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आपकी जेब काट रहा है रुपया

Thu, 20 Jun 2013 10:26 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
नारायण कृष्णमूर्ति Updated Thu, 20 Jun 2013 10:26 PM IST
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rupee and dollar

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार लुढ़कता जा रहा है और गुरुवार को वह अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर 59.9 रुपये प्रति डॉलर पर आ गया। इसकी मुख्य वजह है कि अमेरिकी डॉलर लगातार अन्य उभरते बाजारों और प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की तुलना में अपनी स्थिति लगातार मजबूत बनाता जा रहा है। रुपये का गिरता मूल्य निश्चित रूप से चिंता का विषय होना चाहिए। पिछले दो वर्षों में रुपये के मूल्य में 25 फीसदी का ह्रास हुआ है, इसका मतलब है कि एक रुपया में आप पहले जितनी वस्तुएं खरीदते थे, उसका तीन चौथाई ही अब खरीद सकते हैं।

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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए रुपये का गिरना एक बुरी खबर है, क्योंकि इसका दुष्प्रभाव पहले ही से बढ़े हुए चालू खाता घाटे (सीएडी) पर पड़ेगा। चालू खाता घाटे का मतलब है, वस्तु एवं सेवाओं के आयात पर होने वाले खर्च तथा प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए धन के साथ निर्यात से होने वाली आय के बीच का अंतर। यानी विदेशी विनिमय से हमारा देश उतना भी नहीं कमा पाता, जितना कच्चे तेल एवं उर्वरकों के आयात पर खर्च करना पड़ता है। असल में चालू खाता घाटे का बोझ सामान्य तौर पर विदेशी निवेशकों द्वारा देश में लाए गए धन या विदेशी मुद्रा भंडार के जरिये पूरा किया जाता है।
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भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.5 फीसदी चालू खाता घाटा संवहनीय है। इसके विपरीत वर्ष 2011-12 में चालू खाता घाटा जीडीपी का 4.2 फीसदी था, जो अक्तूबर-दिसंबर, 2012 की तिमाही में बढ़कर जीडीपी का 6.7 फीसदी हो गया। चालू खाता घाटे के संवहनीय स्तर और उसके वास्तविक आंकड़े के बीच बढ़ती खाई प्रतिकूल वैश्विक विकास के दौर में अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाता है, जिससे विदेशी निवेश में कमी आ सकती है। रुपये का गिरना न केवल चालू खाता घाटे की खाई को चौड़ी करता है, बल्कि पहले से ही सुस्त पड़े आर्थिक विकास के लिए भी नुकसानदेह है।
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि रुपया कमजोर हुआ है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के लिए जो सबसे जटिल समस्या है, वह है सोने का भारी आयात। सोने के प्रति भारतीयों का प्रेम जगजाहिर है। शेयर बाजार या अन्य वित्तीय उत्पादों से वसूली की उम्मीद न देखकर लोग सोने में निवेश करते हैं। आम लोगों द्वारा सोने में निवेश पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने इस वर्ष जनवरी में सोने पर आयात शुल्क को चार फीसदी से बढ़ाकर छह फीसदी कर दिया। इस वर्ष अप्रैल-मई के महीने में मासिक स्वर्ण आयात करीब 150 टन तक चला गया, जबकि पिछले वर्ष इन दो महीनों में औसतन स्वर्ण आयात 70 टन था। इसलिए जून की शुरुआत में सरकार ने एक बार फिर आयात शुल्क को बढ़ाकर करीब आठ फीसदी कर दिया और सोने के आयात को घटाने के लिए वह अन्य कदम भी उठाने की तैयारी में है।

अपने स्तर पर रिजर्व बैंक और सेबी ने भी सोने के आयात पर अंकुश लगाने के लिए कुछ ऐसे उपायों की शुरुआत की है, जो गिरते रुपये को संभालने में मददगार होंगे। सबसे पहले रिजर्व बैंक ने सरकारी बैंकों को उनके खाते में मौजूद डॉलर बेचने को कहा है, जो कुछ हद तक रुपये की गिरावट रोकेगा। इसके अलावा उसने बैंकों द्वारा सोना की खरीद को महंगा कर दिया है।

अपने स्तर पर सेबी ने भी वित्तीय सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को बड़े पैमाने पर सोने की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए कहा है। यानी सारी चीजें बता रही हैं कि उत्पादन जैसी आर्थिक गतिविधियों में सीधे उपयोग न किये जाने के बावजूद सोना देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह चोट पहुंचा रहा है। बेशक इस तरीके से रुपये की गिरावट को थामने के अपने तर्क हैं, पर सच्चाई यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है और इस क्रम में वह डॉलर को मजबूत बनाने के साथ अन्य सभी वैश्विक मुद्राओं को कमजोर कर रही है। दूसरी ओर रुपया विभिन्न कारणों से, जिनमें से अधिकांश बाहरी हैं, कमजोर हुआ है।

इस बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि रुपया कब मजबूत होगा या गिरावट में कब स्थिरता आएगी, क्योंकि कई कारक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। मसलन, रुपये के गिरने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, क्योंकि यदि कच्चे तेल का मूल्य गिरता भी है, तो कमजोर रुपया तेल आयात को खर्चीला बनाएगा। मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी से मौद्रिक नीति में परिवर्तन आएगा, क्योंकि रिजर्व बैंक इसके प्रति सावधान है। हाल के सप्ताहों में मुद्रास्फीति में गिरावट के बावजूद रिजर्व बैंक ने इस हफ्ते की शुरुआत में ब्याज दरों में बदलाव नहीं किया है और थोड़ा ठहरकर हालात का जायजा लेने के फैसला किया है।

रुपये के मूल्य में गिरावट आम लोगों की जेब पर भी देर-सबेर असर डालेगी, क्योंकि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के साथ मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना है। यह विदेश में छुट्टियां मनाने की योजना बनाने वालों पर तो असर डालेगी ही, सबसे ज्यादा विदेश में पढ़ने वाले छात्रों पर, खासकर वैसे छात्र जो अपने खर्च के लिए भारत पर निर्भर हैं, असर डालेगी। लेकिन निर्यातकों को रुपये के कमजोर होने से फायदा होगा। वैश्विक बाजार में म्यूचुअल फंड के जरिये निवेश करने वालों और डॉलर में राजस्व प्राप्त करने वाली आईटी कंपनियों के लिए भी यह फायदेमंद है।


कुल मिलाकर गिरते रुपये को तीव्र आर्थिक सुधार के जरिये ही बचाया जा सकता है, जिससे देश में दीर्घकालीन निवेश आएगा। मात्र घोषणाओं के जरिये बाजार को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। यह नीतियों और घोषणाओं में तालमेल बनाने का समय है।

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