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बुक स्टोर की सिमटती दुनिया

Sun, 27 Sep 2015 07:40 PM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 27 Sep 2015 07:40 PM IST
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Shrinking world's of book store

कई वर्षों से मैं अपने समय और पैसे का ज्यादातर हिस्सा उन दुकानों से किताबें खरीदने में लगाता रहा हूं, जिनका स्वामित्व किसी कॉरपोरेशन के बजाय किसी एकल व्यक्ति के पास हो। भारत की बात करें तो यहां किताबों की चार दुकानें मेरी पसंदीदा हैं। बंगलूरू में प्रीमियर, दिल्ली में फैक्ट ऐंड फिक्शन, लखनऊ में राम आडवाणी का बुकस्टोर और चेन्नई में गिगल्स। इनमें से शहर के बीच में स्थित चर्च स्ट्रीट पर टी एस शानबाग द्वारा चलाए जा रहे प्रीमियर के स्टोर से मैं सबसे अच्छी तरह परिचित था। किताबों से प्यार करने वालों के लिए शानबाग पहली पसंद हुआ करते थे। वह अपने ग्राहकों की पसंद-नापसंद को इतने बेहतर ढंग से समझते थे, कि स्टोर में कदम रखते ही ग्राहक के हाथ में उसकी पसंदीदा नई किताब आ जाया करती थी। हालांकि ग्राहक वह किताब खरीदने के लिए बाध्य नहीं थे। सरसरी तौर पर पूरी किताब देखने के बाद अगर ग्राहक उस किताब को दुकान के मालिक को लौटा दे, तो इसमें कोई बुरा भी नहीं मानता था। कई तरह की किताबें होती थीं वहां पर। मगर, यहां उपलब्ध फिक्शन, इतिहास और जीवनियों से जुड़ी अंग्रेजी और अनुवाद की किताबें इस स्टोर को खास बनाती थीं। यह स्टोर जिस जगह स्थित था, वह भी खासा खूबसूरत थी। कोशेज परेड कैफे के पास स्थित यह स्टोर चिन्ना स्वामी स्टेडियम से बस कुछ ही दूर था। बुक स्टोर के अलावा यह दोनों ही बंगलूरू की वे जगहे हैं, जहां मैं लगातार जाता रहा हूं।


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2009 में प्रीमियर बुक स्टोर बंद हो गया, जब 70 साल के हो चुके इसके मालिक ने सम्मानजनक ढंग से रिटायर होने का फैसला किया। इससे मेरी जिंदगी में एक खालीपन-सा आ गया। बहरहाल, इस स्टोर की किताबें खरीदने से मेरे बटुए में जो खालीपन आया करता था, वह बदस्तूर जारी रहा, क्योंकि मैं अब अपना पैसा कहीं और खर्च करने लगा। दिल्ली के वसंत विहार में फैक्ट ऐंड फिक्शन बुक स्टोर को मैं पहले से जानता और पसंद करता था। अब, जबकि शानबाग ने अपना प्रीमियर स्टोर बंद कर लिया, मैंने अजित विक्रम सिंह के इस स्टोर में जाना शुरू कर दिया। चूंकि यह एयरपोर्ट के रास्ते में पड़ता है, इसलिए दिल्ली की तकरीबन हर यात्रा के दौरान यहां जरूर जाना होने लगा। ये महाशय विक्रम सिंह वैसे तो थोड़ा कम बोलने वाले शख्स थे, लेकिन मेरे सामने वह खुलकर पेश आते थे। हम दोनों ही दरअसल एक ही कॉलेज के थे, जहां मैं क्रिकेट खेला करता था और वह वाटर पोलो टीम के कप्तान थे। हम एक-दूसरे से मजाक में बोलते थे, कि देखो, कैसे दो एथलीट आज अपनी रोजी-रोटी किताबों के सहारे चला रहे हैं। यह कुछ ऐसा था, जिसकी उम्मीद कॉलेज के दिनों में न तो उन्होंने, न मैंने और न ही कॉलेज के किसी भी साथी ने की थी।

अब फैक्ट ऐंड फिक्शन भी प्रीमियर स्टोर के रास्ते पर दिख रहा है। किराए में बढ़ोतरी और फ्लिपकार्ट व अमेजन से मिलने वाली टक्कर के चलते विक्रम सिंह के लिए खासी मुश्किलें पैदा हो रही हैं। महीनों नहीं, बस चंद वर्षों की बात और है, जब दो बड़े और मशहूर बुक स्टोर इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। हालांकि 95 साल के हो चुके राम आडवाणी अब भी रोज अपनी दुकान पर जाते हैं। उनके बच्चे लखनऊ में नहीं रहते और उनके बाद उनकी विरासत को संभालने वाला वहां कोई नहीं है। किताबों के व्यवसाय के मामले में राम आडवाणी जैसा अनुभव रखने वाला शख्स भारत या पूरी दुनिया में शायद ही कोई मिले। उनकी शिष्टता देखते बनती है। उनकी दुकान हर वक्त शास्त्रीय संगीत की धुनों से गूंजती रहती हैं। कुछ समय पहले की बात है, जब दिल्ली एयरपोर्ट पर मैं लखनऊ के एक वकील से मिला था। जब मैंने उनसे उत्तर प्रदेश के अपने पसंदीदा बुक स्टोर के बारे में पूछा तो उनका जवाब था कि राम आडवाणी की लखनऊ में वही जगह है, जो बड़े इमामबाड़ा की है। इमामबाड़ा तो वहीं रहेगा, मगर अफसोस की बात है कि राम आडवाणी और उनका स्टोर जल्द ही उनके मित्रों और ग्राहकों की यादों में ही बचा रहेगा।

मैं हर चार-पांच वर्ष में तकरीबन एक बार लखनऊ जाता हूं। इसकी तुलना में मेरा चेन्नई ज्यादा जाना होता है। यहां की मेरी कोई भी यात्रा नलिनी चेत्तूर के गिगल्स बुक स्टोर पर जाए बगैर पूरी नहीं होती। 20 साल या शायद उससे भी पहले जब मैंने पहली बार उनके स्टोर से किताबें खरीदी थीं, तब उनका स्टोर तत्कालीन मद्रास शहर में कॉनमरा होटल के दो कमरों तक सीमित था। अब यह होटल ताज विवांता बन गया है और शहर का नाम हो गया है चेन्नई। नलिनी और गिगल्स स्टोर को दो से एक कमरे में तब्दील होना पड़ा है। यहां की किताबें अब भी काफी समृद्ध हैं और जिनके हाथ में स्टोर की बागडोर है, वह भी काफी जानकार हैं। मगर बढ़ती उम्र और किराए में लगातार होती बढ़ोतरी से गिगल्स पर भी जल्द ही इतिहास बनने का खतरा मंडरा रहा है। अपने इस लेख को दुखांत से बचाने के लिए मैं एक ऐसे बुक स्टोर का उल्लेख करना चाहूंगा, जो न सिर्फ ऊर्जा से भरा है, बल्कि मुझे ज्यादा जीने की वजह भी दे रहा है। यह है 'गुलशन', जो श्रीनगर में रेसीडेंसी रोड पर बसा हुआ है। अपनी यात्रा के दौरान व्यवस्थित ढंग से सजे इस स्टोर से मैंने कुछ किताबें भी खरीदीं।

इस स्टोर में इतिहास, धर्म  और कश्मीर की राजनीति से जुड़ी तमाम किताबें उपलब्ध हैं, जो अंग्रेजी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में हैं। यहीं से मैंने कश्मीर पर कुछ किताबों के अलावा आईपीएस से विद्रोही नेता बने सिमरन जीत सिंह मान की जेल में िबताए वक्त से संबंधित एक किताब भी खरीदी। इसके अलावा मैंने अपनी पत्नी के लिए भी मॉडर्न डिजायन के इतिहास पर एक किताब खरीदी।

किताबों की पुरानी दुकानों का बंद होना लाजिमी है, मगर उनकी जगह लेने के लिए नए स्टोर जरूर खुलने चाहिए। इसके लिए गुलशन के मॉडल से सीख ली जा सकती है, जिसमें अपने शहर और राज्य पर अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में किताबें संग्रहीत हों। ऐसी स्थानीय भक्ति के अलावा वहां देश और दुनिया की तमाम गुणवत्तापूर्ण किताबें भी हों।

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