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अकादमिक कला के जोखिम

Mon, 22 Jun 2015 09:06 PM IST
गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी Updated Mon, 22 Jun 2015 09:06 PM IST
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Risk of academic art

कई बार अयोग्यता भी कसौटी बनती है और ज्ञान भी अंधा युग रच देती है। अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की ही बात करें, तो उसने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सार्थक किया हो या नहीं, प्रोफेसरों को लेखक जरूर बना दिया है। आजादी के बाद से बीसवीं सदी की ढलान तक देश में समस्त भाषाओं में कुल मिलाकर लेखकों का प्रतिशत सत्ताईस से उन्तीस के बीच आंका गया था। अब यह सत्तासी से नब्बे प्रतिशत तक पहुंच गया है और वह भी सिर्फ नई सदी के डेढ़ दशकों में। रचनात्मक सोपान का यह दशद्वार रचा है यूजीसी ने। उसने पिछले दशक में प्रोफेसरों के लिए निर्धारित एपीआई यानी अकादमिक परफॉरमेंस इंडेक्स स्कोर अनिवार्य क्या कर दिया, तमाम प्रोफेसर लेखक बनने को बाध्य हो गए। यानी अध्यापक को अध्यापन के साथ विभिन्न जर्नल में लेख छपवाने होंगे। किताबें लिखनी होंगी और सेमिनारों के सर्टिफिकेट हासिल करने होंगे। इन सभी उपक्रमों के लिए नंबर निर्धारित हैं। जिस प्रोफेसर के पास जितने नंबर, उसकी तरक्की उतनी जल्दी और उतनी पक्की।

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अब ऐसे लेखन के लिए दुकानें भी खुल गई हैं। लेखक जब स्वयं पैसा देकर किताबें छपवाने पर आमादा हैं, तो क्या दिक्कत! बेचने के झंझट से भी मुक्ति। दो किताबें साक्षात्कार के लिए सुरक्षित रख विद्यार्थियों को प्रोफेसर स्वयं खरीदने को मजबूर करेंगे। पत्रिकाएं भी इसीलिए छपने लगी हैं। खुलेआम विज्ञापन दिए जाने लगे हैं कि निर्धारित शुल्क पर लेख छपवाएं। सेमिनार इसीलिए अधिक होने लगे हैं कि पैसे दो और सर्टिफिकेट लो। शोध विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग अध्यापकों के पदचिह्नों पर चलता हुआ इस महती उद्यम में शरीक हो चुका है। उनके लिए सेमिनार में सशरीर भाग लेना भी जरूरी नहीं। सेमिनार आयोजकों ने उनके लिए यह सुविधा कर दी है कि जिस भी शहर में वे रह रहे हैं, वहां से पैसा और प्रपत्र भेजने पर बदले में वे सर्टिफिकेट पोस्ट कर देंगे। प्रपत्र लिखने के लिए गूगल से कट ऐंड पेस्ट सर्वसुलभ मार्ग है।
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ऐसे में मुसीबत बन आई है उन अध्यापकों की, जो कला के प्रोफेसर हैं। विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ति उनकी कला दक्षता के कारण हुई थी। जब इनका आर्ट परफॉरमेंस ही प्रोफेसर होने की उनकी कसौटी है, तो अकादमिक परफॉरमेंस की अलग से क्या जरूरत? पर यूजीसी का कहना है कि अकादमिक स्तर पर एसिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए एपीआई स्कोर के साथ आना होगा। प्रोन्नति का भी यही पैमाना है। अब गायन, वादन, नृत्य, संगीत शास्त्र, रंगमंच, चित्रकला, मूर्तिकला, ऐप्लाइड, टेक्सटाइल, ग्राफिक यानी मंच और रूपंकर कला के प्राध्यापकों को अकादमिक कला के जोखिम समझ में आ गए हैं। उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि बनारस या जयपुर घराने से गायन या नृत्य सीखकर कलाकार बनने के सपने को पूरा कर भी वह सब शुरू करना पड़ेगा, जो कभी किया नहीं।
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अध्ययन और शोध की जगह एपीआई स्कोर जुटाने की होड़ ने ले ली है। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी के साक्षात्कार के समय जो इस स्कोर को अधिकाधिक पूरा कर रहा होगा, उसकी नौकरी पक्की। यह नहीं देखा जाएगा कि उस विषय में उसके पास ज्ञान और पढ़ाने की कुशलता कितनी है। जब शिक्षकों का वेतन अन्य नौकरियों के मुकाबले बहुत कम था, तब उन्होंने शिक्षा का एक पैमाना तय किया था। पर अब वह मुमकिन नहीं दिख रहा।

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