फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Shareholders of social capital

सामाजिक पूंजी के हिस्सेदार

Sat, 25 Nov 2017 09:35 AM IST
महीपाल
महीपाल Updated Sat, 25 Nov 2017 09:35 AM IST
विज्ञापन
Shareholders of social capital
सामाजिक समावेशन

भारत के समाजों में ठहराव की जो स्थिति थी, वह बदल रही है। समाज जागरूक हो रहे हैं। वे अपनी मांगें व्यवस्था के सामने रख रहे हैं। इस समय बदलाव की स्थिति है। संक्रमण का दौर है। देश के विभिन्न समाज-सुधारकों ने समाज को जगाने का जो कार्य किया था, उसके कई नतीजे सामने आ रहे हैं। लेकिन फिर भी समाज एक समाज न होकर विभिन्न समाजों में बंटा है। इन समाजों की स्थिति विभिन्न रंगों की तरह है, जो पानी में एक साथ तो हैं, लेकिन अपनी पहचान अलग बनाए हैं। साथ-साथ चल भी रहे हैं, लेकिन एक दूसरे में समाकर एक नया रंग नहीं बना पाए हैं। 'बहुजन' जिसमें पिछड़े, दलित आदिवासी व अल्पसंख्यक समाज आते हैं, उनकी स्थिति भी ऐसी ही है। वैसे तो इन समाजों की जनसंख्या 85 प्रतिशत है, लेकिन व्यवस्था में भागीदारी जनसंख्या की तुलना में नहीं के बराबर है। हां, अगर कहीं व्यवस्था में भागीदारी है भी, तो निर्णय लेने की शक्ति कहीं और ही है।


loader

समस्या यह है कि कैसे इन समाजों को जोड़ा जाए, ताकि ये समाज एक सशक्त वर्ग उभार के साथ सामने आएं और व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। दूसरे समाजों को जिन्हें 'ब्राह्मणवाद' की संज्ञा दी जाती है, उन्हें कोसने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि ब्राह्मणवाद तो एक सामाजिक व्यवस्था है, उसका जाति से कोई लेना-देना नहीं है। यह वह व्यवस्था है, जो शोषण करती है। अब इसमें जो भी इसका हिस्सा बन गया, वही इसका आयाम बन गया। बहुजन में भी यह व्यवस्था चलन में है। इसलिए जमाना बदल रहा है, इन समाजों को भी बदलना चाहिए।

उदाहरण दिया जाता है कि इन समाजों को खेती में, उद्योग धंधों में, नौकरियों आदि में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। ठीक है, यह भी जरूरी है, लेकिन महत्वपूर्ण उपाय इन समाजों के विकास के लिए है, इनमें सामाजिक पूंजी का निर्माण करना और जहां पर सामाजिक पूंजी सोई पड़ी है, उसे क्रियाशील करना। अब प्रश्न उठता है, सामाजिक पूंजी क्या है? सामाजिक पूंजी के मुख्यतः तीन आयाम हैं। प्रथम है ‘बॉन्डिंग’ अर्थात जुड़ाव। दूसरा है, ‘ब्रिजिंग’ अर्थात दो से ज्यादा का नेटवर्क। तीसरा है ‘लिंकेज’ अर्थात अनुबंधन, एक कड़ी का दूसरी कड़ी के साथ जुड़ाव। इन तीनों सामाजिक पूंजी की शक्लों में ‘बॉन्डिंग’ अर्थात जुड़ाव तो बहुजन के अलग-अलग समाजों में है। दूसरे शब्दों में यों कहें कि एक जाति के अंदर तो बहुत हद तक सामाजिक पूंजी है। उदाहरण के लिए, अहीरो में जुड़ाव अपनी बिरादरी में है। गुर्जरों में है, लोधों में जाटव, सैनी, खटीक आदि में तो है। लेकिन सामाजिक पूंजी के दूसरे रूप ‘लिंकेज’ की कमी है। इसका अर्थ है कि विभिन्न जातियों एवं वर्गों में ‘नेटवर्किंग’ नहीं है या यों कहंे कि उनमें आपस में समन्वय या तो है नहीं और अगर है भी तो उतना गाढ़ा नहीं हैं। पिछड़ों की विभिन्न जातियों में संबंध नहीं है। इसलिए समाज-सुधारकों ने विभिन्न जातियों के अंतर्गत रोटी एवं बेटी के संबंध जोड़ने की बात कही थी। वास्तविकता तो यह है कि विभिन्न जातियों में बेटी के संबंध की बात तो दूर रही, रोटी का संबंध भी नहीं है। इसलिए विभिन्न समाजों में सेतु बनाने की जरूरत है। तीसरी सामाजिक पूंजी की शक्ल है अनुबंधन अर्थात एक कड़ी को दूसरी कड़ी के साथ जोड़ना। इसका अर्थ है, शासन व्यवस्था में विभिन्न व्यक्तियों का आपस में जुड़ना। इस प्रकार की पूंजी की कमी है। शासन व्यवस्था में जो लोग हैं, वे भी आपस में मिलते-जुलते नहीं। बहुजन समाज के विभिन्न अधिकारी या नेता आपस में संगठित होकर बहुजन समाज को आगे नहीं बढ़ाते। वर्तमान में बहुजन भारत के संबंध में ‘ब्रिजिंग’ सामाजिक पूंजी की जरूरत है, वैसे तो ‘बॉन्डिंग’ सामाजिक पूंजी की भी जरूरत है, लेकिन ज्यादा जरूरत ब्रिजिंग (एक दूसरे से नेटवर्क) सामाजिक पूंजी की है।

वैसे तो बहुजन समाज में शामिल विभिन्न समाजों की संस्थाएं हैं। लेकिन ये संस्थाएं भी सोई पड़ी हैं। इनके सोने का मुख्य कारण ‘लीडरशिप’ की कमी एवं अहं है। एक समाज अपने आप को दूसरे समाज से ऊपर समझता है। प्रश्न उठता है कि कैसे इन समाजों में सामाजिक पूंजी का निर्माण किया जाए। इसके लिए दो चीजें जरूरी हैं। प्रथम है सामाजिक लामबंदी एवं दूसरा है ‘एजेंसी’ की पहचान। विभिन्न जातियों एवं समाजों को एक मंच पर लाने के लिए सामाजिक लामबंदी करने की जरूरत है। एजेंसी के रूप में कोई व्यक्ति भी हो सकता है, कोई सामाजिक संगठन हो सकता है, या कोई स्वयं समाज हो सकता है।

बहुजन के विकास के लिए ‘एजेंसी’  की भूमिका पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों की जागरूक जातियों को निभाना चाहिए। उदाहरण के लिए, पिछड़ों में यह भूमिका अहीर जाति को निभानी चाहिए। दलितों में जाटव जाति को एवं आदिवासियों में मीना जाति को निभानी चाहिए। यहां भूमिका निभाने से आशय है त्याग। ये जातियां अपने लिए त्याग करके उन समाजों को जो पिछड़ी एवं अर्धविकसित है उनके विकास के लिए कार्य करना चाहिए, ताकि समाज में ‘ब्रिजिंग’ सामाजिक पूंजी का विकास हो। कांशीराम जी की सफलता का एक ही कारण था कि उन्होंने अपने अलावा औरों को आगे बढ़ाया। दलित होते हुए भी उन्होंने पिछड़ों को आगे आने का अवसर दिया। विभिन्न समाजों को सामाजिक लामबंदी द्वारा संगठित कर सामाजिक पूंजी का निर्माण किया, जिसका फल ‘बहुजन समाज’ ने चखा।

कांशीराम जी के दृश्य से अलग हो जाने के बाद उन्होंने जो बहुजन समाज में सामाजिक पूंजी का निर्माण किया था, वह कुछ तो समाप्त हो गई है और कुछ सुस्त पड़ी है। अब समय आ गया है कि समाप्त हुई सामाजिक पूंजी का फिर से निर्माण किया जाए तथा जहां पर वह सोई पड़ी है, वहां पर उसे पुनः क्रियाशील बनाई जाए। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed