फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   service and help

सेवा-सहायता ही सर्वोपरि धर्म

Fri, 26 Apr 2013 11:15 PM IST
Updated Fri, 26 Apr 2013 11:15 PM IST
विज्ञापन
service and help

संत ज्ञानेश्वर एक दिन पावन नदी के तट पर भगवान के नाम का जाप कर रहे थे। उनसे कुछ ही दूरी पर एक अन्य संत भी आंखें बंद कर भगवान का ध्यान कर रहे थे। तभी नदी में स्नान के लिए आए एक बच्चे का पैर फिसला और वह पानी के तेज बहाव में बहने लगा।

विज्ञापन


डूबने का खतरा देख वह बच्चा जोर-जोर से चिल्लाने लगा, मुझे बचाओ, कोई मुझे डूबने से बचाओ। ध्यान कर रहे संत ने बच्चे की आवाज सुनी, नदी में उस बच्चे को बहते हुए देखा और पुनः आंख बंद कर ध्यान में लग गए। संत ज्ञानेश्वर ने भी बच्चे के चिल्लाने की आवाज सुनी और वह तुरंत उठकर उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़े।
विज्ञापन


गहरे जल में डूबने की परवाह किए बिना वह तैरकर बच्चे को बचा लाए। तट पर आने के बाद उन्होंने ध्यान करते महात्मा से पूछा, क्या तुमने हमें दर्शन देने आए बालरूप भगवान श्रीकृष्ण की आवाज नहीं सुनी। भगवान बालक का रूप धरकर तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे कि तुम्हारे हृदय में करुणा-संवेदना की भावना है या नहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


याद रखो, किसी निरीह बच्चे को संकट में देखकर, उसकी चीख-पुकार सुनकर भी आंखें बंद किए रखना ध्यान नहीं, पाखंड है। यह सुनकर महात्मा की आंखें खुल गईं। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के समक्ष संकल्प लिया कि वह आज से सेवा और सहायता को ही सर्वोपरि धर्म मानेंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed