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जिसका है, उसे ही दें
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 27 Jun 2013 09:16 PM IST
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शहर में बढ़ते अपराधों का श्रेय पुलिस वालों को नहीं, अपराधियों को मिलना चाहिए। यह अच्छी कही कि नाचे-कूदे बांदरी और खीर खाए फकीर! पुलिस के रहते अगर अपराधी हिम्मत से काम ले रहे हैं, तो उनकी पीठ थपथपाई जानी चाहिए। यह बहुत ही गलत है कि अपराध कम हों, तो पुलिस जिम्मेदार और अपराध बढ़ रहे हैं, तो अपराधियों को ड्यू-क्रेडिट नहीं दी जा रही।
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इसीलिए तो लोग अपराध छोड़कर पुलिस की नौकरी करना बेहतर समझते हैं। नए-नए पुलिस अफसर आ जाते हैं और बोल पड़ते हैं कि पुलिस की लापरवाही की वजह से अपराध बढ़ रहे हैं। आप बताइए, पुलिस यदि परवाह करने लगे, तो क्या अपराध बंद हो जाएंगे? बीमारी बढ़ रही है, तो क्या आप डॉक्टर को दोष देते हैं? दुनिया का कोई भी डॉक्टर यह नहीं कर सकता कि कोई बीमार ही न पड़े। चलिए, मान भी लेते हैं कि वह ऐसा कर सकता है, तो उसने बड़ी-बड़ी डिग्रियां क्या मक्खियां मारने के लिए हासिल की हैं?
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बस, वही बात है कि चोट लगने से पहले दवा नहीं लगाई जा सकती, वैसे ही अपराध करने के पहले किसी को नहीं पकड़ा जा सकता। पुलिस अगर शक के आधार पर पकड़ने निकले, तो मालूम पड़ा कि पूरा शहर ही अपराध करने पर आमादा है। जैसा कि हमारे शहर में रिवाज है, जरा-सी बात पर चाकू मार दिया, ठोक दिया, उड़ा दिया। जब अपराध करने वाले को ही पता नहीं होता है कि वह अगले पांच-दस मिनट में अपराध करने जा रहा है, तो बेचारी पुलिस कैसे पता लगा लेगी। होने के बाद भी वह कैसे पता लगा लेती है, आश्चर्य तो इस पर होना चाहिए।
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यह खालिस अपराधियों की बड़ी मेहनत, दूरदृष्टि और कड़ा अनुशासन है कि शहर में अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अपराधी हैं कि दिन-रात खट रहे हैं, सांस लेने की फुरसत नहीं है, एक लूट करके आए हैं और रात तक पांच का टॉरगेट पूरा करना है। यह थोड़े ही है कि लूट लिया और अगली लूट के लिए निकल पड़े। यह कोई सरकारी वसूली थोड़ी है। लूट का माल ठिकाने भी तो लगाना पड़ता है।
तगड़ा होमवर्क, घर से बाहर करना पड़ता है। और आप जबरन पुलिस को बीच में लाए जा रहे हैं। पुलिस वालों को चाहिए कि अपने नए-नए अफसरों की बात पर कान न दें और मुस्तैदी से लगे रहें। अपराधी भी इंसान ही हैं, कभी तो थकेंगे ही। देखना, उस दिन शहर में अपराध का ग्राफ जरूर गिर जाएगा।