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सेना: दिव्यांग सैनिकों के हक में सुप्रीम कोर्ट, श्रेणी जनित भेदभाव से मनोबल और देश की सुरक्षा पर बुरा असर

Fri, 24 May 2024 06:04 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Fri, 24 May 2024 06:04 AM IST
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सार
नौकरशाही की अड़ंगेबाजी के कारण अपना कर्तव्य निभाते हुए विकलांग हुए जवानों को काफी कष्ट भोगने पड़ते हैं। दुर्भाग्य से वे पेंशन और उचित इलाज सहित कई सुविधाओं के लिए संघर्ष करने के लिए मजबूर हैं और अंततः उन्हें सशस्त्र बल न्यायाधिकरण की शरण लेनी पड़ती है।
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SC in favor of disabled soldiers, category based discrimination negative impact on morale, security of country
सुरक्षाबल - फोटो : एजेंसी

विस्तार

हमारे सैनिक हमारे देश भारत के लिए गर्व हैं, जो न सिर्फ बाहरी सुरक्षा, बल्कि आंतरिक उथल-पुथल के समय में भी देश के लिए जान देने को तैयार रहते हैं। हम सब इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि आजादी के बाद से ही हमारे सैनिक लगातार युद्ध जैसी स्थितियों को झेल रहे हैं। दुश्मन के खिलाफ सैन्य अभियानों में या खतरनाक मौसमी स्थितियों-बाढ़, भूस्खलन आदि में आम नागरिकों की मदद करते हुए हमारे जवान कभी-कभी जीवन भर के लिए विकलांगता के भी शिकार हो जाते हैं। लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि देशसेवा की पुकार पर अपना जीवन दांव पर लगाने वाले हमारे जवानों के परिजनों को अपना बकाया पाने के लिए कभी-कभी दर-दर भटकना पड़ता है, खासकर ऐसे मामलों में, जिनमें सैनिकों को बलिदान के बदले उनकी वीरता के लिए भूखंड, पेट्रोल पंप आदि जैसी चीजें पुरस्कार स्वरूप दी जाती हैं।



लेकिन इससे भी बदतर स्थिति उन जवानों की होती है, जो अपना कर्तव्य निभाते हुए विकलांग हो गए हैं तथा जिन्हें न केवल नौकरशाही की अड़ंगेबाजी के कारण विकलांगता पेंशन एवं अन्य लाभों से वंचित कर दिया गया है। बल्कि दिल्ली स्थित उनके संबंधित मुख्यालय में बैठे उनके अपने ही तथाकथित सैन्य बंधुओं तथा कानूनी निकायों की वजह से भी उनकी स्थिति बदहाल हो जाती है।


वर्ष 2020 में राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के आधिकारिक जवाब में बताया गया था कि वर्ष 2020 में ऐसे कानूनी मामलों पर 26 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए थे। यह उस प्रवृत्ति का हिस्सा है, जो पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही है। रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2013-2014 में ही, भारतीय वायुसेना के पास सबसे अधिक मामले (2,683) थे, जिसकी कानूनी सुनवाई पर सात करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए थे, जबकि नौसेना ने उत्तर भारत में अपने ही कर्मियों के खिलाफ मुकदमा लड़ने के लिए 69 लाख रुपये खर्च किए थे और थल सेना ने 11.50 लाख रुपये खर्च किए थे। यह पैसा उन लोगों को लाभ से रोकने के लिए वकीलों को दिया गया, जिन्होंने विकलांगता लाभ या पेंशन के लिए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) का द्वार खटखटाया था।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उच्चतम न्यायालय ने हमारे सैन्य कर्मियों को उनका उचित हक देने से वंचित रखने की खातिर अत्यधिक मुकदमेबाजी का सहारा लेने के लिए सैन्य सेवा मुख्यालय को फटकार लगाई है। इसके अलावा, रक्षा मंत्री द्वारा संसद में दिए गए एक लिखित बयान के अनुसार, कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट में लगभग 60 सिविल अपीलें वापस ले ली गईं, जिनमें से 17 विकलांगता पेंशन के लिए थीं। ये तथ्य दर्शाते हैं कि कानूनी विभागों (जैसे सेना के मामले में जज एडवोकेट जनरल शाखा) ने रक्षा मंत्रालय का पैसा बचाने का निर्णय लिया है। वे किसी सैनिक को उन लाभों से वंचित करना चाहते हैं, जो उन्हें सैन्य जीवन के बाद विकलांगता से उबरने में मदद कर सकते हैं, जिसका शिकार वे अक्सर कठिन परिस्थितियों में सैन्य अभियान या सेवा शर्तों से गुजरते हुए हो जाते हैं।

रक्षा मंत्रालय इन न्यायिक निकायों के माध्यम से उच्च अदालतों में मुकदमा लड़ने के लिए, कानूनी फीस के भुगतान के लिए, विकलांग लोगों को सेवा के दौरान विकलांग होने के कारण उनके हक से वंचित करने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च करता है। और इससे भी बुरी बात यह है कि घायल सैनिक इस बारे में बहुत कम जानते हैं कि चिकित्सा अधिकारी अपनी रिपोर्ट में उनके बारे में क्या लिखते हैं, क्योंकि वे अपनी चोटों से उबरने के लिए किसी क्षेत्रीय अस्पताल में अर्ध-चेतन अवस्था में पड़े होते हैं। ऐसी रिपोर्टें हैं कि बाद के वर्षों में उन्हें विकलांगता का लाभ पाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें अपनी अक्षमताओं को साबित करने के लिए एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में दर-दर भटकना पड़ता है! दुख की बात है कि विचित्र कानूनी पेच का शिकार हुए लोगों के अलावा केवल कुछ ही सैनिक इस तरह के अन्याय के बारे में जानते हैं। यह तो और भी दुखद है कि सैन्य मुख्यालय और सेना के उच्च अधिकारियों ने इस व्यवस्था को बदलने में जरा भी रुचि नहीं दिखाई है।

क्या इस तरह का व्यवहार देश के उन वीर सपूतों के लिए उचित है, जो देश के हित में अपना जीवन और अंग दांव पर लगा देते हैं? और इसी तरह की एक विचित्र पहल के तहत केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने  24 जून, 2019 को एक अधिसूचना जारी की थी कि यदि किसी सेवारत व्यक्ति को सैन्य सेवा के दौरान सेवा से हटाया नहीं गया है, तो उन्हें मिलने वाली विकलांगता पेंशन को आयकर से छूट नहीं दी जाएगी। इसके बारे में वर्ष 2020 में लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेराय ने लिखा, 'आयकर छूट की यह वापसी संभवतः सेना के सबसे कमजोर वर्ग, विकलांग कर्मियों के खिलाफ एक और नासमझी भरी कवायद है।' 

जबकि विशेष रूप से कुछ बहुत वरिष्ठ अधिकारियों के ऐसे मामले हैं, जो सर्वोच्च रैंक तक पहुंच गए हैं, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद का लाभ प्राप्त करने के लिए, अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले खुद को आंशिक रूप से विकलांग घोषित करवा लेते हैं। यह वास्तव में सैनिक और राज्य के बीच होने वाले 'अनुबंध' के खिलाफ है, जिसने वर्दी पहनने वाले सैनिकों को आश्वासन दिया था कि यदि ड्यूटी के दौरान उनकी मृत्यु हो जाती है या वे घायल हो जाते हैं, तो उनकी देखभाल की जाएगी।

गौरतलब है कि हमारे देश में तीनों सेनाओं एवं अर्ध-सैनिक बलों के करीब पंद्रह से बीस लाख जवान अभी कार्यरत हैं और इनके लगभग तीन गुना सेवानिवृत लोग हैं। हमारे सैनिक हमेशा देश के लिए जान देने को तत्पर रहते हैं, लेकिन वे सेवानिवृत्ति के बाद गरिमामय जीवन और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की अपेक्षा सरकार से करते हैं। हालांकि सरकार ने पूर्व सैनिकों के इलाज के लिए भूतपूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ईसीएचएस) चलाई है, लेकिन उसमें विभिन्न श्रेणियों के आधार पर सैनिकों से भेदभाव होता है। उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारी देश का पैसा बचाने के लिए िवकलांगता का लाभ लेने से उन्हें करते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझते कि जवानों का अगर मनोबल टूट जाएगा, तो इसका देश की सुरक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है।

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