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होली है, पांच साल नहीं छोड़ूंगा
सुधीर विद्यार्थी
Updated Thu, 05 Mar 2015 11:32 PM IST
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साधो, ससुरा जब देवर लगने लगे, तो समझो होली है। सावन के अंधे को जैसे सब हरा-हरा दिखाई पड़ता है, वैसे ही हुरियारों को हुड़दंग के सिवा कुछ सूझता नहीं। चौराहों-नुक्कड़ों पर कल होलिका मैया सजी थीं। देर रात चढ़े हुरियारे होली पर लकड़ियां बढ़ा रहे थे। पड़ोस के घर में घुसकर किसी के गोरे गालों को रंगने का सुख होली में ही नसीब होता है। आज के दिन अपनी पत्नी को भी पहचानना मुश्किल। इसी तरह रंगे-पुते पतियों की शिनाख्त करना कठिन कवायद है। न जाने कौन घर के भीतर रंगा-पुता घुसा चला रहा है।
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थोड़ी देर पहले प्रभु सीटी बजाते आए थे। पिचकारी मारते हुए बोले, आज तो खूब भिगोऊंगा। मैंने रेल का किराया नहीं बढ़ाया, सो मेरा हक बनता है। इसके बाद वित्त मंत्री जेटली ने बजट में रंगे अपने हाथ आगे बढ़ा दिए। कहने लगे, डरो मत। दस साल की सजा तो सिर्फ काला धन जमा करने वालों को होगी। पीछे-पीछे सेंटा क्लाज के अंदाज में प्रधानमंत्री मोदी भी चौखट के भीतर। चुनावी लहजे में उन्होंने कहा, तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें भाषण दूंगा। फिर वह बोले, आज सिर्फ 'मेक इन इंडिया’ गुझिया ही खाऊंगा, इटली की बनी नहीं।
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इतने सारे लोगों को घर में देखकर मैं अचकचा गया। राहुल बाबा नदारद हैं। सीबीआई तलाश कर रही है कि वह छुट्टी के बहाने किसके संग होली खेल रहे हैं। बाहर दरवाजे पर मुलायम अपनी समधिन राबड़ी के चेहरे पर गुलाल पोत रहे हैं, पर लालू एक तरफ अचकचाए खड़े हैं। ममता पर कोई रंग नहीं डाल रहा। माझी के हाथ में मिठाइयां हैं, पर नीतीश डर रहे हैं कि इनमें कहीं रंग में भंग भरी वादाखिलाफी न हो और वह होली में फिर कुर्सी न गंवा बैठें।
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केजरीवाल आम आदमी को पकड़ कर रंग में डुबो रहे हैं। कहते हैं, पांच साल तक नहीं छोडूंगा। महबूबा मुफ्ती खुलकर भाजपा के साथ रंग खेल रही हैं, लेकिन पहाड़ पर हरीश रावत डरे-डरे होली खेल रहे हैं। जो खुलकर नहीं खेलता, वह जल्दी ही मनमोहन सिंह हो जाता है। जो निडर होकर खेले, वही (अमित) शाह।