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संघ, भाजपा और सरकार
नीरजा चौधरी
Updated Mon, 07 Sep 2015 08:39 PM IST
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पिछले सप्ताह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित की गई तीन दिवसीय समन्वय बैठक, जिसे लेकर नुक्ताचीनी भी हुई कि इसे सामंजस्य कहा जाए या समन्वय, के बारे में भाजपा नेता चाहे जो स्पष्टीकरण दें, सामान्य तथ्य यह था कि एक के बाद एक केंद्रीय मंत्री, जिनमें प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री जैसे शीर्ष पांच मंत्री शामिल थे, मध्यांचल भवन पहुंचे और संघ प्रमुख मोहन भागवत व संघ के पंद्रह अन्य अधिकारियों के समक्ष अपने मंत्रालय से संबंधित प्रेजेंटेशन दिया।
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ऐसा नहीं है कि इससे पहले केंद्रीय मंत्रियों समेत भाजपा नेताओं ने संघ के नेताओं से बातचीत नहीं की या नीतिगत मुद्दों पर उनसे विमर्श नहीं किया। लेकिन ऐसा पहले एक या दो नेताओं के स्तर पर होता था और वह भी बंद कमरे के भीतर। वरिष्ठ भाजपा नेता संघ की बैठकों में भाग लेते रहे हैं और वहां होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेते रहे हैं।
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यहां तक कि प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी भी संघ के नेताओं से जाकर मिलते थे, हालांकि उनके प्रधानमंत्री काल में ऐसा बहुत कम होता था। संघ के नेताओं को उनके साथ एक समस्या यह थी कि उन्होंने अपनी सरकार में उन लोगों को प्रधानता दी थी, जो संघ की पृष्ठभूमि के नहीं थे। जैसे उनके प्रधान सचिव बृजेश मिश्रा, जसवंत सिंह या यशवंत सिन्हा। असल में, भाजपा जब 1998 में पहली बार सत्ता में आई थी, तो जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाने के वाजपेयी के फैसले को शपथ ग्रहण के कुछ ही घंटे पहले निरस्त कर दिया गया था। यह खुला रहस्य है कि तब ऐसा संघ के दबाव में किया गया था। पहली राजग सरकार में लालकृष्ण आडवाणी को भी उप प्रधानमंत्री के रूप में संघ के दबाव पर ही पदोन्नत किया गया था, हालांकि बाद में जब पाकिस्तान यात्रा के दौरान आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की, तो संघ ने उन्हें समर्थन देना बंद कर दिया और संघ की तरफ से उन पर इतना दबाव पड़ा कि उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा।
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हालांकि वाजपेयी और आडवाणी को भाजपा का संस्थापक माना जाता है, पर तत्कालीन संघ प्रमुख के. सुदर्शन ने सार्वजनिक तौर पर युवा लोगों को आगे आने देने के लिए उनके इस्तीफे की मांग की। और यह भी तथ्य है कि संघ के तत्कालीन प्रमुख राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) के साथ वाजपेयी या फिर भाऊराव देवरस के साथ आडवाणी को, संघ विभिन्न विषयों पर अपनी राय देता था।
जाहिर है, कि संघ और भाजपा के बीच सहजीवी रिश्ता है। भाजपा और इसके पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ की कल्पना संघ के राजनीतिक मोर्चे के रूप में हुई थी। वास्तव में जनता पार्टी में टूट जनसंघ एवं आरएसएस की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर ही हुई थी और फिर 1980 में भाजपा अस्तित्व में आई। पचास के दशक से ही जनसंघ या भाजपा का संगठन सचिव आरएसएस से ही मिलता था। इसलिए संघ द्वारा भाजपा के संरक्षक बनने और उसे प्रभावित करने की कोशिश में नया कुछ नहीं है। यह खुला रहस्य है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सरकार संघ से संबद्ध भारतीय किसान संघ के दबाव में ही झुकी, न कि कांग्रेस के दबाव में। यह अलग बात है कि भाजपा के प्रबंधक जीएसटी पर कांग्रेस का समर्थन हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहेंगे।
मोदी संघ की भावना के प्रति सचेत रहे हैं-संघ प्रमुख के लिए जेड प्लस सुरक्षा, वह जहां भी जाते हैं, उनके साथ दूरदर्शन की टीम का होना, यह सब उसी का हिस्सा है। साफ है कि मोदी संघ को अपने पक्ष में रखने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने संघ या उसके सहयोगी संगठनों को हाशिये पर नहीं रखा है, अब तक किसी भी कीमत पर नहीं, जैसा कि उन्होंने गुजरात में किया था। संघ ने भी नियंत्रण रेखा पर उल्लंघन के बावजूद पाकिस्तान के साथ बातचीत को अपनी मौन स्वीकृति दे दी है। मंदिर निर्माण के लिए समय तय करने पर जोर न डालकर संघ अपने मूल एजेंडे के लिए दबाव नहीं बना रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने महत्वपूर्ण पदों पर संघ के पसंदीदा लोगों को नियुक्त किया है। जाहिर है, भाजपा एवं संघ के बीच परस्पर लाभ का रिश्ता बना हुआ है।
नई बात बस यही है कि अब सब कुछ खुलेआम हो रहा है। राजग दो के समय में संघ और भाजपा के रिश्ते के खुलेआम परवान चढ़ने के बारे में पिछले वर्ष एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने, जाहिर है निजी तौर पर, आमूल-चूल बदलाव के रूप में वर्णित किया था। तथ्य यह है कि पिछले वर्ष नरेंद्र मोदी की जीत के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, जैसा कि अभी वे बिहार में कर रहे हैं।
लेकिन यह संभवतः पहली बार था कि 'सरकार क्या कर रही है और क्या नहीं कर रही' के मुद्दे पर संघ प्रमुख की अध्यक्षता में तीन दिनों तक मूल्यांकन बैठक हुई, जिसमें संघ के आला नेताओं के साथ लगभग पूरा मंत्रिमंडल शामिल हुआ था।
स्वाभाविक है कि इससे लोगों को हैरानी हुई। अगर अमित शाह और उनकी टीम के अधिकारी मोहन भागवत के पास जाते और संघ और भाजपा के सहजीवी रिश्ते के मद्देनजर बताते कि उनकी पार्टी की सरकार ने अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है, तो यह अलग बात होती। लेकिन जब भारत सरकार के मंत्री ऐसा करते हैं, तो बात कुछ और हो जाती है। जब वे एक अन्य प्राधिकार के सामने खुलेआम झुकते दिखते हैं, तो लोगों की नजरों में सरकार की सत्ता को कमजोर करते हैं। इससे संविधान और संसद के प्रति उनकी प्राथमिक जवाबदेही के बारे में भी सवाल उठता है और बेचैनी की भावना बढ़ सकती है। व्यक्तिगत स्तर पर संघ नेतृत्व का मार्गदर्शन हासिल करने या फिर प्रधानमंत्री द्वारा संघ से मार्गदर्शन लेने की बात कहने में कुछ आपत्तिजनक नहीं है। मगर जब बात मंत्रिमंडल के संघ के समक्ष प्रस्तुत होने की आती है, तो अंतर साफ देखा जा सकता है।