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शहबाज की नई चाल : पाकिस्तान के प्रधानमंत्री क्या वाकई कश्मीर मुद्दा हल करना चाहते हैं या बस हवाई बातें कर रहे

Fri, 02 Sep 2022 07:08 AM IST
Shivdan Singh शिवदान सिंह
Updated Fri, 02 Sep 2022 07:08 AM IST
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सार
भारत सरकार शिमला समझौते के समय से ही कह रही है कि जम्मू-कश्मीर के विवाद को भारत-पाकिस्तान द्वारा स्वयं ही निपटाना चाहिए और इसमें संयुक्त राष्ट्र की कोई आवश्यकता नहीं है। अब धीरे-धीरे पाकिस्तान की जनता ने भी वहां की सेना के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू कर दी है। 
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Shahbaz Sharifs new trick: Does Prime Minister of Pakistan really want to solve Kashmir issue
शहबाज शरीफ - फोटो : facebook/ShehbazSharif

विस्तार

कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा है कि उनका देश भारत के साथ एक और युद्ध नहीं चाहता और भारत के साथ स्थायी शांति चाहता है और इसके लिए दोनों देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संकल्प के अनुसार कश्मीर मसले का समाधान करना चाहिए। तो क्या है, सुरक्षा परिषद का संकल्प? 



सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल, 1948 को अपने संकल्प 47 में भारत और पाकिस्तान को निर्देश जारी किए कि दोनों देश युद्ध समाप्ति के लिए संघर्षविराम की घोषणा शीघ्र करेंगे। फिर पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के कब्जे वाले क्षेत्रों से पीछे हटेगा और भारत भी अपनी सेना कम करेगा। इस क्षेत्र में सामान्य वातावरण स्थापित किया जाए और इसके बाद सुरक्षा परिषद की देखरेख में जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए। 


लेकिन सुरक्षा परिषद के निर्देशों के बावजूद पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर तथा गिलगित-बालटिस्तान से न तो अपनी सेनाओं को ही हटाया और न ही क्षेत्र से कब्जा हटाया। इसलिए जम्मू-कश्मीर में सामान्य वातावरण का निर्माण नहीं हो सका। पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए भारत के साथ 1947, 1965 और 1999 में युद्ध लड़े हैं, जिनमें पाकिस्तान ही हमलावर था। 

यह कैसा विरोधाभास है कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के अनुसार इस विवाद का हल करना चाहता है, जबकि वह स्वयं उसके निर्देशों का पालन करने के लिए तैयार नहीं है! बंटवारे के नियम कानून अंग्रेजों ने तय किए थे, जिसके अनुसार संपूर्ण भारत में फैली हुई पांच सौ से अधिक रियासतों का दोनों देशों में विलय हुआ। जम्मू-कश्मीर का विलय वहां के महाराजा हरि सिंह की इच्छा के अनुसार भारत में हुआ। 

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इस विवाद को शुरू करने में पाकिस्तान की सेना का बहुत बड़ा हाथ है। पाकिस्तान की सेना बंटवारे के फौरन बाद से पाकिस्तान पर अपना एकछत्र राज चाहती थी। इसके लिए उसने पाकिस्तान की जनता को यह दिखाने की कोशिश की, कि भारत ने पाकिस्तान के साथ बंटवारे में बहुत नाइंसाफी की है और इसका बदला लेने के लिए सेना भारत से युद्ध करेगी। 

इस नीति के अनुसार वहां की सेना ने 28 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर कबायलियों के वेश में हमला कर दिया। विश्व को यह दिखाने के लिए कि कश्मीर के स्थानीय कबायली क्षेत्र के निवासी कश्मीर के भारत में विलय से खुश नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भारत सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है! 28 अक्तूबर, 1947 की रात में ही महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय का निर्णय लिया और इसके फौरन बाद उसी रात को भारतीय सेना हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंचने लगी। 

29 अक्तूबर को भारतीय सेना की सिख बटालियन ने बारामूला में हमलावरों का मुकाबला करना शुरू कर दिया और उन्हें वहीं पर रोक दिया। इसको देखते हुए हमलावरों ने अपना रास्ता बड़गांव की तरफ से बनाना शुरू कर दिया, जहां पर सेना की कुमाऊं बटालियन ने इनको बहादुरी से रोका, जिसमें मेजर सोमनाथ शर्मा को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। इस प्रकार पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र बना दिया। 
वास्तविकता यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निर्देशों की सार्थकता नहीं बची है। भारत सरकार शिमला समझौते के समय से ही कह रही है कि जम्मू-कश्मीर के विवाद को भारत-पाकिस्तान द्वारा स्वयं ही निपटाना चाहिए और इसमें संयुक्त राष्ट्र की कोई आवश्यकता नहीं है। अब धीरे-धीरे पाकिस्तान की जनता ने भी वहां की सेना के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू कर दी है। 

भारत की विकासशील नीतियों को देखते हुए पाक अधिकृत कश्मीर के निवासी भी स्वयं भारत में मिलना चाहते हैं। इसलिए पाकिस्तान जो धन भारत जैसे बड़े देश की सेना के विरुद्ध अपनी सेना को तैयार करने में खर्च कर रहा है, उस धन को उसे अपने देश के विकास पर खर्च करना चाहिए। इससे इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित होगी और दोनों देश मिलकर विश्व की महाशक्ति बन सकते हैं। (-लेखक भारतीय सेना के पूर्व कर्नल हैं)

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