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सेवा में सुधार, जनाधार का विस्तार

ऑलिवर हीथ एवं लुइस टिलिन Updated Mon, 21 Aug 2017 07:30 PM IST
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भारत सरकार के इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण ने फिर बताया कि देश के राज्य प्रतिस्पर्धी सेवा वितरण के बजाय प्रतिस्पर्धी लोक-लुभावनवाद में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। नतीजतन भारत निरंतर कमजोर राज्य क्षमता से ग्रस्त है, जिसका मतलब है कि भारतीय राज्य शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने या गरीब हितैषी कार्यक्रम लागू करने में अक्षम हैं।

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कई भारतीय राज्यों के नागरिक अपने कानूनी अधिकार पाने में विफल रहते हैं। इसका एक कारण है नागरिक और सरकार के बीच ग्राहकवादी रिश्तों (राजनीतिक समर्थन पाने के लिए वस्तु एवं सेवाओं का लेन-देन) का बने रहना, जिसका राजनीतिक दल अक्सर फायदा उठाते हैं। बुनियादी वस्तु एवं सेवाओं तक नियमित पहुंच का आनंद लेने के बजाय गरीब नागरिकों को आम तौर पर अपने सामाजिक और राजनीतिक संबंधों पर निर्भर रहकर स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सामाजिक हस्तांतरण के लिए समझौते करने पड़ते हैं। उनके अधिकार भी अक्सर इन नेटवर्कों पर निर्भर रहते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दल स्थानीय दलालों की गतिविधियों पर भरोसा करते हैं, जो मतदाताओं का भरोसा जीतते हैं और वस्तु एवं सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बिचौलिये के रूप में काम करते हैं। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल बड़े पैमाने पर नकदी और सामान बांटते हैं। इस प्रवृत्ति ने भारतीय चुनावों को अविश्वसनीय रूप से खर्चीला बना दिया है।


अर्थशास्त्री फिलिप कीफर एवं रैजवन व्लाइकु ने सुझाया है कि राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव जीतने के लिए वोट खरीदने और अन्य ग्राहकवादी रणनीति पर भरोसा करने का एक कारण यह है कि सार्वजनिक नीति प्रतिबद्धताओं के आधार पर अपनी विश्वसनीयता स्थापित करना बहुत महंगा पड़ता है। जहां राज्य क्षमता कमजोर होती है, वहां राजनेताओं के लिए नीतिगत लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता है और इस प्रकार उनके ग्राहकवाद पर निर्भर होने की संभावना अधिक होती है। ग्राहकवादी रणनीति पर निर्भरता नौकरशाही की क्षमता को कम करती है, जिससे एक दुश्चक्र बनता है।

भारतीय राज्यों के अध्ययन के दौरान हमें ऐसे पर्याप्त सबूत मिले, जो दिखाते हैं कि राज्य के नेता अपनी चुनावी संभावनाएं बढ़ाने के लिए सेवा वितरण में सुधार के साथ प्रयोग कर रहे हैं। हमारे ताजा शोध में पता चला है कि जहां सुधार के प्रयास सफल रहे हैं, वहां सामान्य एवं गरीब मतदाताओं में राजनीतिक दलों द्वारा वोट खरीदने के प्रयासों का जवाब देने की पर्याप्त संभावना होती है। पर जब सार्वजनिक सेवा की स्थिति बदतर होती है, तब लोग वोट खरीदने के प्रयासों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं।
 
शोध के क्रम में हमने मध्य भारत के दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तुलना की। हालांकि राज्य विभाजन के बाद से दोनों राज्यों के नेताओं (दोनों भाजपा) ने अलग-अलग फैसले लिए कि संस्थानों के प्रदर्शन बेहतर करने के लिए, जो सार्वजनिक सेवाओं के वितरण के लिहाज से महत्वपूर्ण है, किस तरह स्थानीय नौकरशाही के साथ काम करना है। जहां मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों एवं कृषि विकास को अपने चुनावी मंच का मुख्य मुद्दा बनाया, वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ग्रामीण गरीबों को प्राथमिकता देने वाले कार्यक्रम शुरू किए। उन्होंने ग्रामीण गरीबों के क्षेत्र में भाजपा के सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिश की और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के जरिये आर्थिक विकास की तरफ झुकाव दिखाया। इन दोनों नेताओं के भिन्न नजरिये के कारण ही सीमा के दोनों तरफ रहने वाले ग्रामीणों को बुनियादी चीजों, खासकर गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों, जैसे जन वितरण प्रणाली, मनरेगा के अनुभव भिन्न रहे।

सीमा के दोनों तरफ के चालीस गांवों के 480 मतदाताओं के बीच किए गए सर्वे ने इस बात की पुष्टि की कि छत्तीसगढ़ के लोगों ने मध्य प्रदेश के लोगों की तुलना में अपेक्षाकृत ज्यादा कुशल, सार्वभौमिक और आसान पहुंच वाले कल्याण कार्यक्रमों का अनुभव किया, जबकि मध्य प्रदेश में लोक कल्याण कार्यक्रम अप्रभावी, रिसावपूर्ण और स्थानीय राजनीतिक मध्यस्थता के अधीन पाया गया। छत्तीसगढ़ के 94 फीसदी लोगों के पास राशन कार्ड था, जबकि मध्य प्रदेश के 81 फीसदी लोगों के पास यह कार्ड था। छत्तीसगढ़ में 79 फीसदी लोगों के पास बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) कार्ड पाया गया, जबकि मध्य प्रदेश में मात्र 34 प्रतिशत लोगों ने ही बीपीएल कार्ड होने की बात स्वीकार की। इस कारण छत्तीसगढ़ के लोगों की सरकारी कार्यक्रमों-पीडीएस (छत्तीसगढ़ में 92  फीसदी, मध्य प्रदेश में 46 फीसदी) और मनरेगा ( छत्तीसगढ़ में 44  फीसदी, मध्य प्रदेश में 28 फीसदी) तक पहुंच आसान थी। छत्तीसगढ़ के लोग पीडीएस से संतुष्ट थे।

सीमा के दोनों तरफ के गांवों में हमने लोगों से काल्पनिक वोट खरीद की स्थिति के बारे में भी पूछा। निष्कर्ष बताता है कि खराब संस्थागत प्रदर्शन के कारण मध्य प्रदेश के लोग छत्तीसगढ़ के लोगों की तुलना में छोटे-छोटे प्रलोभनों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हंै, क्योंकि छत्तीसगढ़ में संस्थागत प्रदर्शन बेहतर है।
 
इन निष्कर्षों का केंद्रीय निहितार्थ है कि वस्तुएं बांटकर वोट खरीदने के प्रयासों और स्थानीय संस्थाओं व सेवा वितरण के बीच रिश्ता है। जब संस्थाएं अच्छी तरह से काम नहीं करतीं और उनमें रिसाव होता है, तो सार्वजनिक नीतियों का लाभ पाने की संभावना कम होती है। ऐसी स्थितियों में तर्कशील मतदाता भविष्य की चिंता छोड़ तात्कालिक भौतिक लाभ की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन जब संस्थाएं कुछ हद तक ही सही, अच्छी तरह से काम करती हैं, तो मतदाता वायदे और क्रियान्वयन के बीच बेहतर संबंध देखते हैं और उनके अल्पकालिक लाभ की ओर आकर्षित होने की संभावना कम होती है।

-ऑलिवर हीथ यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं और लुइस टिलिन किंग्स कॉलेज, लंदन में वरिष्ठ व्याख्याता हैं

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