फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Script is big challenge for Hindi

हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती है लिपि

Sun, 27 Sep 2015 07:54 PM IST
गोविंद सिंह
गोविंद सिंह Updated Sun, 27 Sep 2015 07:54 PM IST
विज्ञापन
Script is big challenge for Hindi

विश्व हिंदी सम्मलेन से पहले कुछ हिंदी प्रेमी मित्रों ने यह आशंका जताई थी कि इस बार के सम्मेलन का एक हिडन एजेंडा भी है, कि सम्मेलन में ऐसा प्रस्ताव पारित हो सकता है कि हिंदी के विस्तार को देखते हुए देवनागरी की जगह रोमन को हिंदी की लिपि के रूप में स्वीकार कर लिया जाए। आशंका के विपरीत सम्मेलन में ऐसा कुछ नहीं हुआ। आशंका जताने वालों का तर्क यह था कि चूंकि इस बार माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या सीडेक जैसी कंपनियों को बुलाया जा रहा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों की मांग को देखते हुए ऐसा फैसला हो सकता है। कंपनियां भी आईं और उन्होंने हिंदी में हो रहा अपना काम भी प्रदर्शित किया, लेकिन रोमन लिपि का आग्रह किसी सत्र में नहीं दिखाई पड़ा।

विज्ञापन

  
भले ही इस सम्मेलन में ऐसी कोई बात नहीं हुई, लेकिन यह सच है कि हिंदी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती लिपि की ही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि हिंदी का परिदृश्य लगातार बदल रहा है। उसमें विस्तार हो रहा है। लेकिन उसकी चुनौतियां भी कम नहीं हो रहीं। कुछ चुनौतियां कृत्रिम हैं, तो कुछ जायज भी हैं। लिपि की चुनौती को मैं जायज मानता हूं। इसलिए कि हिंदी भाषी समाज में यह जंगल की आग की तरह फैल रही है। गिनती के मामले में अंग्रेजी के अंकों को स्वीकार कर हम पहले ही समर्पण कर चुके थे। नतीजा यह हुआ कि आज की पीढ़ी में शायद ही हिंदी की गिनती को कोई समझता हो। हिंदी चैनलों में काम करने को आने वाले युवा पत्रकारों को सबसे ज्यादा मुश्किल इसी में होती है। नई टेक्नोलॉजी के आने के बाद वाकई देवनागरी में व्यवहार मुश्किल होता गया। चूंकि कंप्यूटर का आविष्कार पश्चिम में ही हुआ, और जो भी कोई नई प्रगति होती है, वह भी वहीं से होती है, इसलिए सब कुछ अंग्रेजी में ही आरंभ होता है। जो देश प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत हैं, वे जरूर अपनी भाषाओं में शुरुआत करते होंगे। लेकिन हमारे यहां चूंकि अंग्रेजी का बोलबाला है, इसलिए कोई भी नई चीज हमारे यहां अंग्रेजी में ही पहुंचती है।
विज्ञापन


मीडिया की जरूरतों के कारण कोई चीज हिंदी या भारतीय भाषाओं में आती भी है, तो बहुत देर से। मसलन इंटरनेट आया तो हमारे सामने फॉण्ट की समस्या पैदा हुई। वर्ष 2000 में जाकर माइक्रोसॉफ्ट ने कंप्यूटर के भीतर ही मंगल नामक यूनिकोड फॉण्ट देना शुरू किया। लेकिन यह बड़ा ही कृत्रिम लगता है। देवनागरी का सौंदर्य उसमें दूर-दूर तक नहीं झलकता। खैर बाद में कुछ और फॉण्ट यूनिकोड पर आए और हिंदी की दशा सुधरी। लेकिन की-बोर्ड की समस्या बरकरार रही। इसी तरह अंग्रेजी में स्पेलिंग चेक करने वाला सॉफ्टवेयर होता है, व्याकरण जांचने वाला सॉफ्टवेयर होता है, हिंदी में बीस साल बाद अब जाकर इस तरह के प्रयास सामने आ रहे हैं, फिर भी वे बहुत कम इस्तेमाल हो रहे हैं। यही बात मोबाइल पर भी लागू होती है। किसी भी नई एप्लिकेशन के हिंदी में आते-आते छह महीने लग जाते हैं। इसलिए नए बच्चे धड़ल्ले से रोमन में हिंदी लिख रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में बड़े जोरदार तरीके से सरकार पर हमला किया। वह हिंदी में बोल रहे थे, लेकिन उनके हाथ में जो पर्ची थी, वह रोमन में थी। इस पर बड़ा हंगामा हुआ। वास्तव में हिंदी तो वह जानते हैं, पर देवनागरी लिपि में अभ्यस्त न होने से उन्हें ऐसा करना पड़ा होगा। इसमें हाय-तौबा करने वाली कोई बात नहीं थी, क्योंकि आज बड़ी संख्या में देश के युवा ऐसा ही कर रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले तमाम दक्षिण भारतीय कलाकार रोमन में ही अपनी पटकथा बांचते हैं। विज्ञापन जगत में काम करने वाले ज्यादातर लोग यही करते हैं। पिछले दिनों अंग्रेजी के बहुचर्चित लेखक चेतन भगत ने भी घिसी-पिटी दलीलों के साथ रोमन की वकालत करने वाला लेख लिख मारा। इससे यह पता चलता है कि एक बार फिर रोमन-परस्त ताकतें सिर उठा रही हैं।


आजादी से पहले भी ये लोग रोमन की वकालत कर रहे थे। लेकिन तब राष्ट्रवाद का ज्वार इतना तेज था कि ये अलग-थलग पड़ गए। देवनागरी लिपि इस देश की भाषाओं की अभिव्यक्ति की सबसे उपयुक्त लिपि है। वह केवल सौ साल में नहीं बनी। वह ब्राह्मी-खरोष्ठी और शारदा का स्वाभाविक विकसित रूप है और दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। रोमन लिपि अंग्रेजी भाषा को ही ठीक से व्यक्त नहीं कर पाती। वह एक अत्यंत अराजक लिपि है। अंग्रेजी के महान लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ खुद इस लिपि को किसी लायक नहीं समझते थे। उन्होंने अपनी वसीयत में एक अच्छी-खासी रकम इस लिपि की जगह किसी नई लिपि के विकास के लिए रखी थी। रोमन लिपि न उच्चारण की दृष्टि से मानक है और न ही एकरूपता के लिहाज से, जबकि देवनागरी लिपि जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी भी जा सकती है। ऐसी लिपि की अवहेलना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण होगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed