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सामने हैं प्रश्न बदले से

Sat, 26 Jul 2014 07:47 PM IST
ऋषिवंश
ऋषिवंश Updated Sat, 26 Jul 2014 07:47 PM IST
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rishivansh poem

गीत के सुर बदलते से हैं।

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भाव कुछ कुछ निगलते से हैं।

सामने हैं प्रश्न बदले से
और जलती प्राथमिकताएं
जानलेवा परिस्थितियों में
बदली बदली आदमी की कलाएं
दुख के पर्वत पिघलते से हैं।

दरकते विश्वास का संकट
आधुनिक अंदाज के धोखे
असलियत तो जानना मुश्किल
बनावट के द्वीप अनोखे
सुख के साधन मचलते से हैं।  

निरर्थक हैं मूल्य की बातें
हर कदम पर चोट लगती है
आम लोगों का कठिन जीवन
नहीं कुछ उम्मीद जगती है
दिन पे दिन बस निकलते से हैं।

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