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मोदी की लोकप्रियता पर मुहर
नीरजा चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
Updated Tue, 15 May 2018 07:40 PM IST
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नरेंद्र मोदी
कर्नाटक के चुनावी नतीजे ने बेशक सरकार गठन की संभावनाओं को फौरी तौर पर असमंजस में डाल दिया है, और भाजपा का विजय रथ भले बहुमत के करीब आकर फंस गया है, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन उम्मीद से भी बेहतर रहा है। इस चुनाव में शुरू से ही भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर बताई जा रही थी, लेकिन नतीजा बताता है कि कांग्रेस की तुलना में भाजपा को पच्चीस-तीस सीटें अधिक मिली हैं।
यह नतीजा एक बार फिर इस धारणा पर मुहर लगाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख और लोकप्रियता बरकरार है। ऐसे ही अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा के कुशल चुनावी प्रबंधन का तो कहना ही क्या! भाजपा के साथ अच्छी बात यह कि वह हर चुनाव को बेहद गंभीरता से लेती है और मेहनत करती है। भाजपा कार्यकर्ता हर मतदाता के घर पर तो पहुंचते ही हैं, कर्नाटक में चुनाव का जायजा लेने के दौरान मुझे पता चला कि मतदाताओं के यहां जाने पर कार्यकर्ताओं को अगर उनके घर में किन्हीं धर्मगुरुओं की तस्वीर मिली, तो वे उन गुरुओं से भी मिले और उनसे अनुरोध किया कि वे भाजपा को वोट देने की अपील अपने अनुयायियों से करें। इसके अलावा भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासित कार्यकर्ताओं की भूमिका तो खैर हर चुनाव में रहती ही है।
कर्नाटक की इस चुनावी सफलता में जाहिर है, प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका सर्वाधिक रही। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा की लोकप्रियता लिंगायत समुदाय से बाहर कम ही थी। फिर उनकी अपनी छवि और अलग पार्टी बनाने की सच्चाई भी भाजपा के अंदर उन्हें कमोबेश कमजोर कर रही थी। इसीलिए सिद्धारमैया के साथ चुनावी मुकाबले में वह हल्के नजर आ रहे थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की कमान हाथ में लेते ही तस्वीर बदलने लगी।
इससे यह भी पता चलता है कि भाजपा के प्रति कहीं लोगों में थोड़ी-बहुत नाराजगी अगर है भी, तो भी मोदी की साख बरकरार है। जनता को लगता है कि वह जरूर कुछ बेहतर करेंगे। हालांकि इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कर्नाटक में भाजपा ने ध्रुवीकरण भी जमकर किया, खासकर उत्तर और तटीय कर्नाटक में। इसका उसे चुनावी लाभ मिला है। पर जो जीता, सिकंदर तो वही होता है। इस जीत ने अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदों को और भी बल प्रदान किया है। अब भी विपक्ष में ऐसा कोई चेहरा नहीं दिखता, जो नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर सके।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो वह उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करने में विफल रही। जबकि कर्नाटक की जनता सिद्धारमैया सरकार के उतने खिलाफ भी नहीं थी। लोगों में सरकार के विरुद्ध आक्रोश नहीं देखा गया। किसानों में हालांकि सरकार से नाराजगी थी, लेकिन पिछली सिद्धारमैया सरकार ने आम जनता के लिए कई जनहितकारी योजनाएं सफलतापूर्वक चलाईं। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मेहनत की। अगर आप देखें, तो कांग्रेस का वोट प्रतिशत कम नहीं है। हां, वह वोट प्रतिशत को सीटों में तब्दील नहीं कर पाई।
सीटों के गणित में कांग्रेस के पिछड़ने की कई वजहें हैं। एक तो सिद्धारमैया ने जो लिंगायत कार्ड खेला था, वह फेल हो गया। इससे दूसरे समूहों में कांग्रेस के प्रति क्षोभ पैदा हुआ। प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी रैलियों में यह कहते हुए इसका पूरा लाभ उठाया कि कांग्रेस हिंदू समाज को बांटने का काम कर रही है। इसके अलावा सिद्धारमैया के खिलाफ कांग्रेस के अंदर भी गुस्सा था। जनता दल (सेक्यूलर) से कांग्रेस में आए सिद्धारमैया को इतना महत्व मिलना राज्य के पुराने कांग्रेसी नेताओं को रास नहीं आ रहा था। भाजपा के मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी येदियुरप्पा के खिलाफ भी भाजपा के अंदर कम आक्रोश नहीं था। पर यहीं भाजपा और कांग्रेस का फर्क सामने आ जाता है। भाजपा ने येदियुरप्पा के खिलाफ भीतरी कलह को मुखर नहीं होने दिया, जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाई।
एक चीज और ध्यान देने की है। कर्नाटक में जब तक मुकाबला सिद्धारमैया और येदियुरप्पा के बीच था, तब तक सिद्धारमैया बीस साबित हो रहे थे। लेकिन जैसे ही कर्नाटक की लड़ाई नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी में बदल गई, मोदी ने बाजी पलट दी और परिदृश्य बदल गया। मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में अब तक मोदी ही बीस साबित होते रहे हैं। यह बात राहुल गांधी को समझनी चाहिए।
कांग्रेस ने एक और रणनीतिक गलती यह की कि उसने चुनावी गठबंधन के बारे में नहीं सोचा।
खासकर तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने यह सवाल किया है कि चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस ने सरकार गठन की दिशा में जो पहल की, वह चुनाव से पहले क्यों नहीं हो सकती थी। हालांकि यह ज्ञात है कि इन दोनों पार्टियों में चुनाव पूर्व गठबंधन व्यावहारिक वजहों से संभव नहीं हुआ। अव्वल तो दोनों पार्टियों के मतदाता अलग-अलग हैं, जैसे, वोक्कालिका जेडीएस का परंपरागत समर्थक है, तो ओबीसी और दलित कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं और इनके वोट हस्तांतरणीय (ट्रांसफेरेबल) भी नहीं हैं। दूसरे, मुख्यमंत्री पद पर असमंजस बना हुआ था। यह अलग बात है कि जेडीएस के बेहतर प्रदर्शन के कारण कांग्रेस ने कुमारस्वामी को गठबंधन सरकार का मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की है।
लेकिन कर्नाटक का यह प्रसंग कांग्रेस के लिए सबक है कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए उसे झुकना होगा और गठबंधन भी बनाना होगा। जिस मोड़ पर वह अभी खड़ी है, उसमें उसके लिए अकेले चल पाना संभव नहीं। कांग्रेस अगर वाकई भाजपा से मुकाबला करना चाहती है, तो उसे अपने उत्थान के मुद्दे को थोड़े समय के लिए पीछे छोड़ देना होगा। उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वह समानधर्मा पार्टियों से न सिर्फ गठजोड़ करे, बल्कि जरूरी पड़ने पर खुद को पीछे रखने से भी संकोच न करे। अगर वह ऐसा कर पाती है, तभी 2019 के लोकसभा चुनाव में वह कुछ हासिल करने के बारे में सोच सकती है।
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यह नतीजा एक बार फिर इस धारणा पर मुहर लगाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख और लोकप्रियता बरकरार है। ऐसे ही अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा के कुशल चुनावी प्रबंधन का तो कहना ही क्या! भाजपा के साथ अच्छी बात यह कि वह हर चुनाव को बेहद गंभीरता से लेती है और मेहनत करती है। भाजपा कार्यकर्ता हर मतदाता के घर पर तो पहुंचते ही हैं, कर्नाटक में चुनाव का जायजा लेने के दौरान मुझे पता चला कि मतदाताओं के यहां जाने पर कार्यकर्ताओं को अगर उनके घर में किन्हीं धर्मगुरुओं की तस्वीर मिली, तो वे उन गुरुओं से भी मिले और उनसे अनुरोध किया कि वे भाजपा को वोट देने की अपील अपने अनुयायियों से करें। इसके अलावा भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासित कार्यकर्ताओं की भूमिका तो खैर हर चुनाव में रहती ही है।
कर्नाटक की इस चुनावी सफलता में जाहिर है, प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका सर्वाधिक रही। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा की लोकप्रियता लिंगायत समुदाय से बाहर कम ही थी। फिर उनकी अपनी छवि और अलग पार्टी बनाने की सच्चाई भी भाजपा के अंदर उन्हें कमोबेश कमजोर कर रही थी। इसीलिए सिद्धारमैया के साथ चुनावी मुकाबले में वह हल्के नजर आ रहे थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की कमान हाथ में लेते ही तस्वीर बदलने लगी।
इससे यह भी पता चलता है कि भाजपा के प्रति कहीं लोगों में थोड़ी-बहुत नाराजगी अगर है भी, तो भी मोदी की साख बरकरार है। जनता को लगता है कि वह जरूर कुछ बेहतर करेंगे। हालांकि इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कर्नाटक में भाजपा ने ध्रुवीकरण भी जमकर किया, खासकर उत्तर और तटीय कर्नाटक में। इसका उसे चुनावी लाभ मिला है। पर जो जीता, सिकंदर तो वही होता है। इस जीत ने अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदों को और भी बल प्रदान किया है। अब भी विपक्ष में ऐसा कोई चेहरा नहीं दिखता, जो नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर सके।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो वह उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करने में विफल रही। जबकि कर्नाटक की जनता सिद्धारमैया सरकार के उतने खिलाफ भी नहीं थी। लोगों में सरकार के विरुद्ध आक्रोश नहीं देखा गया। किसानों में हालांकि सरकार से नाराजगी थी, लेकिन पिछली सिद्धारमैया सरकार ने आम जनता के लिए कई जनहितकारी योजनाएं सफलतापूर्वक चलाईं। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मेहनत की। अगर आप देखें, तो कांग्रेस का वोट प्रतिशत कम नहीं है। हां, वह वोट प्रतिशत को सीटों में तब्दील नहीं कर पाई।
सीटों के गणित में कांग्रेस के पिछड़ने की कई वजहें हैं। एक तो सिद्धारमैया ने जो लिंगायत कार्ड खेला था, वह फेल हो गया। इससे दूसरे समूहों में कांग्रेस के प्रति क्षोभ पैदा हुआ। प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी रैलियों में यह कहते हुए इसका पूरा लाभ उठाया कि कांग्रेस हिंदू समाज को बांटने का काम कर रही है। इसके अलावा सिद्धारमैया के खिलाफ कांग्रेस के अंदर भी गुस्सा था। जनता दल (सेक्यूलर) से कांग्रेस में आए सिद्धारमैया को इतना महत्व मिलना राज्य के पुराने कांग्रेसी नेताओं को रास नहीं आ रहा था। भाजपा के मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी येदियुरप्पा के खिलाफ भी भाजपा के अंदर कम आक्रोश नहीं था। पर यहीं भाजपा और कांग्रेस का फर्क सामने आ जाता है। भाजपा ने येदियुरप्पा के खिलाफ भीतरी कलह को मुखर नहीं होने दिया, जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाई।
एक चीज और ध्यान देने की है। कर्नाटक में जब तक मुकाबला सिद्धारमैया और येदियुरप्पा के बीच था, तब तक सिद्धारमैया बीस साबित हो रहे थे। लेकिन जैसे ही कर्नाटक की लड़ाई नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी में बदल गई, मोदी ने बाजी पलट दी और परिदृश्य बदल गया। मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में अब तक मोदी ही बीस साबित होते रहे हैं। यह बात राहुल गांधी को समझनी चाहिए।
कांग्रेस ने एक और रणनीतिक गलती यह की कि उसने चुनावी गठबंधन के बारे में नहीं सोचा।
खासकर तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने यह सवाल किया है कि चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस ने सरकार गठन की दिशा में जो पहल की, वह चुनाव से पहले क्यों नहीं हो सकती थी। हालांकि यह ज्ञात है कि इन दोनों पार्टियों में चुनाव पूर्व गठबंधन व्यावहारिक वजहों से संभव नहीं हुआ। अव्वल तो दोनों पार्टियों के मतदाता अलग-अलग हैं, जैसे, वोक्कालिका जेडीएस का परंपरागत समर्थक है, तो ओबीसी और दलित कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं और इनके वोट हस्तांतरणीय (ट्रांसफेरेबल) भी नहीं हैं। दूसरे, मुख्यमंत्री पद पर असमंजस बना हुआ था। यह अलग बात है कि जेडीएस के बेहतर प्रदर्शन के कारण कांग्रेस ने कुमारस्वामी को गठबंधन सरकार का मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की है।
लेकिन कर्नाटक का यह प्रसंग कांग्रेस के लिए सबक है कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए उसे झुकना होगा और गठबंधन भी बनाना होगा। जिस मोड़ पर वह अभी खड़ी है, उसमें उसके लिए अकेले चल पाना संभव नहीं। कांग्रेस अगर वाकई भाजपा से मुकाबला करना चाहती है, तो उसे अपने उत्थान के मुद्दे को थोड़े समय के लिए पीछे छोड़ देना होगा। उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वह समानधर्मा पार्टियों से न सिर्फ गठजोड़ करे, बल्कि जरूरी पड़ने पर खुद को पीछे रखने से भी संकोच न करे। अगर वह ऐसा कर पाती है, तभी 2019 के लोकसभा चुनाव में वह कुछ हासिल करने के बारे में सोच सकती है।