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नए युग का उदय और सौ साल की योजना

Tue, 15 Oct 2019 01:24 PM IST
pradeep kumar प्रदीप कुमार
Updated Tue, 15 Oct 2019 01:24 PM IST
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Rise of new era and hundred year plan
नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग - फोटो : a

नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच महाबलीपुरम में दो दिन की वार्ता की 'सफलता' का अंदाजा लगाने के लिए एक सप्ताह पहले की घटनाओं का स्मरण आवश्यक है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद चीन ने भारत का विरोध और पाकिस्तान के साथ एकजुटता के प्रदर्शन में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत को याद दिलाया गया कि उसके इस कदम से सीमा विवाद और जटिल हो जाएगा। लद्दाख के संदर्भ में कहा गया कि उस पर भारत के प्रशासकीय अधिकार का चीन ने हमेशा विरोध किया है। भारत पहुंचने के एक दिन पहले शी ने बीजिंग में इमरान खान का स्वागत करते हुए कहा कि कश्मीर के हालात पर चीन चिंतित है। उन्होंने भारत को सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की याद दिलाई।


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महाबलीपुरम में दो दिन की अनौपचारिक वार्ता के बाद मोदी ने कहा, 'अब नए युग का उदय होगा, स्थायित्व बढ़ेगा। वुहान की भावना ने हमारे संबंधों को नई गति और विश्वास प्रदान किया था। हमने तय किया था कि अपने मतभेदों को विवाद का रूप नहीं लेने देंगे, बुद्धिमत्ता से उन्हें निपटाएंगे।' बीजिंग में चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, शी ने कहा, 'चीन भारत के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित करने की अडिग नीति पर चल रहा है और दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच रिश्ते मजबूत करने के लिए सौ वर्षीय योजना का प्रस्ताव रखा है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति में वैश्विक स्थिरता और विकास बढ़ाने के लिए भारत और चीन को बढ़ते महत्व की जिम्मेदारी का वहन करना चाहिए। दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में भारत और चीन को दूसरे देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए।' दक्षिण एशिया अर्थात पाकिस्तान के साथ।

शी की महाबलीपुरम यात्रा 'सफल' होनी ही थी। उन्हें जो दो टूक कहना था, वह चौबीस घंटे पहले कह चुके थे। आपसी विवादों से ग्रस्त, विश्व की दो सर्वाधिक गतिशील अर्थव्यवस्थाओं के नेता एक-दूसरे के देश की यात्रा विफलता हासिल करने के लिए नहीं करते। दोनों देशों के परिपक्व राजनय और व्यक्तिगत रूप से मोदी व शी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का भी सवाल था। आगे की संभावनाओं और संभावित घटनाक्रम को यथार्थ के धरातल पर देखना चाहिए। पाकिस्तान आतंकवाद का संचालन करता रहे और चीन लद्दाख पर अपना अधिकार जताता रहे, तो सहयोग के लिए छोटा-सा हाशिया भी नहीं बचता।

पाकिस्तान का उदार और तर्कसंगत वर्ग जो बात समझता है,चीन उसे भी तसलीम नहीं करना चाहता। शी के भारत पहुंचने के दिन प्रतिष्ठित पत्रकार नजम सेठी ने फ्राइडे टाइम्स में लिखा, 'सच यह है कि अब दुनिया भारत में कश्मीर के एकीकरण के साथ रहना चाहती है। सच यह है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ चुका है। सच यह है कि पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है, जबकि विश्व आगे बढ़ रहे भारत को देख रहा है।' उभयपक्षीय संबंधों का भयावह सच यह है कि चीन भारत की सीमाओं को काट-पीटकर रखने की स्थायी नीति पर चल रहा है। भारत चीन के साथ अपनी सीमा की लंबाई करीब 4,000 किलोमीटर मानता है। पर चीन के मुताबिक, यह सिर्फ 2,000  किलोमीटर है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत का भाग मानता ही नहीं। भारत की कोई भी सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती।

चीन के इरादों को एक और नवीनतम घटना से समझिए। महाबलीपुरम से शी के काठमांडु पहुंचने से पहले नेपाली मीडिया में छपे उनके लेख में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय अपराधों पर अधिक कारगर नियंत्रण, हमारे नागरिकों की सुरक्षा और सुगम व्यापार सुनिश्चित करने के लिए नेपाल-चीन सीमा पर सुरक्षा संपर्क बढ़ाना ज़रूरी है। उन्होंने लिखा,' नेपाल एक चीन नीति पर चलता है और किसी भी ताकत को चीन के खिलाफ अपनी भूमि का इस्तेमाल नहीं करने देता।' यहां भी निशाना भारत है। चीन की इस नीति का अर्थ यह है कि वह नेपाल के साथ सैनिक संपर्क बढ़ाएगा और उसे नए-नए हथियारों की आपूर्ति करेगा। अकेले काठमांडु-कोडारी सड़क भारत का सिरदर्द बढ़ाने के लिए काफी थी। अब नेपाल-चीन रेलवे भारत की सीमाओं तक आ जाएगी। गोरखपुर से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर लुंबिनी में चीन की उपस्थिति पहले ही कायम हो चुकी है। चीन और नेपाल में लगातार बढ़ रहे सामरिक सहकार ने भारत-नेपाल संधि को वस्तुतः निष्प्रभावी कर दिया है। नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार ने चीन के मंसूबों पर अमल को आसान बना दिया है। आने वाले दिनों में नेपाल की तरफ से नई समस्याओं के लिए तैयार रहना चाहिए।

चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार शी ने कहा, 'सीमा विवाद का उचित और तर्कसंगत समाधान होना चाहिए, जो दोनों पक्षों को स्वीकार हो।' यह तो कभी न सुलझ पाने वाली पहेली हो गई। चीन लद्दाख पर भारत की प्रभुसत्ता न माने, पूरे अरुणाचल पर दावा करे और भारत की लगभग 2,000 किलोमीटर सीमा ही गायब कर दे, तब तो सौ साल क्या, अनादि काल के लिए समाधान असंभव हो जाएगा। पिछले सत्तर साल का अनुभव यह है कि चीन सीमा विवाद का तर्कसंगत हल चाहता ही नहीं। सीमा विवाद एक ऐसा कांटा है, जो लगातार घुसे रहने पर नासूर को जन्म दे सकता है। यह नासूर चीन के लिए फायदेमंद है। सीमा विवाद पर दोनों देशों के प्रतिनिधियों की वार्ता जल्द शुरू करने और पहले कदम के रूप में मानचित्रों के आदान-प्रदान पर सहमत होकर चीन को नेकनीयती का परिचय तो देना ही चाहिए।

मीठी-मीठी बातों के बावजूद ताकत का स्वाभाविक रसायन बिल्कुल अलग होता है। 14 ट्रिलियन यानी 140 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले चीन के चिंतन, सपनों और महत्वाकांक्षा की एक अनिवार्य मंजिल है। तीस खरब डॉलर से कम अर्थव्यवस्था वाले भारत की सीमाएं हैं। यह संभव नहीं है कि आपसी संबंध इन कारकों से प्रभावित न हों। वर्ष 2049 में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की शताब्दी पूरी होने तक सर्वोच्च शक्ति बन जाने का संकल्प चीन स्पष्ट कर चुका है। भारत का राजनय प्रतिकूल स्थितियों में उभयपक्षीय संबंधों का कुशल प्रबंधन करने में सक्षम है। बाकी तो किसी देश की संदिग्ध सदिच्छा, यहां तक कि भरोसेमंद सदिच्छा के सहारे हमेशा नहीं रहा जा सकता। महाबलीपुरम का यही महानिष्कर्ष है।

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