{"_id":"23d4bdc2b8940afe2a7c1022e01c3ff6","slug":"rising-problems-on-economic-front-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती मुश्किलें ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती मुश्किलें
एम के वेणु
Updated Fri, 22 Jan 2016 08:37 PM IST
विज्ञापन
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावोस में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण आय एवं मांग को पुनर्जीवित करना है। यह एक बड़ी बात है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री वर्ष 2016 में वैश्विक मंदी की भविष्यवाणी कर रहे हैं। यदि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी से होने वाले नुकसान को कम करना चाहता है, तो ग्रामीण मांग को बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है। लगता है, आगामी बजट में इस पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
विज्ञापन
आज भारतीय अर्थव्यवस्था दोहरी मार झेल रही है, क्योंकि उत्पादकों के लिए जहां मूल्य घटते जा रहे हैं, वहीं उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। रघुराम राजन ने हाल ही में कहा है कि वैश्विक रूप से वस्तुओं की कीमतों में अपस्फीति का असर भारत में उत्पादकों के लिए घटती कीमत के रूप में दिख रहा है। ज्यादातर खाद्यान्न वस्तुओं के उपभोक्ता मूल्यों में बढ़ोतरी दिखाई देती है, क्योंकि कृषि के लिए एक बुरा वर्ष होने की वजह से बड़े पैमाने पर आपूर्ति में कमी हुई है। इसलिए व्यवसायी और किसान, दोनों आय में कमी का सामना कर रहे हैं, जबकि आम आदमी खाद्य वस्तुओं में महंगाई की मार झेल रहा है।
विज्ञापन
इससे स्थिति बिगड़ती हुई दिख रही है, क्योंकि नवंबर महीने के औद्योगिक उत्पादन का ताजा आंकड़ा बताता है कि औद्योगिक उत्पादन में 3.2 फीसदी की गिरावट आई है। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से मांग में सतत सुस्ती को दर्शाता है, खासकर ग्रामीण मांग, जो चतुर्दिक कृषि संकट से प्रभावित हुई है। हैरानी नहीं कि उपभोक्ता वस्तुओं से संबंधित क्षेत्र में अप्रैल से नवंबर के दौरान 0.5 फीसदी की गिरावट दिखाई देती है। इस दौरान राजग सरकार देश भर के कृषि संकट के प्रति व्यापक तौर पर असंवेदनशील बनी रही। काफी देर से सरकार ने किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान बीमा योजना की घोषणा की। मौजूदा संकट से खेतिहर मजदूरों को उबारने के लिए सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को भी मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है। आप प्रधानमंत्री के संसद में दिए उस बयान को याद कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की विफलता का स्मारक बताया था। लेकिन जैसे ही कृषि संकट गहराया और ग्रामीण मांग में गिरावट आई, राजग सरकार को यूपीए की नीतियों पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ा।
विज्ञापन
लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि राजग के आर्थिक प्रबंधक सबसे पहले इस बात से ही इन्कार करते हैं कि अर्थव्यवस्था के सामने चुनौती है। हम टीवी न्यूज चैनलों पर नियमित रूप से भाजपा प्रवक्ताओं को कहते सुनते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था अन्य देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है। लेकिन असली तथ्य यह है कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अपस्फीति की प्रवृत्ति को मजबूत बनाने का हिस्सा रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले प्रतिष्ठित निवेशक जॉर्ज सोरोस ने कहा है कि दुनिया में 2008 जैसी मंदी छा सकती है। सोरोस ताजा मंदी की उत्पत्ति का श्रेय चीन के अपने आर्थिक मॉडल को पुनर्संयोजित करने की कोशिश को देते हैं। इसके अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था का पूरी तरह से पटरी पर लौटना निश्चित नहीं है, जापान मंदी में है और यूरोप की अर्थव्यवस्था लगातार घिसट रही है। इस निराशाजनक तस्वीर के साथ कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं मंदी और गंभीर गिरावट का सामना कर रही हैं, जैसा कि चीन में हो रहा है। इस परिदृश्य के विपरीत हमारे नीति-निर्धारक ऐसा जता रहे हैं, मानो दुनिया मानती है कि भारत ही 'अकेला चमकता सितारा' है। यह सच्चाई से काफी दूर है। यह सच है कि वैश्विक निवेशक मध्य 2015 तक ब्राजील, रूस, इंडोनेशिया आदि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारत को अलग दृष्टि से देखते थे। लेकिन यह फर्क अब धुंधला रहा है, क्योंकि ऐसी धारणा है कि सुधारों से संबंधित कई नीतियों को आगे बढ़ाने से संबंधित मूल सिद्धांतों का भारत ने लाभ नहीं उठाया।
निवेशक समुदाय मानता है कि राजग सरकार ने सत्ता में आने के बाद पंद्रह महीनों के समय को व्यर्थ जाया कर दिया। इस साल तो और भी मुश्किलें होंगी, क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट आ रही है और व्यापक रूप से माना जाता है कि अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए चीन धीरे-धीरे अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करेगा। चीन की मुद्रा में क्रमबद्ध अवमूल्यन से भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ सकती है। पता नहीं, राजग सरकार बीजिंग की घटनाओं का भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का बारीक अध्ययन कर रही है या नहीं।
वर्ष 2016-17 का केंद्रीय बजट, जो अगले महीने पेश किया जाएगा, सामान्य बजट नहीं होगा। इसमें कई जोखिम भी हैं, क्योंकि बजट में पहले से ही इस पर विचार करना होगा कि अगले छह महीनों में चीन क्या कर सकता है और उसके अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए क्या रणनीतियां होंगी। जाहिर है, वैश्विक अर्थव्यवस्था आज इतनी अस्थिर है कि सभी घटनाओं पर एक साथ नजर रखना असंभव है। चीन की मुद्रा के क्रमिक अवमूल्यन, हमारी प्रतिस्पर्द्धा के आगे घटने और अमेरिकी ब्याज दर में क्रमिक बढ़ोतरी से वैश्विक पूंजी के पुनः अमेरिका की तरफ खिसकने के प्रति भारत को विशेष रूप से जागरूक रहना होगा। यह एक और दोहरी मार है, जिसका सामना भारत को करना पड़ सकता है। आगामी आर्थिक सर्वे चीनी मुद्रा के अवमूल्यन और अमेरिकी ब्याज दरों के बढ़ने से होने वाले संकटों को टालने के लिए उपायों की रूपरेखा तैयार करने का उचित दस्तावेज हो सकता है। चीन की मुद्रा का अवमूल्यन इस दृष्टि से हमारे लिए बड़ा जोखिम है, क्योंकि इसका भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
इसलिए यदि दूसरी मंदी आती है, जिससे कई विशेषज्ञ इन्कार नहीं कर रहे हैं, तो भारत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बहुत ज्यादा सकारात्मक फर्क का दावा नहीं कर सकता।