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ताकि निवेश पारदर्शी हों

Wed, 16 Sep 2015 06:40 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
नारायण कृष्णमूर्ति Updated Wed, 16 Sep 2015 06:40 PM IST
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So make investment transparent

इस महीने के प्रारंभ में पूर्व वित्त सचिव सुमित बोस के नेतृत्व में गठित एक सरकारी समिति ने अपनी रिपोर्ट जारी की, जिसमें वित्तीय उत्पादों (म्यूचुअल फंड, बीमा आदि) की अनियमित बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए उपाय सुझाए गए हैं। वित्तीय उत्पादों की बिक्री से संबंधित व्यापक भ्रम को देखते हुए यह संभवतः इस दिशा में सबसे बेहतर कदम हो सकता है। वित्तीय उत्पादों के खरीदारों की आम शिकायत है कि जिस तरह के लाभ का वायदा कर उन्हें वित्तीय उत्पाद बेचे गए थे, वह उन्हें नहीं मिला। आम तौर पर बीमा निवेश के रूप में बेचा जाता है और जब उस निवेश का लाभ उम्मीद के अनुरूप खरीदार को नहीं मिलता, तो वे धोखे की शिकायत करते हैं। कुल मिलाकर कमेटी ने सोलह महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिसमें कई विशेषज्ञों ने इस विषय को अच्छी तरह से विश्लेषित किया है। लेकिन यदि कोई इस रिपोर्ट को विस्तृत रूप से पढ़कर समझेगा, तो वह कभी किसी वित्तीय उत्पाद में पैसा नहीं लगाएगा।

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जहां तक वित्तीय उत्पादों की बिक्री की बात है, चाहे वह क्रेडिट कार्ड हो, एनपीएस, बीमा, पेंशन, म्यूचुअल फंड या यहां तक कि पीपीएफ ही क्यों न हो, सबसे दुखद पहलू उसका कमीशन है, जिससे विक्रेताओं को कमाई होती है। ज्यादा से ज्यादा अग्रिम कमीशन धोखाधड़ी की एक बड़ी वजह रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय उत्पादों को उपभोक्ताओं के लक्ष्यों और उनकी नौकरी के कार्यकाल के अनुरूप होना चाहिए। मसलन, वितरकों को न्यू फंड ऑफर (एनएफओ) बेचने के लिए काफी अग्रिम कमीशन दिया जाता है। यदि अग्रिम कमीशन बंद कर दिया जाए, तो एजेंट भारी कमीशन वाले उत्पादों के बजाय निवेशकों के लिए अनुकूल बेहतर उत्पाद बेचेंगे। कमेटी का मुख्य सुझाव यह है कि म्यूचुअल फंड जैसे निवेश उत्पाद और बीमा कंपनियों के किसी भी उत्पाद के निवेश घटक में लागत, कमीशन या पारदर्शिता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। इसके अलावा प्रमुख नियामक को इसके नियम निर्धारित करने चाहिए। एक साथ कई उत्पादों के होने की स्थिति में नियामक को उसके कुछ हिस्से के कार्य के लिए नियम बनाना होगा।' इसका ठीक-ठीक मतलब यह होगा कि यूलिप और एंडोमेंट प्लान्स जैसे बीमा उत्पादों में निवेशकों को सेबी के उन नियमों का पालन करना होगा, जो उसने म्यूचुअल फंड्स के लिए निर्धारित किए हैं।
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इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्पादों की लागत, रिटर्न्स, लाभ एवं अवधि से संबंधित जानकारी ऐसे प्रारूप में तैयार करना होगा, जिसे ग्राहक समझ सकें। इसमें एक पेज के वितरक-निवेशक प्रपत्र की सिफारिश की गई है, जिसमें उत्पाद की प्रमुख विशेषताओं, उपयुक्तता और लागत के बारे में बड़े अक्षरों में जानकारी होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि वितरक निवेश करने वाले व्यक्ति की जरूरतों और जोखिमों को समझता है। इससे जवाबदेही भी बढ़ेगी।
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हम बचत करने वाले राष्ट्र हैं, लिहाजा उन वित्तीय उत्पादों की ओर आकर्षित होते हैं, जिनमें रिटर्न्स की गारंटी होती है। बाजार से जुड़े निवेश में रिटर्न्स की गारंटी तो नहीं ही होती, अनुमान के आधार पर रिटर्न्स की गारंटी का संकेत देने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। उदाहरण के लिए, यूलिप से जुड़े उत्पादों में रिटर्न्स के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती। लेकिन बीमा योजनाएं बेचते समय एजेंट आम तौर पर ग्राहकों को योजना के लाभ के बारे में जानने के लिए अलग से पर्चा देते हैं। इस तरह की समस्या शेयर या म्यूचुअल फंड में निवेश के समय भी सामने आती है, जहां बताया गया रिटर्न लोगों को नहीं मिलता। उदाहरण के लिए, म्यूचुअल फंड्स के बारे में बताते हुए बेंचमार्क का इस्तेमाल होता है, लेकिन बेंचमार्क को समझना और उनके बारे में अनुमान लगाना आसान नहीं है। यह भी संभव है कि बेंचमार्क उतने लोकप्रिय नहीं हों, जो प्रस्तावित रिटर्न्स के बारे में संकेत करते हों। सुमित बोस कमेटी चाहती है कि ये बेंचमार्क काफी प्रासंगिक हों और निवेश योजनाएं उनके अनुरूप हों।

यदि इन सिफारिशों को लागू किया जाएगा, तो उसका म्यूचुअल फंड्स उद्योग पर व्यापक असर पड़ेगा, क्योंकि कई बार कंपनियां (फंड हाउसेस) शेयर बाजार की मांग के आधार पर स्कीम लांच करती हैं। लेकिन जब शेयर बाजार का प्रदर्शन अनुरूप नहीं होता, तो रिटर्न्स को आकर्षक बनाने के लिए स्कीम को विविध फंडों में बदल दिया जाता है। कमेटी की सिफारिश लागू होने पर फंड को अपने घोषित वायदों से टिके रहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

सिफारिश के मुताबिक, निवेशकों को उत्पाद बेचने के समय उसके पिछले रिटर्न्स और बेंचमार्क रिटर्न्स के बारे में बताना पड़ेगा। बल्कि रिपोर्ट तो यह तक सुझाती है कि ग्राहकों को किसी खास उत्पाद के पिछले कई रिटर्न्स के बारे में बताया जाना चाहिए। इन तमाम कवायदों का निहितार्थ निवेशकों को यह साफ-साफ बताना है कि उनके निवेश के साथ निश्चित तौर पर जोखिम भी जुड़ा हुआ है, और निवेश से पहले उन्हें इससे जुड़े जोखिम के बारे में बखूबी पता होना चाहिए। हालांकि अन्य कमेटियों की रिपोर्ट की तरह ही इस रिपोर्ट को भी लागू करने के लिए दबाव बनाना होगा। इसके लिए वित्तीय नियामक ढांचे में पूरी तरह से सुधार की जरूरत होगी।


इस रिपोर्ट ने पहले ही वित्तीय सेवा से जुड़े बिचौलियों और कंपनियों के बीच हंगामा खड़ा कर दिया है। न सिर्फ इस व्यवसाय से जुड़ी कंपनियों को, बल्कि निवेशकों को भी इसे समझने और सुझाए गए बदलावों को स्वीकार करने के लिए काफी कुछ करना होगा। इस रिपोर्ट के प्रभावों को तभी महसूस किया जा सकेगा, जब इसकी गहराई समझने के लिए लोगों में पर्याप्त वित्तीय जागरूकता हो, अन्यथा यह भी अन्य रिपोर्टों की तरह केवल बहस का विषय बनकर रह जाएगी।

-लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं

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