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यह हमारी कूटनीतिक हार

Fri, 03 May 2013 01:01 AM IST
कुलदीप नैय्यर (वरिष्ठ पत्रकार)
कुलदीप नैय्यर (वरिष्ठ पत्रकार) Updated Fri, 03 May 2013 01:01 AM IST
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sarabjit death india diplomatic defeat

सरबजीत की मौत पर जितनी सक्रियता भारत सरकार अब दिखा रही है, अगर वह पहले दिखाती, तो शायद वह आज हमारे बीच होते। 23 वर्ष से चल रहे इस मामले में पाकिस्तान सरकार से ज्यादा कुसूरवार हमारी हुकूमत है।

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यह जानकारी होते हुए भी कि सरबजीत गलत पहचान का शिकार बने हैं, हमारी सरकार शांत बैठी रही। हाल ही में, जब उनकी जान के खतरे की बात कही गई, हमारी सरकार न तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करवा सकी, और न ही हमले के बाद अस्पताल में उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया करा सकी।
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अलबत्ता सरबजीत पर जानलेवा हमले के करीब तीन बाद उसकी नींद टूटी और उसने चिकित्सकीय सुविधा को लेकर चिंता जताई। लिहाजा अब भले ही गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सरबजीत के परिवार से मिल कर उन्हें दिलासा दे रहे हों या प्रधानमंत्री सहित सभी नेता इस मामले की 'निंदा' कर रहे हों, सारी तस्वीर हमारी सरकार द्वारा लकीर पीटने की ही पुष्टि कर रही है।
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इस पूरे मामले को व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत है। सरबजीत की मौत के बाद अब समय उन कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है, जो पाकिस्तानी जेलों में बंद हैं। दुखद है कि इसका ठीक-ठीक आंकड़ा हमारी सरकार के पास नहीं है। हमें यह नहीं पता कि कितने भारतीय पाकिस्तानी जेलों की अंधेरी कोठरी में पड़े हैं।

कुछ वर्ष पहले भारत और पाकिस्तान की जेलों में बंद एक-दूसरे के कैदियों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक संयुक्त न्यायिक आयोग का गठन किया गया था, जिसमें दोनों देशों के दो-दो सेवानिवृत जज शामिल थे। इनका काम सरबजीत जैसे मामलों को बातचीत के जरिये सुलझाना था। लेकिन यह आयोग निष्क्रिय-सा हो गया है।

अब जबकि सरबजीत की मौत के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तल्खी तय है, बावजूद इसके इस आयोग को फिर से सक्रिय करने की जरूरत है, ताकि किसी दूसरे 'सरबजीत' के साथ ऐसा न हो।

ऐसे कदम इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि पाकिस्तानी हुकूमत का यह दावा कि सरबजीत जासूस थे और 1990 में लाहौर में हुए बम धमाकों में उनकी संलिप्तता थी, गलत साबित हुआ है। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि सरबजीत गलती से सीमा पार कर गए थे। इसलिए भविष्य में कोई दूसरा सरबजीत गलत पहचान का शिकार न बने, इसकी जिम्मेदारी तय करनी जरूरी है।

यहां दोनों देशों की जेलों में बंद कैदियों की संख्या तय करने पर भी विचार किया जाना चाहिए। पूर्व में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें यह खुलासा हुआ है कि मामूली अपराध के लिए भी दोनों देशों के कैदी एक-दूसरे की जेलों में सजायाफ्ता रहे।

ऐसे मामलों पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए और संभव हो, तो ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें मामूली सजा पाए कैदी अपने-अपने देशों की जेल में ही रहें। हालांकि इसकी राह अभी रपटीली इसलिए लग रही है, क्योंकि सरबजीत की 'हत्या' से भारतीय जनमानस आक्रोशित है, जिसकी वजहों से इनकार नहीं किया जा सकता।

सरबजीत के वकील एवं भारत-पाक शांति प्रयास के अध्यक्ष अवैस शेख बार-बार उन गलतियों को आईने की तरह पाकिस्तान सरकार को दिखाते रहे, जो वह कर रही थी, पर इसके बावजूद सरबजीत की रिहाई में वह टालमटोल करती रही।


बहरहाल, भारत सरकार कह रही है कि वह पड़ोसी देश पर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच का दबाव बनाएगी। हालांकि वहां की पंजाब सरकार ने जांच के आदेश दे भी दिए हैं, लेकिन जैसा कि सरबजीत की बहन दलबीर कौर ने कहा कि अगर सरबजीत की 'हत्या' साजिश का नतीजा है, तो जांच होनी ही चाहिए, और अगर पाकिस्तानी हुक्मरान की पहल पर ऐसा हुआ है, तो फिर किसी जांच की जरूरत ही नहीं।

पाकिस्तान सरकार की गलतियों को देखते हुए दलबीर कौर का दूसरा तर्क ज्यादा धवल दिखता है। लिहाजा किसी भी जांच का परिणाम संदिग्ध ही है।

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