचिस्तान चले गए। सेना ने जहां आतंकियों और उनके स्लीपर सेल का खात्मा कर पाकिस्तान को रहने के लिहाज से पहले से बेहतर जगह बनाकर अच्छा काम किया, वहीं उसके इस अभियान से बहुत-सा आनुषांगिक नुकसान भी हुआ।

पाकिस्तान वायु सेना के विमानों ने आतंकियों पर बम गिराए थे। इससे बहुत से घर और व्यावसायिक स्थल ढह गए, स्त्री-पुरुष और बच्चे मारे गए। जो लोग बच गए उन्हें देश के भीतर ही पलायन करना पड़ा। आज भी हजारों लोग लापता हैं और उनके परिवार तथा मित्र सेना से उनके बारे में पूछ रहे हैं। उन्हें अदालत में पेश करने और उनके खिलाफ यदि कोई आरोप हैं, तो उन्हें साबित करने की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे परिदृश्य में ट्वीटरिस्तान में इंटर सर्विस मीडिया रिलेशंस के महानिदेशक जनरल गफूर और मंजूर के समर्थकों के बीच छिड़ी जंग से हैरत नहीं।

लोग सेना और न्यायपालिका के बेमेल गठजोड़ से भी आजिज आ चुके हैं और उन्हें लगता है कि पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश का सेना ने नवाज शरीफ और उनके परिजनों को घेरने के लिए इस्तेमाल किया। इसके पीछे मकसद यह है कि नवाज और उनके परिवार को दोषी ठहराया जाए, दंडित किया जाए और जेल में डाल दिया जाए ताकि उनकी राजनीति खत्म हो जाए। इससे निश्चय ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) को नुकसान हुआ है और वह शायद चुनाव में अच्छा न कर पाए। हालांकि इसका उलटा असर भी हो रहा है।

लोग नवाज के समर्थन में आगे आ रहे हैं और यदि निष्पक्ष चुनाव हुए तो मुस्लिम लीग अच्छा प्रदर्शन कर सकती है और पाकिस्तान में नई सरकार भी बना सकती है। हैरत नहीं, यह लड़ाई भी ट्वीटरिस्तान में चल रही है, जहां नवाज और उनकी बेटी मरियम के समर्थकों का दायरा बढ़ रहा है। वहां प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ आवाज तेज हो रही है, आशंका है कि वे मरियम को भी चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर सकते हैं।
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