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विरक्त संत का अनूठा तप
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 17 Jun 2013 10:17 PM IST
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काल नामक ब्राह्मण परम विरक्त और तपस्वी था। सांसारिक सुखों व किसी तरह के प्रलोभनों से दूर रहकर वह धर्मशास्त्रों के अध्ययन में लगा रहता था। एक बार उसने पुष्कर तीर्थ में रहकर घोर तप किया। बिना अन्न-जल ग्रहण किए घोर तप करने के कारण उसके मस्तिष्क से निकलने वाले तेज से देवलोक तक जलने लगा। देवताओं में खलबली मच गई। वे उनके पास पहुंचे और मनचाहा वर मांगने को कहा। ब्राह्मण ने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि वर ही देना है, तो यही दें कि मैं जप-तप करता रहूं।
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काल निरंतर तप करते रहे। उनके कठोर तप से इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र ने भयभीत होकर अप्सराओं को काल के तप में विघ्न डालने के लिए भेजा। तप में लीन काल ने उन अप्सराओं की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा। वे निराश होकर इंद्र के पास लौट आईं। इंद्र ने बार-बार प्रलोभन देकर ब्राह्मण का तप भंग करने का प्रयास किया, किंतु काल किसी भी लालच में नहीं आए। आखिर में इंद्र ने मृत्यु का भय दिखाकर उनके तप को भंग करने का प्रयास किया।
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ब्राह्मण ने काल (मृत्यु) को चुनौती देते हुए कहा, मैं शरीर नहीं, आत्मा हूं। आत्म साक्षात्कार करने के बाद मुझे काल का भय क्या सताएगा?
ब्राह्मण को तप और विरक्ति में अटल देखकर भगवान विष्णु ने दर्शन देकर उन्हें जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कर दिया।