जनता को जानने और जांचने का हक
अपनी पहली पारी में कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सूचना का अधिकार, मनरेगा, किसानों की कर्ज माफी जैसे कुछ अहम काम किए थे। यही नहीं, इस सरकार ने वैश्विक मंदी के दौर में भी अर्थव्यवस्था को डावांडोल होने से बचाया था। ऐसे में जनता ने उसे 2009 में फिर शासन का मौका दिया। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित कामयाबी हासिल हुई थी और उसकी सीटों का आंकड़ा 200 को पार कर गया था। लेकिन दूसरी बार मिले जनादेश से इतराई यूपीए-दो सरकार ने इसे महज जनता की लाचारी मान लिया। दरअसल, पिछले दिनों केंद्रीय सूचना आयोग ने एक अहम फैसला दिया, जिसके तहत सभी राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में आने की बात है। पर यूपीए सरकार अपने ही द्वारा पारित कानून की धार कुंद करने पर आमादा है। इस काम के लिए उसे तकरीबन सभी दलों का समर्थन भी प्राप्त होता दिख रहा है।
दरअसल, राजनीतिक दल एकजुट होकर अपने अहं को बचाने में लगे हैं। वे यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि अंततः उनका अस्तित्व और भविष्य, दोनों ही जनता के हाथ में है। लोकतंत्र में लोकनीति चलाने के लिए ही राजनीतिक दलों को लोकसत्ता मिलती है। लोकतंत्र उत्तरदायित्व और व्यवस्था की साफगोई से चलता है। इसी उत्तरदायित्व से यूपीए सरकार और सभी राजनीतिक दल कन्नी काटने में लगे हैं।
राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आना कतई स्वीकार नहीं है, इसलिए वे इस महत्वाकांक्षी कानून को कमजोर करने के लिए संसद में संशोधन लाने का मन बना बैठे हैं। साफ है कि सरकार और विपक्ष, दोनों लोकतंत्र के प्रति अपनी जवाबदेही से दूर भाग रहे हैं।
राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में न लाने के पीछे राजनेताओं द्वारा अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, राजनीतिक दल चुनाव आयोग में जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 29 ए के अधीन पंजीकृत हैं। ऐसे में दल और नेता के बारे में सभी जानकारियां केवल चुनाव आयोग के लिए हैं। पर सवाल यह है कि वह जनता जो राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को सीधे मतदान के जरिये चुनती है, उसे यह जानकारी उपलब्ध क्यों नहीं होनी चाहिए।
यह भी तर्क दिया जा रहा है कि धन, उसकी उद्घोषणा और उससे जुड़े दंड के सभी प्रावधान जन प्रतिनिधित्व कानून में हैं, ऐसे में राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाए जाने का क्या औचित्य है? पर क्या इस सच्चाई से मुंह मोड़ा जा सकता है कि संविधान में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के तमाम प्रावधान और आचार संहिताएं होने के बावजूद आए दिन नए-नए घोटाले सामने आते रहते हैं? क्या यह सच नहीं है कि भ्रष्टाचार में लिप्त मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं की सूची बहुत लंबी है, लेकिन इन मामलों में दंड पाने वालों को उंगलियों पर गिना जा सकता है? क्या सरकार और विपक्ष इस सच्चाई से इनकार कर देंगे कि सूचना का अधिकार मिलने के बाद हुए खुलासे से ऐसा लग रहा है कि भ्रष्टाचार के मामलों की बाढ़-सी आ गई है। इससे स्पष्ट है कि यह कानून लोकतंत्र में जवाबदेही बनाए रखने का बड़ा हथियार है।
पहले लोग राजनीति में जनता की सेवा करने आते थे। लेकिन अब राजनीति जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि अपनी और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों एवं परिजनों की सेवा के लिए की जाती है। यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि 1951 में हमारे देश में कितने लखपति संसद में थे और आज कितने अरबपति सांसद हैं। बेशक चुनाव आयोग अपना काम पूरी सजगता से करता हो, लेकिन चुनाव आयोग से ज्यादा राजनीतिक दल और प्रत्याशी के कामकाज का लेना-देना मतदाताओं से होना चाहिए। चुनाव आयोग पर सही एवं निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है, मगर मतदाता पर तो शासन व्यवस्था चलाने के लिए योग्य राजनीतिक दल और प्रत्याशी को चुनने का उत्तरदायित्व होता है। तो फिर जानने और जांचने का हक जनता से क्यों छीना जा रहा है?