फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   small farmers not getting crop insurance

छोटे किसानों से अब भी दूर है फसल बीमा

Sat, 24 Nov 2012 10:54 PM IST
Updated Sat, 24 Nov 2012 10:54 PM IST
विज्ञापन
small farmers not getting crop insurance

दिवाली के ठीक पहले अचानक चक्रवाती नीलम के कहर के चलते तेज बारिश से आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में कई हजार हेक्टेयर में खड़ी धान की फसल नेस्तनाबूद हो गई। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है, तिस पर आपदा के समय महज कुछ सौ रुपये की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की तरह होती है।

विज्ञापन


सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांटकर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर देश में कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान ठगा जाता रहा।
विज्ञापन


हमारे यहां एक तरफ सिंचित खेती है, दूसरी ओर बारिश पर निर्भर किसान। तभी एक तरफ बढ़िया फसल लहलहाती है, दूसरी तरफ बाढ़ या सूखे से किसान रोता दिखता है। ऐसी स्थिति में पैदावार के स्तर में अनिश्चितता तथा मूल्यों के उतार-चढ़ाव की स्थिति से निपटने की किसानों की क्षमता बहुत कम हो गई है। कर्ज की वापसी और वित्तीय संस्थाओं द्वारा कृषि में निवेश भी बहुत कम रहा है। इसी कारण किसानों की खुदकुशी के मामले भी बढ़े हैं। इसके बावजूद खेती-किसानी के बीमा के मामले में सरकार का नजरिया लापरवाही वाला है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जब कहीं से फसल चौपट होने की खबरें आती हैं, तब सियासती जमात खुद को किसानों का रहनुमा सिद्ध करने के लिए बयानों के तीर चलाने लगती हैं। वोट बैंक बचाने के लिए राज्य सरकारें मुआवजों की घोषणा कर देती हैं, जिससे किसान को कोई राहत नहीं मिलती।

आजादी के साथ ही किसानों को सुरक्षित भविष्य के सपने दिखाए जाने लगे थे। वर्ष 1947 में डा. राजेंद्र प्रसाद द्वारा पेश किए गए केंद्रीय विधान में फसल बीमा पर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत का उल्लेख किया गया था। इस बाबत मसौदा तैयार करने में 18 साल लगे। वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने फसल बीमा पर पहला बिल पेश किया, जिसे लागू करने के तरीके खोजने की बात पर लंबा सन्नाटा छा गया। 1970 में धरमनारायण कमेटी ने खेती के जटिल हालात के मद्देनजर फसल के उसकी वास्तविक कीमत के अनुरूप बीमे की किसी योजना के क्रियान्वयन को असंभव बताया था।

लेकिन प्रो. वीएम दांडेकर ने फसल बीमा योजना को व्यावहारिक रूप देने की एक विस्तृत रिपोर्ट बनाई थी। उनका सुझाव था कि फसल की हानि के आकलन के लिए बीते दस वर्षों में पैदा हुई औसत पैदावार को गणना का आधार बनाया जाए। उनका यह भी सुझाव था कि केवल किसी सरकारी संस्थान से खेती के लिए कर्ज लेने वालों को ही इस योजना के दायरे में रखा जाए। जैसे-तैसे 1979 में फसल बीमा की शुरुआत हो सकी। पर यह योजना किसानों को कोई राहत देती ही नहीं थी। हां, किसान द्वारा लिए गए कर्ज का भुगतान सीधे बैंक को करने का प्रावधान अवश्य था।

वर्ष 1985 में इस योजना को खेती के लिए कर्ज लेने वालों के लिए अनिवार्य कर दिया गया। इसमें बीमा राशि को कर्ज का तीन गुना कर दिया गया, ताकि नुकसान होने पर किसान के पल्ले भी कुछ पड़े। प्रति हेक्टेयर औसत फसल के 60 से 90 प्रतिशत का बीमा करने वाली यह योजना किसानों के लिए बंजर ही साबित हुई।

वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने नए सपनों के साथ राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना राष्ट्र को समर्पित की थी। इसमें अनाज, तिलहन और व्यावसायिक फसलों को तो शामिल किया ही गया, कर्ज न लेने वाले किसानों को भी इसके दायरे में शामिल किया गया। पर पूर्व की पिटी हुई योजनाओं की कमियों को दूर करने पर इसमें ध्यान नहीं दिया गया और फसल के नुकसान के आकलन व गणना का काम राज्य सरकार के सहयोग से बीमा कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया गया। अभी तक फसल नुकसान के आकलन का कोई मानक तय नहीं हुआ। नतीजतन भुगतान की प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं।


वैसे भी हमारे किसानों में निरक्षरता का प्रतिशत  अधिक है और जागरूकता का भी अभाव है। करीब 25 लाख किसानों की जोत का रकबा एक हेक्टेयर से कम है। ये लोग कुल संभावित उत्पादन के दो फीसदी के बराबर प्रीमियम भुगतान करने में असमर्थ हैं। काश, छोटे किसानों के लिए प्रीमियम व उस पर सबसिडी की अलग से व्यवस्था होती। यदि बीमित किसान, भुगतान किए गए प्रीमियम, दावा राशि जैसे आंकड़े कंप्यूटर पर तैयार रखे जाएं, तो पीड़ित को तत्काल राहत दी जा सकती है। राष्ट्रीय फसल बीमा योजना से किसान किस तरह लाभान्वित हुआ है, इसकी हकीकत जानने के लिए बीते कुछ वर्षों में कर्ज से बेहाल किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बानगी हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed