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गुलाब का तेजाब में बदल जाना

Wed, 13 Feb 2013 12:11 AM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Wed, 13 Feb 2013 12:11 AM IST
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rose changed into acid

हमारे देश की लड़कियां बचपन से जिन हिंदी फिल्मों को देखकर बड़ी हुई हैं, उनमें से ज्यादातर फिल्में प्रेम में त्याग और बलिदान की बातें करती हैं। ऐसी फिल्में कम ही हैं, जिनमें प्रेमी इंकार करने पर प्रेमिका की हत्या कर डाले या उसका बलात्कार करे या फिर तेजाब डालकर उसका चेहरा विकृत कर डाले। पर न जाने क्यों, पूरे एशियाई समाज में–तू मेरी नहीं हुई, तो किसी और की नहीं हो सकती-वाली मानसिकता इधर कुछ ज्यादा तेजी से फैली है।

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अनगिनत किस्से हैं, जिसमें कोई खाप पंचायत नहीं थी, प्रेम के विरोध में समाज तलवारें खींचे नहीं खड़ा था, मां-बाप के इंकार-स्वीकार की तो नौबत ही नहीं आई थी। लेकिन एकतरफा प्यार में पगलाए प्रेमी यह स्वीकार नहीं कर पाए कि जिस लड़की पर वे दिलोजान से फिदा हैं, वह किसी और को भी चाह सकती है। हर सुंदर लड़की क्या सिर्फ प्यार के लिए बनी है और वह भी एकतरफा? क्या प्रेम में हिंसक युवा इस सोच से बाहर निकल पाएंगे?
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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं पर तेजाब से हमलों के मामले में चिंता जताते हुए इस संबंध में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को नाकाफी बताया। कोर्ट की यह टिप्पणी छह साल पुरानी एक जनहित याचिका पर आई है। वर्ष 2006 में दिल्ली के तुगलक रोड इलाके में एक लड़के ने शादी से इंकार करने पर एक लड़की पर तेजाब फेंक दिया था, जिससे उसका चेहरा और हाथ खराब हो गए थे।
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ऐसी घटनाएं केवल दिल्ली-हरियाणा में ही नहीं होतीं। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत तकरीबन पूरे एशिया का समाज महिलाओं के साथ ऐसा ही व्यवहार करता है। कुछ ही महीने पहले पाक-अधिकृत कश्मीर में एक मां-बाप ने अपनी नाबालिग बेटी पर सिर्फ इसलिए तेजाब डाल दिया, क्योंकि वह अपने पीछे मोटरसाइकिल से आ रहे लड़के को गौर से देख रही थी।

इसे पिछड़ी सोच के मां-बाप ने कलंकित करने वाली घटना के रूप में देखा और उस पर तेजाब डाल दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। इधर बिहार के सीवान में दसवीं में पढ़ने वाली एक लड़की पर एकतरफा प्यार में नाकाम लड़के ने तेजाब फेंक दिया, जिससे वह 90 फीसदी तक जल गई। ऐसी घटनाएं सैकड़ों में हैं, जहां तेजाबी हमले की शिकार लड़कियों और महिलाओं के सामान्य जीवन में लौटने की संभावनाएं तकरीबन खत्म ही हो गई हैं।

जरा सोचिए कि कितनी लड़कियां हैं, जो पुरुषों पर तेजाब फेंककर अपना कलेजा ठंडा करने की कोशिश करती हैं। अपवाद स्वरूप ही एकाध मिल जाए, पर अमूमन लड़कियां ऐसा नहीं करतीं, अलबत्ता प्रेम में वे भी नाकाम होती हैं। वे ऐसा इसलिए नहीं करतीं, क्योंकि वे मर्दों को अपनी मर्जी से जीने का हक देना जानती हैं, उन्होंने प्रेम में खुद को बलिदान करना ही सीखा है। वे मानती हैं कि जो उनका नहीं हो सका, वह किसी और का तो होगा।

पर हमारा पुरुष समाज अपनी विफलता का प्रतिकार चाहता है, क्योंकि वह महिलाओं को अपनी जागीर समझता है। इसलिए जब भी स्त्रियां अपने लिए जरा-सी आजादी मांगती हैं, उनका सिर कुचल दिया जाता है। ऐसा लगता है कि ये मर्द तेजाब भरी बोतल में ही गुलाब लगाए चलते हैं। यानी अगर प्रेम (चाहे उसमें रत्ती भर सच्चाई न हो) के प्रतीक गुलाब को लड़की ने मंजूर नहीं किया, तो उसी क्षण उस पर तेजाब उड़ेल दिया जाएगा। कितना खतरनाक है ऐसा प्रेम!

इससे जाहिर होता है कि संपन्नता और शिक्षा के बावजूद पुरुषों की मानसिकता में कोई सुधार नहीं हुआ है, बल्कि आत्मकेंद्रित मानसिकता ने उसे हिंसक दरिंदा बना दिया है। ऐसे ज्यादातर हादसों के पीछे वह खाया-पिया युवा वर्ग है, जिसके पास विलासिता की कमी नहीं है, और जो ऊंचे संपर्कों के कारण बच निकलता है।


थॉमस रायटर फाउंडेशन के मुताबिक, दुनिया में भारत ऐसी चौथी सबसे खतरनाक जगह है, जहां हर तबके, उम्र व जाति की महिलाओं के साथ लगभग एक जैसा हिंसक व्यवहार किया जाता है। हमारे देश में राधा-कृष्ण, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल के प्रेम की दुहाई दी जाती है। काश, हम पाश्चात्य जगत से सिर्फ प्रेम का ही पाठ सीखते, उसकी व्यक्तिवादी, भोगवादी हिंसक प्रवृत्तियों को नहीं अपनाते, तो शायद ऐसा भयावह मंजर देखने को नहीं मिलता!

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