सियासत : सही को सही कहने की बात, तो क्या सही कहने पर सब जगह ऐसा ही होता है!
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विस्तार
क्या आप किसी पुरानी राष्ट्रीय पार्टी का नाम बता सकते हैं, जिसके कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का पुतला जलाया हो, और उसे हारते हुए देखने के लिए कड़ी मेहनत भी की हो? क्या आप किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी का नाम बता सकते हैं, जिसके सांसद ने अपने दस मिनट लंबे और बेबाक ऑक्सफोर्ड यूनियन भाषण से शक्तिशाली ब्रिटिश राजनीति, शिक्षा और मीडिया को हिलाकर रख दिया हो, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा व्यवस्थित रूप से किए गए अकथनीय अन्याय व कुकृत्यों और उसकी नीतियों से जन्मे अकालों व आर्थिक दरिद्रता के दुष्चक्र को उजागर किया और सार्वजनिक रूप से माफी और क्षतिपूर्ति की मांग की, जिसे छह घंटे में करीब 70 लाख लोगों ने पसंद किया? उनके इस कार्य की देश के प्रधानमंत्री सहित पार्टी लाइन से ऊपर उठकर नेताओं ने सराहना की, लेकिन खुद उनकी पार्टी इस पर चुप्पी साधे रही!
क्या आप किसी ऐसी राष्ट्रीय पार्टी का नाम बता सकते हैं, जिसके सांसद ने 26 किताबें लिखी हों, जिनमें से ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेस्टसेलर रही हों, जिनके साप्ताहिक कॉलम भारत और विदेश में दो दर्जन से अधिक प्रकाशनों में छपते हैं और जिनकी पुस्तक ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस’ ने उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाया। जिनकी वाद-विवाद और भाषण कला सेंट स्टीफेंस कॉलेज के दिनों से ही ऐसी रही है, जिसके बारे में कहानियां बनाई जाती हैं, लेकिन उन्हें पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता के रूप में बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता है? तिरुवनंतपुरम से चार बार सांसद रहे शशि थरूर लंबे, सुंदर, शालीन, अच्छे कपड़े पहनने वाले, स्टाइलिश और स्पष्टवादी हैं। सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी-खासी धूम है। ट्विटर (अब एक्स) पर भारत में उनके पास सबसे ज्यादा फॉलोअर्स थे, जब तक कि शाहरुख खान, बिग बी और प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें पीछे नहीं छोड़ दिया।
हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया कि जब वह छोटे थे, तो काफी बीमार रहते थे। तब टीवी, इंटरनेट, फेसबुक या इंस्टाग्राम न होने के कारण, वह किताबें पढ़ने की तरफ आकर्षित हुए। यह उनके पिता द्वारा प्रोत्साहित की गई एक अच्छी आदत थी। वह 1978 में 22 वर्ष की आयु में फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी और टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पीएचडी ग्रहण करने वाले सबसे कम उम्र के छात्रों में से एक थे। वह संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुए और वहां 29 वर्ष बिताए, अवर महासचिव भी बने। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बनने की सोची और भारत के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में इस पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए अपनी दावेदारी पेश की। लेकिन किस्मत और दुनिया की एकमात्र महाशक्ति उनके पक्ष में नहीं थी। हालांकि, उन्हें दूसरे सबसे ज्यादा वोट मिले, दो विदेश मंत्रियों और एक प्रधानमंत्री से ज्यादा।
वह तिरुवनंतपुरम से पहली बार कांग्रेस उम्मीदवार के रूप तौर पर चुनाव लड़े, तो स्थानीय नेता इस बाहरी व्यक्ति से प्रभावित नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपने काम से न केवल जनाधार बढ़ाया, बल्कि लगातार चार लोकसभा चुनाव जीते।
एक बार भाजपा नेता अरुण जेटली ने कहा था कि विपक्ष का काम विरोध करना है, लेकिन शशि विपक्ष के लिए ऐसा नहीं मानते। वह सरकार से वाजिब सवाल पूछने में नहीं हिचकिचाते, लेकिन जब सरकार कुछ सराहनीय करती है, तो सराहना करने से भी पीछे नहीं हटते। सितंबर 2014 में, वह मोदी को उनके संयुक्त राष्ट्र भाषण खासकर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को अपनाने के लिए बधाई देने वाले पहले लोगों में से एक थे। उन्होंने मोदी के कई फैसलों खासकर 2023 में जी-20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन की प्रशंसा की है। तभी से कई लोग कह रहे हैं कि वह नाव छोड़कर भाजपा में शामिल हो जाएंगे। पिछले महीने उन्होंने यह कहकर अफवाहों को हवा दे दी थी कि अगर पार्टी उनकी सेवाओं की कद्र नहीं करती, तो उनके पास दूसरे विकल्प भी हैं।
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से, वह किसी भी अन्य विपक्षी नेता की तुलना में टीवी/अखबार साक्षात्कारों, पॉडकास्ट और बैठकों में अधिक दिखाई दिए हैं, जिसमें उन्होंने हमले की कड़ी निंदा की है, सरकार का समर्थन किया है और इसे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य तक बताया है। अब, जब वह अमेरिका, ब्राजील और कोलंबिया में संसदीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं और सरकार की तरफ से प्रशंसा पा रहे हैं, तो वह कांग्रेस की आंख की किरकिरी बनते जा रहे हैं। उनके जैसी क्षमता और सकारात्मक व रचनात्मक सोच वाला नेता किसी भी पार्टी के लिए एक संपत्ति होगा। कांग्रेस अगर उन्हें खोती है, तो नुकसान उसका ही है।