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आप कब मरेंगे

Wed, 05 Jun 2013 01:44 AM IST
अरविंद तिवारी
अरविंद तिवारी Updated Wed, 05 Jun 2013 01:44 AM IST
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satire

मैं एक अदना-सा अधिकारी हूं, मगर पूरा दफ्तर मेरी छींक से उसी तरह परेशान है, जैसे बीसीसीआई के अध्यक्ष के दामाद से क्रिकेट जगत। पूरे दफ्तर को उम्मीद है कि मेरी मौत सीट पर ही होगी। मेरी मृत्यु को लेकर जितनी उम्मीद दफ्तर को है, उतनी आईपीएल में फिक्सिंग करने वाले को भी नहीं रही होगी।

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जिस सीट पर मैं बैठा हूं, उसके बारे में कहा जाता है कि वह ‘शापित’ सीट है। इस सीट पर बैठने वाला सीट पर ही मरता है। मैं जिस व्यक्ति के स्थान पर स्थानांतरित होकर आया, उन्होंने कैंसर के सौजन्य से यह सीट खाली की थी। उनसे पहले जो अधिकारी थे, वह सीट छोड़ना ही नहीं चाहते थे। अचानक बढ़ी नक्सली गतिविधियों की तरह उनकी दाढ़ में हलचल हुई। वह दाढ़ की वजह से मरे।
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मैं इस सीट पर बैठा, तो कर्मचारियों को बहुत निराशा हुई, क्योंकि मैं हट्टा-कट्टा था। ऐसा आदमी तब तक मौत के चंगुल में नहीं आता, जब तक उसे कैंसर, हार्ट या शुगर जैसी बीमारी न हो। कुछ दिनों बाद जब मैंने रहस्य खोला कि मुझे पायरिया है और उसकी हाई ब्लडप्रेशर के साथ मैच फिक्सिंग है, तो कर्मचारी झूम उठे! उन्हें अपने अफसर को कुर्सी पर मरता देखने की आदत जो हो गई थी। मेरे हाई ब्लडप्रेशर की खबर से कर्मचारियों का ब्लडप्रेशर नॉर्मल हो गया।
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एक दिन मेरे दांत में दर्द शुरू हुआ, तो तीन बाबू मुझे अपने वाहन से अस्पताल ऐसे ले जाने को उतावले हो गए, जैसे श्मशान घाट ले जा रहे हों! लेकिन मैंने दांतों तले लौंग ऐसे दबाई, जैसे कोई भ्रष्ट सरकार अपने घोटाले दबा देती है। लौंग दबाकर मैं अपने काम में जुट गया और बड़े अस्पताल जाने से इनकार कर दिया। स्टाफ की चिंता बढ़ गई। लौंग से फौरी तौर पर दांत का दर्द जाता रहा। लोग शापित कुर्सी की विफलता पर हैरान थे। वैसे उन्हें पूरी उम्मीद है कि इतिहास अपने आपको दोहराएगा!


स्टाफ की आंखों में जब मैं झांकता हूं, तो वहां एक ही प्रश्न कौंधता है-कब मरेंगे आप। चार बार ब्लडप्रेशर बढ़ चुका है, तीन बार दाढ़ में जानलेवा दर्द हो चुका है, बीस बार पेट्रोल के और चार बार दूध के दाम बढ़ चुके हैं, नक्सलियों का बड़ा हमला हो चुका है और बीसीसीआई के सर्वशक्तिमान मुखिया भी थोड़े दिनों के लिए नेपथ्य में चले गए हैं, मगर मैं जिंदा हूं। आखिर क्यों जिंदा हूं मैं?

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