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निजता का अधिकार और आधार

Mon, 28 Aug 2017 07:40 PM IST
अश्विनी महाजन
अश्विनी महाजन Updated Mon, 28 Aug 2017 07:40 PM IST
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Right to privacy and aadhar
अश्विनी महाजन

सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दे दी है। इससे पहले सरकार और उससे जुड़े लोगों ने कहा था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। केंद्र सरकार का कहना है, और यह सही भी है कि सरकारी मदद सही लोगों तक पहुंचे और उसमें कोई चोरी न हो। इस कारण सरकारी योजनाओं को आधार के साथ जोड़कर देने की बात कही गई। करों की चोरी और काले धन पर रोक लगाने के लिए भी आयकर विवरणी और बैंक खातों में आधार नंबर की अनिवार्यता रखी गई। पर आधार धारकों की निजी जानकारी सार्वजनिक होने और उसे कंपनियों के साथ साझा करने की आशंकाएं भी सामने आने लगीं। इसे निजता के हनन के बराबर माना गया।

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मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, जिसका सीधा संबंध ‘आधार’ से था। देश में रहने वाला हर व्यक्ति ‘आधार’ बनवाने का हकदार है। यह पहचान पत्र बनाते हुए उंगलियों और अंगूठों के निशान, आंखों की रेटिना का चित्र, फोटो और अन्य निजी जानकारियां ली जाती हैं। पहले ‘आधार’ को सरकारी लाभ प्राप्त करने हेतु अनिवार्य किया गया, बाद में नए बैंक खातों के लिए अनिवार्य किया गया और आज सभी बैंक खातों को ‘आधार’ के साथ जोड़ने की कवायद चल रही है। इस वर्ष हर आयकर रिटर्न को ‘आधार’ के साथ जोड़ दिया गया है। यानी ‘आधार’ की अनिवार्यता का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। एनडीए की सरकार बनने से पहले भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी ‘आधार’ के बारे में प्रश्न उठा रहे थे। पर सत्ता में आने के बाद मोदी को महसूस हुआ कि सरकारी खर्च को लक्षित करने, गैरकानूनी लेन-देन और काले धन पर रोक लगाने और वित्तीय अनुशासन को कायम करने में ‘आधार’ की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
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हालांकि सरकार द्वारा 2016 में लाए गए ‘आधार’ बिल में कानूनी रूप से निजता के हनन को रोकने हेतु काफी प्रावधान किए गए थे, पर हाल ही में ‘आधार’ व्यवस्था के माध्यम से निजता के हनन के संबंध में कई सवाल उठने लगे। ये सवाल मात्र ‘आधार’ से संलग्न आंकड़ों की सुरक्षा से नहीं हंै, बल्कि यह वृहत रूप से नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। सबसे पहला मुद्दा यह है कि क्या ‘आधार’ से जुड़ी जानकारी सुरक्षित है? यदि ‘आधार’ के केंद्रीकृत डाटाबेस को हैक कर लिया जाता है, तो जानकारियों की सुरक्षा का क्या होगा? आज जब लोगों के ‘आधार’ नंबर खुले रूप से उपलब्ध हैं, तो उनके बायोमैट्रिक बनाकर आसानी से ‘आधार’ आधारित भुगतान व्यवस्था के अंतर्गत धोखाधड़ी हो सकती है। हमारी निजी जानकारी किसी कंपनी अथवा व्यक्ति के साथ साझा हो सकती है। आधार व्यवस्था में हमारी उंगलियों और अंगूठों के निशान, हमारी आंख के रेटिना के फोटो लिए जाते हैं, जो जायज नहीं है। सरकार का कहना है कि ऐसी जानकारी जायदाद की रजिस्ट्री के समय भी ली जाती है और कई देशों के ‘वीजा’ लेने के लिए भी ऐसी जानकारी देनी पड़ती है। ‘आधार’ के आलोचकों का यह भी कहना है कि लोगों की निजी जानकारियां लाभ के उद्देश्य से बेची जा सकती हैं और जब तक लोगों को इस बात की समझ आएगी, तब तक उनके सभी आंकड़े कंपनियों के पास जा चुके होंगे।
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आज जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला निजता के पक्ष में आ गया है, तब सरकार द्वारा आधार की अनिवार्यता और उसकी जानकारियों को साझा करने संबंधी अधिकारों पर अंकुश लगेगा। इस फैसले ने आधार को लागू करने की सरकार की गति पर लगाम जरूर लगाई है।

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