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साझा विरासत बनाम प्रतीकों की राजनीति: स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय प्रतीक क्यों पैदा हुए? आज याद करना जरूरी
सार
राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें राजनीतिक झगड़ों से ऊपर रखा जाए। आज जरूरत यह याद करने की है कि स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय प्रतीक किसलिए पैदा हुए थे। वे गुलामी के खिलाफ एक साझा चेतना पैदा करने के लिए थे। आज उन प्रतीकों का अर्थ और भी बड़ा हो गया है।
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वंदे मातरम
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
विस्तार
आजादी के आंदोलन की यही सबसे बड़ी खूबसूरती थी कि उसके प्रतीक किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं थे। वे उन लोगों की साझा विरासत थे, जो अलग-अलग विचारों के बावजूद, विदेशी शासन से मुक्ति चाहते थे। आज जब राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बहस हो रही है, तो उस दौर की यह तस्वीर याद करना जरूरी है कि जिस प्रतीक ने कभी अंग्रेजी सत्ता के सामने भारतीयों को एकसाथ खड़ा किया था, उसे आज भारतीयों के बीच यह तय करने का औजार नहीं बनना चाहिए कि कौन कितना राष्ट्रभक्त है। आज ‘वंदे मातरम्’, तिरंगे और दूसरे राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर जिस तरह की राजनीतिक बहस दिखाई देती है, उसमें एक बुनियादी बात कई बार पीछे छूट जाती है।
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राष्ट्रीय प्रतीक किसी सरकार, पार्टी या किसी विचारधारा की संपत्ति नहीं होते। वे पूरे राष्ट्र की साझी स्मृति होते हैं। उनके साथ करोड़ों लोगों की भावनाएं और पीढ़ियों का इतिहास जुड़ा होता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी भारत कोई एकरूप समाज नहीं था। बंगाल का अपना राजनीतिक माहौल था, पंजाब की अपनी बेचैनी थी, महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन की अलग परंपरा थी, दक्षिण भारत में अलग तरह के आंदोलनों ने जन्म लिया। कांग्रेस के भीतर भी विचारों का अंतर था। गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच मतभेद थे। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की सोच में कई मुद्दों पर अंतर था। भगत सिंह की क्रांतिकारी राजनीति अपनी जगह थी और गांधी की अहिंसा अपनी जगह, फिर भी अगर गौर से देखा जाए तो कुछ प्रतीक इन अलग-अलग धाराओं के बीच एक साझा भाव पैदा करते थे और वंदे मातरम् उनमें से एक था।
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1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘वंदे मातरम्’ गाया और कुछ वर्षों बाद स्वदेशी आंदोलन में यही गीत अंग्रेजी शासन के विरोध की आवाज बन गया। विद्यार्थियों से लेकर आम लोगों तक, यह गीत राजनीतिक सभाओं और जुलूसों का हिस्सा बनने लगा। अंग्रेजी सरकार ने कई जगह इसके सार्वजनिक इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोशिश की। यानी जिस समय ‘वंदे मातरम्’ का इस्तेमाल हो रहा था, उसका निशाना ब्रिटिश सत्ता थी और आज यह फर्क समझना जरूरी है। आजादी के समय तिरंगा किसी से यह नहीं पूछता था कि तुम किस पार्टी के समर्थक हो या वंदे मातरम् किसी से यह प्रमाण-पत्र नहीं मांगता था कि तुम कितने राष्ट्रवादी हो। उनका अर्थ ही इस बात में था कि भारत किसी विदेशी सत्ता से आजादी चाहता है। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भारत स्वतंत्र है और लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी राजनीतिक पसंद रखने का अधिकार है। सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं और विचारधाराओं के बीच संघर्ष भी चलता रहता है, लेकिन इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में जब राष्ट्रीय प्रतीक भी राजनीतिक पहचान के औजार बनने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
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आज किसी समारोह में ‘वंदे मातरम्’ गाने को लेकर विवाद हो जाता है। कोई कहता है कि जिसने नहीं गाया, वह राष्ट्रभक्ति से दूर है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक दबाव बताता है। कुछ लोग इसे इतिहास और संस्कृति का सवाल बनाते हैं, तो कुछ चुनावी राजनीति का मुद्दा। और, इस पूरी बहस में संतुलन गायब होता गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान होना चाहिए, पर सम्मान व राजनीतिक इस्तेमाल में फर्क है। एक सैनिक सीमा पर तैनात है, उसके लिए देशभक्ति भाषण का विषय नहीं, रोज की जिम्मेदारी है, एक किसान मौसम की मार के बावजूद खेती करता है, एक शिक्षक छोटे गांव में बच्चों को पढ़ाता है, एक नागरिक मतदान करता है, कानून का पालन करता है और अपने आसपास के लोगों के अधिकारों का सम्मान करता है। क्या इन सबके देशप्रेम को किसी नारे की आवाज से मापना संभव है? राष्ट्रभक्ति का एक रूप भावनात्मक है, पर उसका दूसरा रूप जिम्मेदारी का है और दोनों ही बहुत जरूरी हैं।
राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि वे हमें उस इतिहास की याद दिलाते हैं, जिसमें आज की आजादी आसानी से नहीं मिली, लेकिन उन प्रतीकों को इतना संकीर्ण कर देना कि वे केवल एक राजनीतिक विचारधारा की पहचान बन जाएं, उस इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के स्वरूप को लेकर भी समय-समय पर बहस हुई। अलग-अलग प्रस्ताव आए और बदलाव हुए। आज तिरंगा करोड़ों भारतीयों के लिए सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रीय प्रतीक समय के साथ व्यापक राष्ट्रीय सहमति का हिस्सा बनते हैं। वे किसी एक व्यक्ति या संगठन के जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होते।
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास जटिल है और इसके हिस्सों को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी चर्चा हुई। 1930 के दशक में कांग्रेस के भीतर भी इस बात पर विचार हुआ कि सार्वजनिक राष्ट्रीय अवसरों पर गीत के किन हिस्सों को गाया जाए। उद्देश्य था कि राष्ट्रीय आंदोलन में सभी समुदायों की भागीदारी और सहजता बनी रहे। इस इतिहास को आज कोई अपनी राजनीतिक सुविधानुसार पढ़ सकता है, पर इससे एक बात साफ होती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बहस भारतीय इतिहास में नई नहीं है। फर्क इतना है कि तब बहस गुलाम देश को एकसाथ रखने के लिए थी। असल में, जब कोई दल किसी प्रतीक को अपनी विचारधारा का पर्याय बना देता है, तो उसके विरोधियों में उस प्रतीक को लेकर असहजता पैदा हो सकती है, फिर दूसरा पक्ष उससे दूरी बनाने लगता है और धीरे-धीरे पूरे देश को जोड़ने वाला वही प्रतीक राजनीतिक खेमों की पहचान बन जाता है। राष्ट्र किसी पार्टी से बड़ा है, संविधान किसी चुनाव से बड़ा है, तिरंगा किसी सरकार से बड़ा है, वंदे मातरम् किसी राजनीतिक मंच से बड़ा है। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक किसी एक विचारधारा के नहीं हैं, क्योंकि आजादी की लड़ाई में देश के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग विचारों के लोगों का योगदान था। इसलिए, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करने का सबसे अच्छा तरीका शायद यही है कि हम उन्हें अपने राजनीतिक झगड़ों से थोड़ा ऊपर रखें।
आज जरूरत यह याद करने की है कि स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय प्रतीक किसलिए पैदा हुए थे। वे उस समय की गुलामी के खिलाफ एक साझा चेतना पैदा करने के लिए थे। आज जब भारत स्वतंत्र है, उन प्रतीकों का अर्थ और भी बड़ा हो गया है। अब वे हमें किसी विदेशी सत्ता के खिलाफ खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि अपने साझा लोकतांत्रिक जीवन की याद दिलाने के लिए हैं। इनका सम्मान कीजिए, लेकिन देशभक्ति का प्रमाण-पत्र मत बनाइए, क्योंकि जिस दिन प्रतीक यह तय करने लगेंगे कि कौन अपना है और कौन पराया, उसी दिन वे उस भूमिका से दूर हो जाएंगे, जिसके लिए वे इतिहास में इतने महत्वपूर्ण बने थे।