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'लिव इन रिलेशन' में सुरक्षा का सवाल
ज्ञानेंद्र रावत
Updated Thu, 12 Dec 2013 07:22 PM IST
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समाज, संस्कृति और धर्म के ठेकेदार भले इस सवाल पर बावेला मचाएं, लेकिन इसके उलट सच्चाई यह है कि कानून भले इसकी वैधता न स्वीकारे, लेकिन आज के दौर में 'लिव इन रिलेशनशिप' के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यही वह वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद से यह कहना पड़ा कि वह घरेलू हिंसा अधिनियम में ऐसी तब्दीलियां करे जिससे 'लिव इन रिलेशनशिप' में बंधी महिलाओं और उनके बच्चों को भी उसके तहत सुरक्षा मिल सके।
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यह कटु सत्य है कि यदि एक निश्चित समय से ज्यादा समय तक एक साथ रहने वाले स्त्री-पुरुषों के रिश्ते को कानूनी मान्यता मिल सके, तो इससे उनके बच्चों के कानूनी अधिकार भी तय किए जा सकते हैं। देखा जाए, तो हमारे देश में 'लिव इन रिलेशन' नई बात है। संविधान निर्माण के समय संविधान निर्माताओं ने इसकी कल्पना तक नहीं की थी। लेकिन अब देश में ऐसे रिश्तों में रहने वाले स्त्री-पुरुषों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। जबकि अब तक इसे कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। यह बात दीगर है कि इस संबंध को आजकल शादी का विकल्प भी कहा जा रहा है। यह ठीक है कि समाज में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के चलन को बढ़ाने में फिल्मों और फिल्मी सितारों की अहम भूमिका है।
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समाज इसे भले नकारे, लेकिन इसके कुछ फायदे भी हैं। इसमें न कोई बंधन, न कोई दस्तावेज होता है, हां वैवाहिक जीवन की तरह स्त्री-पुरुष साथ रहते जरूर हैं और घर के सभी खर्च, दोनों उठाते हैं। इसमें एक दूसरे से जिम्मेदारियों की उम्मीद कम रहती है, न वायदों को निभाने का झंझट और न कोई कानूनी अड़चन। इसे जब चाहे बिना किसी कानूनी अड़चन, भावनात्मक लगाव व आर्थिक परेशानियों के आसानी से तोड़ा जा सकता है। दोनों अपने-अपने अलग खाते खोलने, उसे चलाने के लिए व खर्च करने के लिए स्वतंत्र हैं। वे एक अच्छे इंसान की तरह साथ रहते हैं, जो स्वतंत्र रूप से अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। दुनिया के कई देशों में इस संबंध को मान्यता भी मिल चुकी है, जो असलियत में शादी से पहले का एक ‘लिटमस टेस्ट’ है, जिसमें सही मायने में एक असली इंसान के दर्शन होते हैं। इस सामाजिक बदलाव के दर्शन अब देश के पारंपरिक समाज में भी होने लगे हैं। दरअसल यह रिश्ता एक अनौपचारिक समझदारी और जिम्मेदारी पर आधारित है। यह रिश्ता तब तक ठीक-ठाक चलता है, जब तक कि दोनों की आपसी समझ और जिम्मेदारी बनी रहती है। परेशानी तब आती है, जब इस संबंध में कड़वाहट आनी शुरू हो जाती है।
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विवाह के मामले में तलाक की लंबी और जटिल प्रक्रिया वह अहम कारण होती है, जो उसे बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए लिव इन रिलेशन में रहने वाले स्त्री-पुरुषों को भी कानूनी सुरक्षा मिलना बेहद जरूरी है। इन मामलों की बढ़ती तादाद को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की यह राय है कि ऐसी महिला को गुजारे भत्ते का पूरा हक मिलना चाहिए और ऐसे संबंध से पैदा बच्चों को पिता की संपत्ति पर पूरा हक मिलना चाहिए।
गौरतलब है कि हमारे देश में बहुतेरी जातियों और वर्गों में सदियों से ऐसे रिश्तों का प्रचलन रहा है। पर उन जातियों या वर्गों के अपने नियम-कायदे और शर्तें हैं, जिन्हें अमली जामा पहनाने के लिए उनकी अपनी पंचायतें और संगठन हैं। भारत में विवाह संबंधी कानूनों का निर्माण उच्च वर्णों में व्याप्त नियमों के आधार पर किया गया है। आज जब रिश्तों का महत्व लेन-देन पर निर्भर हो गया हो, जब रिश्तों के मायने ही बदल गए हों, परंपरागत बंधन तिरोहित होते जा रहे हों और विवाह नाम की संस्था के बारे में लोगों की सोच ही नहीं, व्यवहार भी बदल गया हो, स्त्री विवाह नाम की संस्था से बाहर निकलना चाह रही हो और अपनी पहचान के प्रति गंभीर वह जिंदगी अपने तरीके से जीना चाह रही हो, ऐसे में अलग होने में कोई बुराई नहीं लगती।
छोटे शहरों में भले इसका प्रतिशत कम हो, पर महानगरों में बढ़ते तलाक के मामले स्त्री स्वातंत्र्य, सशक्तिकरण, शिक्षा, आर्थिक आजादी और बेहतर करियर की चाह के जीते जागते सबूत हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महत्वपूर्ण तो है ही, उसकी प्रासंगिकता निर्विवाद है। वैश्विक विकास के दौर में हमें इस नई स्थिति को स्वीकारना ही होगा।