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सामयिक: पक्षकारिता और अतिवाद से बचने के लिए कुछ पैमाने तय होने चाहिए

Wed, 27 Dec 2023 05:46 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 27 Dec 2023 05:46 AM IST
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सार
सोशल मीडिया की खबरनवीसी ने पारंपरिक पत्रकारिता की ‘वाचमैन’ वाली भूमिका को ही खत्म कर दिया है। पारंपरिक पत्रकारिता कानून के दायरे में ही अपनी भूमिका निभाती है। जबकि सोशल मीडिया की पत्रकारिता में कोई कानूनी बंधन या जवाबदेही नहीं है। 
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Social media journalism should be regulated to control pakshakaarita and extremism
social media - फोटो : istock

विस्तार

तकनीकी क्रांति के सहारे बढ़े सोशल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया गढ़ों को चुनौती दी है और पत्रकारिता को सहज-सुलभ बनाया है। सत्ता, कॉरपोरेट और दूसरे प्रतिष्ठानों के जरिये सामने नहीं आ पाने वाली खबरों के लिए सोशल मीडिया उम्मीद के रूप में उभरा। उसने अपनी ताकत दिखाई भी। जब सोशल मीडिया नहीं था, तो छोटी पत्र-पत्रिकाएं वैकल्पिक मीडिया की भूमिका निभाती थीं और कॉरपोरेट, राजनीति व सत्ता की अंधी सुरंगों में खो जाने वाले सत्यों और विचारों को उद्घाटित करती थीं। लेकिन सीमित संसाधन की वजह से उसकी पहुंच बेहद कम रही। मगर सोशल मीडिया ने उस वैकल्पिक मीडिया को असीमित पहुंच और प्रसार दिया। तकनीक और डाटा के जरिये आई इस ताकत को वरदान के रूप में देखा गया। लेकिन क्या सोशल मीडिया निष्पक्ष पत्रकारिता कर रही है?



हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की जिस तरह कभी खबरिया चैनलों के दिग्गज रहे पत्रकारों ने सोशल मीडिया के मंचों पर रिपोर्टिंग की, एक खास पार्टी को ही वे जिस तरह जीतता हुआ दिखाते रहे, उसने सोशल मीडिया पत्रकारिता की साख पर सवाल तो खड़ा किया ही, यह भी साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पत्रकारिता, रिपोर्टिंग की आड़ में एक दल विशेष का प्रचार भर रहा।


हिंदी के मशहूर कथाकार राजेंद्र यादव ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि साहित्य की लड़ाई हवाई हमले जैसी होती है, जिसके जरिये माहौल बनता है। कभी चुनाव विश्लेषक रहे और अब राजनेता बन गए योगेंद्र यादव भी कहते रहे हैं कि अपने आंदोलन के जरिये वह विपक्ष के लिए पिच तैयार करते हैं। लेकिन विपक्ष यानी एक खास दल उसका सियासी फायदा नहीं उठा पा रहा है।

पिछले कुछ चुनावों से जिस तरह यूट्यूब, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया मंचों पर रिपोर्टिंग हो रही है, वह माहौल बनाने की कोशिश ही लगती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सोशल मीडिया के जरिये जिस खबरनवीसी के लोकतंत्रीकरण की उम्मीद की गई थी, वह पूरी हो पाई? निश्चित तौर पर इस सवाल का जवाब न में है। अगर एक चुनाव में ऐसा होता और सोशल मीडिया रिपोर्टिंग फेल होती, तो उसे पेशागत कमी मान लिया जाता। लेकिन ऐसा हर बार हो रहा है। कर्नाटक और हिमाचल विधानसभा चुनाव हों या गुजरात विधानसभा चुनाव, हर बार आज के सोशल मीडिया के धुरंधरों की रिपोर्टिंग पर गहराई से निगाह डालेंगे, तो पता चलेगा कि वे एक दल विशेष के लिए पिच तैयार कर रहे थे।

यहां यह भी याद किया जाना चाहिए कि आज सोशल मीडिया पर जिन्होंने अपनी पत्रकारिता का बाजार तैयार किया है, उनमें से ज्यादातर कुछ साल पहले तक खबरिया चैनलों के हीरो थे। तब भी उनका रवैया कुछ वैसा ही था। हालांकि अपने संस्थानों की नीतियों के चलते वे खुलकर किसी दल विशेष का समर्थन या विरोध नहीं कर पाते थे। सोशल मीडिया की खबरनवीसी ने पारंपरिक पत्रकारिता की ‘वाचमैन’ वाली भूमिका को ही खत्म कर दिया है। पारंपरिक पत्रकारिता कानून के दायरे में ही अपनी भूमिका निभाती है। जबकि सोशल मीडिया की पत्रकारिता में कोई कानूनी बंधन या जवाबदेही नहीं है। सोशल मीडिया की पत्रकारिता को इसीलिए अब पक्षकारिता कहा जाने लगा है।

सवाल उठता है कि पत्रकारिता की आड़ में क्या किसी दल का प्रचार करना पत्रकारीय पैमाने पर जायज माना जाना चाहिए? पत्रकारिता की न्यूनतम गारंटी निष्पक्षता है। बेशक पारंपरिक मीडिया संस्थान भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होते, लेकिन वे एकतरफा किसी खास दल के पक्ष में रिपोर्टिंग नहीं करते। लेकिन सोशल मीडिया की पत्रकारिता में ऐसी ही प्रवृत्ति दिखी। इसलिए वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया की पत्रकारिता को भी विनियमित किया जाए। सोशल मीडिया मंचों को भी कानूनी तौर पर ऐसे अलगोरिदम विकसित करने के लिए तंत्र बनाना होगा, जो निष्पक्षता को बढ़ावा दे, अतिवाद को नहीं।

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