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बड़े मास्टर जी का स्कूल

Sun, 27 Jul 2014 04:41 PM IST
सुधाकर आशावादी
सुधाकर आशावादी Updated Sun, 27 Jul 2014 04:41 PM IST
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school of head master

जब हम सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, तो मास्टर जी हाथ में छड़ी लेकर हिंदी के दोहे याद कराते थे। तनिक-सा भी कक्षा में शोर मचाया नहीं कि हाथों को छड़ी से लाल कर दिया करते थे। फिर भी मास्टर जी का मन नहीं भरता, तो वह हमें मुर्गा बना दिया करते थे। अब वैसे मास्टर कहां रहे! स्कूल में सजा का भी कोई प्रावधान नहीं है।

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स्कूल में जो बड़े मास्टर जी हैं, वह अब नहीं पढ़ाते। उनकी कुर्सी पर छोटे मास्टर जी बैठे हैं, जिन्हें बच्चों के उत्पात नजर नहीं आते। बच्चे कुछ भी गलती करें, तो मास्टर जी आंखें चुरा लेते हैं। यदि बड़ी गलती हो जाए, तब भी वह हाथ में छड़ी नहीं उठाते। बड़े मास्टर से कहो, तो वह कहते हैं, बच्चों से छोटी-मोटी गलतियां हो जाती हैं। क्या बच्चों को फांसी चढ़ा दोगे! इस दरियादिली से बच्चों के हौसले और बढ़ जाते हैं। वे गलतियां दोहराने में संकोच नहीं करते।
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कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन मास्टर जी के स्कूल के बच्चे शरारत न करते हों। कभी कोई किसी लड़की से बदतमीजी कर बैठता है, कभी किसी को पीट देता है, तो कभी गांवों के लोगों के बीच झगड़ा करवा देता है। वैसे भी बिगड़ैल बच्चे भला किसका कहना मानते हैं! उनके मन में मास्टर जी का कोई खौफ नहीं है। उन्हें बड़े मास्टर जी से अभयदान जो मिला है।
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दरअसल बड़े मास्टर की भी इस स्कूल के प्रति अब कोई दिलचस्पी नहीं। वह इससे बड़ी कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने कुछ बातों से आंखें मूंद रखी हैं। इस बीच उन्होंने अपने पूरे कुनबे को मास्टर बना ही दिया है। पर इससे शिक्षा का स्तर नहीं बढ़ रहा। उल्टे स्कूल के बच्चों की शैतानियां बढ़ती जा रही हैं। आसपास के लोग परेशान हैं। पूरे इलाके में मास्टर जी का गांव बदनाम हो रहा है। एक दिन पास-पड़ोस के लोगों ने बड़े मास्टर से इस बारे में शिकायत की, तो उन्होंने कह दिया, हमारे स्कूल को नाहक ही बदनाम किया जा रहा है। दूसरे स्कूलों के बच्चे तो इससे भी अधिक शैतानी किया करते हैं।

अब इसके बाद कहने को बचता ही क्या है!

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